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June 2014 Blog Posts (163)


सदस्य कार्यकारिणी
फूल कैसे खिलें ? ( एक अतुकांत चिंतन ) गिरिर्राज भंडारी

फूल कैसे खिलें ?  ( एक अतुकांत चिंतन )

***************

प्रेम विहीन हाथ मिले तो ज़रूर

मुर्दों की तरह , यंत्रवत

तो भी खुश हैं हम

शायद अज्ञानता और बेहोशी भी खुशी देती है ,एक प्रकार की

झूठी ही सही

और झूठी इसलिये

क्यों कि बेहोशी का सुख हो या दुख , झूठा ही होता है

 

इसलिये भी, क्योंकि

हम स्वयँ जीते ही कहाँ है

जीती तो है एक भीड़ हमारी जगह ,

भीड़ विचारों की , तर्कों – कुतर्कों की

भीड़ शंकाओं- कुशंकाओं की ,…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 30, 2014 at 6:42pm — 22 Comments

हाइकू

अहंकार ना

कभी आ जाये हमें

दिन न आये |

 

मनमोहन

छेड़े बंसी की तान

झूमती आऊं |

 

तनहा तुम

देगा न कोई साथ

खयाल रहे |

प्रकृति हमें

देती सब संपदा

लगाएं वृक्ष |

 

समेट रही

आँचल में अपने

पुष्प बिखरे |

         

अजनबी हम

चलते रहे साथ

इक दूजे के |

 

माता का हाथ

रहे सदैव माथ 

धन्य जीवन |

 

पारिजात…

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Added by Meena Pathak on June 30, 2014 at 5:24pm — 17 Comments

व्यथा

काम से थककर चूर पत्नी ने कमर पीड़ा से कराहते हुए दर्द भरे स्वर में कहा - ‘हाय रा s sम !’

बिस्तर पर लेटे –लेटे पति ने पत्नी की व्यथा सुनी, बुरा सा मुंह बनाया और जोर से आह भरी – ‘हाय सी s sता !'

 

 

[अप्रकाशित व् मौलिक]

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 30, 2014 at 4:00pm — 37 Comments

गज़ल /कल्पना रामानी

मुझको तो गुज़रा ज़माना चाहिए।

फिर वही बचपन सुहाना चाहिए।

 

जिस जगह उनसे मिली पहली दफा,

उस गली का वो मुहाना चाहिए।

 

तैरती हों दुम हिलातीं मछलियाँ,

वो पुनः पोखर पुराना चाहिए।

 

चुभ रही आबोहवा शहरी बहुत,

गाँव में इक आशियाना चाहिए।

 

भीड़ कोलाहल भरा ये कारवाँ,

छोड़ जाने का बहाना चाहिए।

 

सागरों की रेत से अब जी भरा,

घाट-पनघट, खिलखिलाना चाहिए।

 

घुट रहा दम बंद पिंजड़ों में…

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Added by कल्पना रामानी on June 30, 2014 at 2:30pm — 21 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : खोटा सिक्का (गणेश जी बागी)

                       "अजी सुनती हो! देख लो तुम्हारे लाड़ले की करतूत, सेकंड इयर का रिज़ल्ट आया है, खीँच खांच के पास हुए हैं जनाब,  दिनभर दोस्तो के साथ मटरगश्ती और मारपीट करते रहते हैं, अब तो बर्दाश्त से बाहर हो गया है |"


                        "अब जाने भी दीजिए जी, बच्चा है, थोड़ी-बहुत ग़लतियाँ तो हो ही जाती हैं, आपको पता है,  बिटिया बता रही थी कि भाई के कारण ही कॉलेज मे…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 30, 2014 at 12:00pm — 45 Comments

बेईमान सारे एक हैं- डा० विजय शंकर

बेईमानी की इतनी विधाएँ हैं
झूठ के रूप अनेक हैं
फिर भी बेईमान सारे एक हैं |
ऐसा भाई-चारा , ऐसा प्रेम ,
शायद ही कहीं किसी कर्म-क्षेत्र
के रखवालों में मिले , दुर्लभ है ।
दूसरी और सच एक है ,
ईमानदारी एक है ,
न सच के दो रूप हो सकते हैं ,
न ईमानदारी के |
फिर भी दो सच्चे ईमानदार
कभी एक नहीं हो सकते हैं
उनका एक होना दुर्लभ है ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Added by Dr. Vijai Shanker on June 30, 2014 at 9:01am — 18 Comments

गजल सितम देखो

हमें वो वेवफा कह कर बुलाते है सितम देखो

चुरा कर नीद रातो की सताते है सितम देखो



कभी मै देखता भी तो नहीं था जाम के प्‍याले

कसम दे कर मुझे अपनी पिलाते है सितम देखो



बडे अरमान से जिसने  बनाया आशिया मेरा

वही उस आशिये को अब जलाते है सितम देखो



न रूठे वो कभी हमसे हमारे साथ चलते थे

मगर अब साथ गैरो का निभाते है सितम देखो



खुले जो लब कभी जिनके हमारा नाम ही निकले

न जाने क्‍यो वही हमको भुलाते है सितम देखो

मौलिक व…

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Added by Akhand Gahmari on June 30, 2014 at 8:00am — 19 Comments

2 कुण्डलियाँ

1.

चिंतन की मथनी करे, मन का मंथन नित्य |

सार-सार तरै ऊपर , छूटे निकृष्ट कृत्य ||

छूटे निकृष्ट कृत्य , विचार में शुद्धि आए |

उज्ज्वल होय चरित्र, उत्तम व्यवहार बनाए||

मिले सटीक उपाय, समस्या को हो भंजन |

चिंता भी हो  दूर , करें जब मन में चितन ||

2.

अक्ल बिना बंधु देखो , सरै न एकौ काम |

सब जीवों में श्रेष्ठतम , मानव तेरा नाम||

मानव तेरा नाम, है यह विवेक सिखाती |

ऊँच-नीच की बात, मानवों को समझाती ||

इक जैसा…

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Added by shalini rastogi on June 29, 2014 at 11:00pm — 6 Comments

कस्तूरी

हम क्यों खोजते है
सच को
बार बार?
कस्तूरी के
मृग की तरह
वो तो सदा
हमारे बीच
ही रहता है.
हम उसे रोज
देखते है
सुनते हैं
सूंघते हैं
पर अंजान बन
उंघते है.
अगर हमने
मान लिया
हम सच जानते है
तो लोग हमें
झूठा कहेंगे
क्योंकि वो भी

कस्तूरी गंध के
सच को जानते है.

विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 29, 2014 at 9:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल -निलेश "नूर"

मुझे वो याद करते हैं जो भूले थे कभी मुझको,

बस ऐसे ही जहां भर की मिली है दोस्ती मुझको.   

.

ज़माना ज़ह्र  में डूबे हुए नश्तर चुभोता है,

बचाती ज़ह्र  से लेकिन मेरी ये मयकशी मुझको.    

.

मुझे कहने लगा ख़ंजर, “मुहब्बत है मुझे तुमसे,

कि इक दिन मार डालेगी तुम्हारी सादगी मुझको.” 

.

ज़माने का जो मुजरिम है सज़ाए मौत पाता है,

मिली मेरे गुनाहों पर सज़ाए ज़िन्दगी मुझको.

.

ख़ुदाया शह्र -ए-पत्थर में बना मुझ को तू आईना,

समझनी है अभी इन…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 29, 2014 at 6:30pm — 24 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
वर्तमान की उम्मीद (अतुकान्त) // -सौरभ

आज सुबह-सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई.

रोज की तरह.. 

वर्तमान ही होगा..  

विगत के द्वार से आया

दुरदुराया गया हुआ.. / फिर से.



एक विगत…

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Added by Saurabh Pandey on June 29, 2014 at 6:00pm — 32 Comments

मिला जो, कब खुशी उससे समेटी यार लोगों ने - ग़ज़ल

********************************************

1222 1222 1222 1222

********************************************

जनम से आदमी हो, आदमी क्यों हो नहीं पाया

कि नफरत से भरे दिल में मुहब्बत बो नहीं पाया

***

सितारे तोड़ डाले सब, करम उसका यही है बस

खता मेरी रही इतनी कि जुगनू हो नहीं पाया

***

मिला जो, कब खुशी उससे समेटी यार लोगों ने

उसी का गम जिगर को है जमाने जो नहीं पाया

***

तुझे क्यों खांसना उसका दिनों में भी अखरता है

पिता जो तेरे बचपन में… Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2014 at 4:34pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कहाँ होती मुहब्बत और कैसी कुर्बतें होतीं (ग़ज़ल 'राज')

1222   1222   1222   1222

जुबाँ से विष उगलते और मन में नफरतें होतीं

 न तू होता अगर दिल  में न तेरी रहमतें होतीं

 

नहीं जीवन बनाता तू धड़कता फिर कहाँ से दिल

न कोई ख़्वाब ही पलते  न कोई हसरतें होतीं  

 

जो तेरे  हाथ शानों पर नहीं होते अगर मेरे   

कहाँ से  होंसला होता कहाँ  ये हिम्मतें होतीं  

 

बिना मतलब यहाँ तो पेड़ से पत्ता नहीं हिलता

ज़माना साथ क्या देता बड़ी ही जिल्लतें होतीं  

 

न तुझ में  आस्था…

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Added by rajesh kumari on June 29, 2014 at 2:00pm — 23 Comments

भीषण गरमी का मौसम

भीषण गरमी का मौसम( अतुकांत)

भीषण गरमी के मौसम में

हम करते हैं आराम।

लेकिन जिन्दगी में,

कैसे करें आराम ।

काली काली जामुन

सावन से पहले की मीठी मीठी

हमने खायी,नहाते नहाते

क्या बिन बिजली हम जीते नहीं थे

अब सब बिजली के बिन चिल्लाते हैं

मजदूरों को कभी गरमी नहीं लगती

न वो बोलते हैं

अगर बोलें भी , तो कोई नहीं सुनता।।

मौलिक व अप्रकाशित।

Added by सूबे सिंह सुजान on June 29, 2014 at 1:22pm — 7 Comments

प्रोषितपतिका (लघु कथा )

प्रोषितपतिका  मंदिर में स्थित देवता पर फूल चढाने वाली ही  थी कि उसका आठ वर्षीय बेटा दौड़ा हुआ आया और हांफते हुए बोला  -'मम्मी , पूरे दस महीने बाद आज डैडी घर आये है i'  इतना कह्कर लड़का वापस चला गया i माँ ने झटपट पूजा संपन्न की  और घर की ओर भागी i उसके पहुचते ही बेटे ने टिप्पड़ी की  माँ आपके दोनों पैरो में अलग - अलग किस्म की चप्पले है i  माँ ने झेप कर पैरो की ओर देखा फिर  लाज की एक रेखा सी उसके चेहरेपर दौड़ गयी i पतिदेव शरारत से मुस्कराये i

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 29, 2014 at 1:08pm — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ताज़ा लहू के सुर्ख़ निशाँ छोड़ आया हूँ

221 2121 1221 212

ताज़ा लहू के सुर्ख़ निशाँ छोड़ आया हूँ

हर गाम एक किस्सा रवाँ छोड़ आया हूँ

 

वो रोज़ था, मुझे न मयस्सर ज़मीं हुई

ये हाल है कि अब मैं जहाँ छोड़ आया हूँ

 

परदेस में लगे न मेरा मन किसी तरह

बच्चों के पास मैं दिलो-जाँ छोड़ आया हूँ

 

उड़ती हुई वो ख़ाक हवाओं में सिम्त-सिम्त

जलता हुआ दयार धुआँ छोड़ आया हूँ                   दयार= मकान

 

मौजूदगी को मेरी तरसते थे रास्ते

चलते हुये उन्हें…

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Added by शिज्जु "शकूर" on June 29, 2014 at 11:59am — 24 Comments

हाँ..! यही सच है (अतुकांत)

मन की...

तपती धरा पर

कुछ  बूंदें  ही बारिश की

यूँ पड़ी..

न कोई राहत ,न ही सौंधी सी महक

सिर्फ बेचैनी और उमस

कहीं संवेदनाओं की मिट्टी

पत्थर तो नहीं हो गई

 

या वर्ष भर के

लम्बे विरह से

मिलन की ,भूख-प्यास चाहती हो

खूब टूट-टूट कर 

बरसें   ये बादल

हाँ..! यही सच है

शायद..

मन भी यही चाहता है.

जितेन्द्र’गीत’

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on June 29, 2014 at 11:00am — 22 Comments

मातु भारती (त्रिभंगी छंद)

हे भाग्य विधात्री, जन सुख दात्री, मातु भारती, वंदन है ।
मां माटी तोरी, सौंधी भोरी, रज कण माथे, चंदन है ।।
गिरि हिम आच्छादित, करते प्रमुदित, मुकुट मणी सा, सोहत है ।
धरा मनोहारी, मातु तुम्हारी, हरि हर को भी, मोहत है।।
...............................................................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on June 29, 2014 at 9:14am — 10 Comments

ग़ज़ल- ज़िंदगी क्यूँ तेरा पता ढूँढता हूँ !!

बहर - 2122 / 1212 / 2122 

रेत पर किसके नक्शे पा ढूँढता हूँ !

ज़िंदगी क्यूँ तेरा पता ढूँढता हूँ !!

किस ख़ता की सज़ा मिली मुझको ऐसी 

माज़ी में अपने ,वो ख़ता ढूँढता हूँ !!

य़क सराबों के दश्त में खो गया मैं

अब निकलने का रास्ता ढूँढता हूँ !!



दौरे गर्दिश में संग ,गर चल सके जो

कोई ऐसा मैं हमनवा ढूँढता हूँ !!

रौशनी थी मुझे मयस्सर कब आखिर

फिर भी क्यूँ कोई रहनुमा ढूँढता हूँ !!

.

चिराग़…

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Added by Kedia Chhirag on June 28, 2014 at 1:00pm — 13 Comments

आज मैंने छूट्टी दे दी है...

आज मैंने छूट्टी दे दी है - 

अनगिनत दुखों को, बेचैनियों को 

ज़िंदगी के अभावों और अनुभवों को 

सगे-संबंधी के रिश्तों की गठरी को 

अपने नाम - शोहरत के बोज को भी 

जगमगाहट भरी भौतिकता की लाईट बंद

अपने नियमों - आग्रहों से दु:खी होनेवाले को 

अपने साथी-संगाथियों से हुई अनबन…

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Added by Pankaj Trivedi on June 27, 2014 at 9:00pm — 10 Comments

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