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ज़िंदगी के सफ़हात...

ज़िंदगी के सफ़हात ...

हैरां हूँ

बाद मेरे फना होने के

किसी ने मेरी लहद को

गुलों से नवाज़ा है

एक एक गुल में

गुल की एक एक पत्ती में

उसके रेशमी अहसासों की गर्मी है

नाज़ुक हाथो की नरमी है

कुछ सुलगते जज़्बात हैं

कुछ गर्म लम्हों की सौगात है

काश

तुम मेरे शिकवों को समझ पाते

जलते चिराग का दर्द समझ पाते

मेरी पलकों को

इंतज़ार की चौखट में

कैद करने वाले

कितना अच्छा होता

साथ इन गुलों के

तुम भी आ जाते…

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Added by Sushil Sarna on June 25, 2017 at 9:30pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल : भइ, आप हैं मालिक तो कहाँ आपसे तुलना

२२१ १२२१ १२२१ १२२ 

 

पिस्तौल-तमंचे से ज़बर ईद मुबारक़ 

इन्सान पे रहमत का असर, ईद मुबारक़

 

पास आए मेरे और जो ’आदाब’ सुना मैं

मेरे लिए अब आठों पहर ईद मुबारक़

 

हर वक़्त निग़ाहें टिकी रहती हैं उसी दर

पर्दे में उधर चाँद, इधर ईद मुबारक़ !

 

जिस दौर में इन्सान को इन्सान डराये

उस दौर में बनती है ख़बर, ’ईद मुबारक़’ !

 

इन्सान की इज़्ज़त भी न इन्सान करे तो

फिर कैसे कहे कोई अधर ईद मुबारक़ ?

 

जब धान उगा कर मिले…

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Added by Saurabh Pandey on June 25, 2017 at 3:30pm — 28 Comments

पारसाई ही मेरी दौलत है (ग़ज़ल)

2122 1212 22

जो ये लम्हा उदास है तो है
वो कहीं आस-पास है तो है

पैरहन जिस्म पर हज़ारों हैं
रूह गर बेलिबास है तो है

तीरगी हिज्र की है आंखों में
दिल में लेकिन उजास है तो है

पारसाई ही मेरी दौलत है
छल-कपट तेरे पास है तो है

क्यों न मिट जाए ग़म की कड़ुवाहट
आंसुओं में मिठास है तो है

इश्क़ में कोई मोज़िजा होगा
दिल को अब भी ये आस है तो है

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on June 25, 2017 at 3:28pm — 6 Comments

धीरे-धीरे नदियाँ रेत बन गईं / कविता

धीरे-धीरे

नदियाँ रेत बन गईं

हरे-भरे खेतों में

ऊँची-ऊँची

अट्टालिकाएँ तन गईं

घरों में अनबन की

दीवारें खड़ी हो गईं

जीते जी बूढ़ी माँ

भुखमरी की निशानी बन गईं

मौसम सनकी

पागल जैसे हो गए

बारिश अब दूर की कौड़ी हो गई

देश

किसान आत्म हत्या का

रोज़ उत्सव मना रहा है

सरकार की

झूठी सफलताओं में

करोड़ों बहाए जा रहे हैं

सरकारी

आँकड़ों में

ग़रीबी रोज़ घट रही है

सरकार की

उद्योगपतियों के साथ

अच्छी पट रही… Continue

Added by Mohammed Arif on June 25, 2017 at 9:30am — 10 Comments

गज़ल- कैसे कहूँ मै आप से मुझको गिला नहीं

देखिए ग़ज़ल हुई क्या ??



*221 2121 1221 212*



कैसे कहूँ मैं आपसे मुझको गिला नहीं ।

चेहरे से क्यूँ नकाब अभी तक उठा नहीं ।।



भूखा किसान शाख से लटका हुआ मिला ।।

शायद था उसके पास कोई रास्ता नहीं ।।



नेता को चुन रहे हैं वही जात पाँत पर ।

जिसने कहा था जात मेरा फ़लसफ़ा नहीं ।।



मजबूरियों के नाम पे बिकता है आदमी ।

तेरे दयार में तो कोई रहनुमा नहीं ।।



मुझसे मेरा ज़मीर नहीं माँगिये हुजूर ।

इसकी ही वज़ह से मैं अभी तक मरा नहीं… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 24, 2017 at 8:33pm — 10 Comments

मूक दर्शक (लघुकथा)

" बहुत अच्छा करती हो जो अब गोष्ठियों में आने लगी हो , अच्छा लगा आपको यहाँ देखकर । " एक वरिष्ठ साहित्यकार ने एक महिला से कहा ।

" जी नमस्ते सर , नहीं ऐसा कुछ नहीं है , समय अनुसार आ जाती हूँ , विविध रचनाकारों को सुनने का अवसर मिल जाता है । " उस महिला ने उत्तर दिया ।

" ओह तो श्रोता बनकर आती हो ? "

" जी , वैसे सुना है आज कल श्रोता नहीं मिलते ? जो भी आते है उन सभी को मंच की लालसा होती है । "

" बिलकुल सही कह रहीं हैं आप", अट्हास लेते हुए उन्होंने अपने साथी की तरफ देखते हुए कहा , एक…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 24, 2017 at 2:30pm — 11 Comments

बढ़ता धुआं- लघुकथा

खाला अपने रसोई में लगी हुई थीं, अब रमजान महीने के बस दो ही दिन तो बचे थे और अलीम बड़के शहर से आज ही आ रहा था. सबेरे सबेरे उन्होंने पड़ोसी मियां की दूकान से एक बार फिर लगभग गिड़गिड़ाते हुए सामान ख़रीदा था. अभी पिछले महीने का भी पूरा पैसा दिया नहीं था उन्होंने तो उम्मीद कम ही थी कि सामान मिल ही जायेगा. लेकिन एक तो उन्होंने बेटे के आने की खबर सुना दी थी और दूसरे आने वाली ईद, मियां ने थोड़े ना नुकुर के बाद सामान दे दिया.

"देखो खाला, इस बार अगला पिछला सब हिसाब चुकता हो जाना चाहिए, मेरे भी बाल बच्चे…

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Added by विनय कुमार on June 24, 2017 at 1:03pm — 10 Comments

ग़ज़ल - तेरी महफ़िल में दीवाने रहेंगे

1222 1222 122



शमा के पास परवाने रहेंगे ।

तेरी महफ़िल में दीवाने रहेंगे ।।



तुम्हारी शोखियाँ कातिल हुई हैं ।

तुम्हारे खूब अफ़साने रहेंगे ।।



बना देंगे नया इक ताज़ हम भी ।

हमें जब हाथ कटवाने रहेंगे ।।



तुम्हारी बज्म में आता रहूँगा ।

खुले जब तक ये मैखाने रहेंगे ।।



जिसे है फिक्र दौलत की नहीं अब ।

उसी के साथ याराने रहेंगे ।।





तुम्हारी शोखियाँ कातिल हुई हैं ।

तुम्हारे खूब अफ़साने रहेंगे ।।



बड़ा… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 24, 2017 at 11:15am — 2 Comments

अनुभव-धारा

सांसारिक स्वार्थग्रस्त प्रक्रियाओं से घबराकर

मुझसे ही कतराकर

चल बसी थी अकुलाती मेरी आस्था

उसके अंतिम संस्कार से पहले

टूटे विश्वास से फूटी तो थी रक्तधार

पर यह तो सदियों पुरानी बात है

समझ में न आए

कुलाँचते ख्यालों की अदृश्य रगों में

आज इतनी तपिश क्यूँ है

यादों के घावों को चोंच मार

छील गया कोई कैसे

कब से यहाँ जब कोई पास नहीं है

मेरी ही आन्तरिक कमज़ोरी को जानकर

तकलीफ़ भरे धूल…

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Added by vijay nikore on June 24, 2017 at 7:30am — 19 Comments

'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते...तत्र..!' (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

परिपक्व कहे जाने वाले या माने जाने वाले लोकतंत्र की हथेली पर बैठी बेहाल नारी पांचों उंगलियों पर दया दृष्टि डाल रही थी। किसी में उसे परेशान जनता नज़र आ रही थी, तो किसी में मीडिया। बाकी उंगलियों में उसे लोकतंत्र की स्तंभ​ कही जाने वाली विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नज़र आ रही थी, परेशान और भौचक्की सी।



"हे भारतीय नारी, क्षमा प्रार्थी हूं। समानता, सबलता, सशक्तिकरण करने के तमाम प्रयासों के बावजूद हम तेरी आबरू नहीं बचा पा रहे!" सभी की उदास, रोती सी शक्लें यही बयां कर रहीं… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 23, 2017 at 7:30pm — 8 Comments

पीते हैं ...

पीते हैं ...

सब 

कुछ न कुछ

पीते हैं //



रजनी

सांझ को

पी जाती है

और सहर

रजनी को

फिर सांझ

सहर को

सच

सब

कुछ न कुछ

पीते हैं //

अंत

आदि को

पंथ

पथिक को

संत

अनंत को

घाव

भाव को

सच

सब

कुछ न कुछ

पीते हैं //



नयन

नीर को

नीर

पीड़ को

समय

प्राचीर को

सरोवर

तीर को

सच

सब

कुछ न कुछ

पीते हैं…

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Added by Sushil Sarna on June 23, 2017 at 7:22pm — 4 Comments

ऐडवर्स रिपोर्ट(लघु कथा )

 मैं पहुंचा ही था कि मुझे अपने घर से दो अजनबी लड़के निकलते हुए दिखाई दिए. इससे पहले कि मैं उनकी बाबत कुछ जान पाता. वे बाईक पर बैठकर रफ्फूचक्कर हो गये.

दरवाजे पर बेटा खडा था. मैंने उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो उसने बताया कि डोमेस्टिक गैस सर्विस’ से आये थे .यह वही गैस सर्विस थी जहां से मेरे घर एल पी जी सिलिंडर आता है.

‘क्यूँ आये थे ?’- मैंने यूँ ही पूंछ लिया.

‘अपना गैस स्टोव चेक करने आये थे ?’

‘ स्टोव-------मगर क्यों ?’ मैं हैरत में पड़ गया –‘ जब चूल्हा…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2017 at 7:09pm — 6 Comments

सौगंध के बंधन ....

सौगंध के बंधन ....

मुझे

सब याद है

समय की गर्द में

कुछ भी तो नहीं छुपा

न तुम

न तुम्हारी

आँखों में आंखें डालकर

सात जन्मों तक

साथ निभाने की

सौगंध

चलते रहे

चलते रहे

साथ साथ

इक दूजे के दिल में

पुष्प भाव से गुंथे हुए

अर्थपूर्ण तृषा

और अर्थपूर्ण तृप्ति की

अभिलाष के साथ

इक दूसरे  के

अंतर्मन को छूते हुए

कब यथार्थ की नदी पर

एक किनारे ने

दूसरे किनारे को जन्म…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 23, 2017 at 4:21pm — 8 Comments

गजल(क्या करेगा...)

2122 2122 212

---------------

क्या करेगा माँद का मारा हुआ

बन गया मुजरिम अभी हारा हुआ।1



लोग कसते फब्तियाँ,बेजार वह

'लाल' कल का आज बेचारा हुआ।2



मौसमों की मार खाकर शीत जल

पर्वतों से भी ढुलक खारा हुआ।3



दी हवा जब,थरथरायीं चोटियाँ,

छटपटाता आज,नक्कारा हुआ।4



बंदगी में थे खड़े सब लोग तब

अब ठिठोलीबाज जग सारा हुआ।5



जो मिली कुर्सी,सलामत भी रहे

हर दिशा में आज यह नारा हुआ।6



सीढियाँ दी तोड़ जब ऊपर… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 23, 2017 at 8:53am — 3 Comments

अनकहा ...

अनकहा ...

कुछ तो

रहने दिया होता

मन की कंदराओं में

करवटें लेता

कोई भाव

अनकहा

क्या

ज़रूरी था

स्मृति पृष्ठ की

यादों को

नयन तीरों का

पता देना

आखिर

पता लग गया न

ज़माने को

सब कुछ

जो दबा के रखा था

दिल में

इक दूजे से

बांटने के लिए

सांझा दर्द

अनकहा

सांझ

कब तलक

तिमिर को रोकती

प्रतीक्षा की रेशमी डोरी

प्रभात की तीक्षण रश्मियों से…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 21, 2017 at 3:25pm — 8 Comments

ग़ज़ल ---झुकी झुकी सी नज़र में देखा

-----**** ग़ज़ल ***------



121 22 121 22 121 22 121 22



झुकी झुकी सी नज़र में देखा ,

कोई फ़साना लिखा हुआ है ।।

ये सुर्ख चेहरा बता रहा है

के दिल का मौसम जुदा जुदा है ।।



------------------------------------------------



फ़िजा की सूरत बदल रही है ,

अजीब मंजर है आशिकी का ।।

हैं मुन्तजिर ये सियाह रातें ,

वो चांद कितना ख़फ़ा खफ़ा है ।।



-----------------------------------------------



तमाम शिकवे गिले हुए हैं ,

तमाम… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on June 21, 2017 at 1:49pm — 15 Comments

लघु कथा

लघु कथा

खिलते गुलाब



आज बैंक की छुट्टी होने से रोहित घर पर ही था । पड़ोसी वर्मा जी के घर चहल पहल देख कर उसने माँ से पूछा , उन्होंने बताया आज उनकी बेटी का रिश्ता पक्का करने कुछ लोग आ रहे है । ये सुनते ही वो उदास हो गया ,जूही और वो एक दूसरे को शुरू से पसंद करते थे ।

अब जब उसकी नौकरी लग गयी थी तो उसने सोचा था ,माँ को अपनी पसंद बता देगा । जूही भी अपनी माँ को कुछ बता नहीं पायी थी ।वो दिनभर अनमना ही रहा ।

चार बजे तक पड़ोस से आवाज़ें आती रही । फिर सब शांत हो गया । थोड़ी देर… Continue

Added by Barkha Shukla on June 21, 2017 at 1:13pm — 3 Comments

लल्ला गया विदेश.

लल्ला गया विदेश

© बसंत कुमार शर्मा

 

जाने क्यों अपनी धरती का,

जमा नहीं परिवेश.

ताक रही दरवाजा अम्मा,

लल्ला गया  विदेश.

 

खेत मढैया बिका सभी कुछ,

हैं जेबें  खाली.

बैठी चकिया पीस रही है,…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on June 20, 2017 at 6:55pm — 4 Comments

विरासत (लघुकथा )

   

विरासत (लघुकथा )

सुबह पढ़ी कहानी से महेंद्र बहुत प्रभावित हुए |

वह चाहते थे कि घर का हर सदस्य भी इसे पढ़ें क्यूंकि इस कहानी में लेखक ने जो बताने की कोशिश की है |

वे आज के दौर के बारे में है जो हमारी आने वाली जिंदगी  को कैसे प्रभावित करेगी के बारे में है |

घर के सदस्य टेलीविज़न देख रहे हैं |

मगर सब से छोटी लड़की सौफे पे बैठी पढ़ रही है |

महेंद्र इस कहानी को पढ़ने के लिए, उसे देना चाह रहा है |

क्यूंकि के उसकी लाइब्रेरी में कई किताबें हैं, मगर वे सब…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on June 19, 2017 at 3:30pm — No Comments

पश्चिम का आँधी

पश्चिम की आँधी

 

पश्चिम की आँधी शहरों से,

गाँवों तक आई.

देख सड़क को पगडंडी ने,

ली है अँगड़ाई.

 

बग्गी, घोड़ी छोड़ कार में,

बैठा है दूल्हा.

नई बहुरिया माँग रही है,

तुरत गैस चूल्हा.…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on June 18, 2017 at 4:30pm — 2 Comments

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