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स्वीकार कोई कैसे करे

स्वीकार तो पहले भी कहाँ था 
लेकिन तब स्थिति ऐसी कहाँ थी 
अब तक सर हिलाने की…
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Added by amita tiwari on December 3, 2016 at 7:18pm — 7 Comments

लोकतंत्र

लोकतंत्र में
लोक नहीं होता
होता है
तो सिर्फ तंत्र
जो करता है शासन
पूँजीपतियों के लिए
नेताओं के द्वारा
नौकरशाहों से मिल
मीडिया के साथ
जनता के नाम से
जनता के ऊपर
न्याय
स्वतंत्रता
समता
और व्यक्ति की
गरिमा का
चेहरा लगा कर
लोकतंत्र में
लोक नहीं होता
होता है
तो सिर्फ तंत्र!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 3, 2016 at 7:00pm — 12 Comments

दायित्व

पिता की मृत्यु के बारह दिन गुज़र गये थे, नाते-रिश्तेदार सभी लौट गये। आखिरी रिश्तेदार को रेलवे स्टेशन तक छोड़कर आने के बाद, उसने घर का मुख्य द्वार खोला ही था कि उसके कानों में उसके पिता की कड़क आवाज़ गूंजी, "सड़क पार करते समय ध्यान क्यों नहीं देता है, गाड़ियाँ देखी हैं बाहर।"

 

उसकी साँस गहरी हो गयी, लेकिन गहरी सांस दो-तीन बार उखड़ भी गयी। पिता तो रहे नहीं, उसके कान ही बज रहे थे और केवल कान ही नहीं उसकी आँखों ने भी देखा कि मुख्य द्वार के बाहर वह स्वयं खड़ा था, जब वह बच्चा था जो डर के…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 3, 2016 at 6:58pm — 9 Comments

गीत(रोला छ्न्द)/सतविन्द्र कुमार राणा

गीत (रोला छ्न्द)

-----

सबपर उसका नेह,प्रकृति प्यारी है माता

खिलता हरसिंगार,रात में सुन ले भ्राता।



पँखुड़ी निर्मल श्वेत,मोह सबका मन लेती

सुंदरता है नेक,नयन को यह सुख देती

केसरिया है दंड,रंग जिसका चमकीला

हुआ मुग्ध मन देख,प्रकृति की ऐसी लीला

पुलकित होकर आज ,हृदय इसके के गुण गाता

खिलता हरसिंगार रात में सुन ले भ्राता।



देखो ज्यों ही तात, प्रात की बेला आए

अवनी पर तब पुष्प,सभी जाते छितराए

सुन्दर हरसिंगार,उठालो इनको चुनकर

बनते… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 3, 2016 at 6:00pm — 9 Comments

"भोपाल- तीन दिसम्बर" -मेरे सर्वप्रथम हाइकू : अर्पणा शर्मा

गैस त्रासदी,
पीड़ित मानवता,
कराह उठी...!!

भीड़ उन्मादी,
कारखाने बाहर,
देखे बर्बादी,

की है मुनादी
मिलेगा मुआवजा,
क्या है ये काफी???

कैसे भगाया,
एंड़रसन यहाँ,
है अपराधी,

नासूर से ही,
जख़्म यहाँ रिसते
वर्षों बाद भी,

बही थी यहाँ,
भूलेगा नहीं कभी,
मौत की नदी...!!!

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Arpana Sharma on December 3, 2016 at 4:00pm — 5 Comments

तुमको गीतों में ढाला तो ये कागा भी कुहक उठा- पंकज द्वारा गीत

तेरा नाम लिखा जो प्रियतम,पन्ना पन्ना महक उठा।

तुझको गीतों में ढाला तो, ये कागा भी कुहक उठा।।



मेरे शब्दों में खालीपन, एक उदासी छाई थी।

मुर्दों से बिछते कागज़ पर, मरघट सी तन्हाई थी।।



तेरा रूप उकेरा जब तो, कोहेनूर सा दमक उठा।

तुझको गीतों में ढाला तो, ये कागा भी कुहक उठा।।1।।



मैं तो ठहरा एक बावरा, इस उपवन उस उपवन भटका।

ढूँढा तुझको यहाँ वहाँ, पर माया वाले जाल में अटका।।



तेरा रूप सुमन जो महका, मन का पंछी चहक उठा।

तुझको गीतों में ढाला… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 2, 2016 at 4:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल (साँस को छोड़ना भी मना है)

ग़ज़ल (साँस को छोड़ना भी मना है)

(2122 122 122)

बोलना बात का भी मना है,
साँस को छोड़ना भी मना है।

दहशतों में सभी जी रहे है,
दर्द का अब गिला भी मना है।

ख्वाब देखे कभी जो सभी ने,
आज तो सोचना भी मना है।

जख्म गहरे सभी सड़ गये हैं,
खोलना घाव का भी मना है।

सब्र रोके नहीं रुक रहा अब,
बाँध को तोड़ना भी मना है।

अब नहीं है 'नमन' का ठिकाना,
आशियाँ खोजना भी मना है।


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on December 2, 2016 at 12:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल : उस्तरा हमने दिया है बंदरों के हाथ में

बह्र : 2122 2122 2122 212

 

आदमी की ज़िन्दगी है दफ़्तरों के हाथ में

और दफ़्तर जा फँसे हैं अजगरों के हाथ में

 

आइना जब से लगा है पत्थरों के हाथ में

प्रश्न सारे खेलते हैं उत्तरों के हाथ में

 

जोड़ लूँ रिश्तों के धागे रब मुझे भी बख़्श दे

वो कला तूने जो दी है बुनकरों के हाथ में

 

छोड़िये कपड़े, बदन पर बच न पायेगी त्वचा

उस्तरा हमने दिया है बंदरों के हाथ में

 

ख़ून पीना है ज़रूरत मैं तो ये भी मान लूँ

पर…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 2, 2016 at 10:23am — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - तफ़्सील में गये तो वो ख़ुद से ख़फ़ा मिले ( गिरिराज भंडारी )

221 2121   1221   212 

जो खोजते हैं रोज़ कोई मुद्दआ मिले

तफ़्सील में गये तो वो ख़ुद से ख़फ़ा मिले

 

नफरत मिली है देखिये नफरत से इस तरह  

मजबूरियों में तेल ज्यूँ पानी से जा मिले

 

हारे हुए मिलेंगे जहाँ खार कुछ तुम्हें

मुमकिन है उस जगह से मिरा भी पता मिले"  

 

हम दिल से चाहते हैं उन्हें दाद हो अता 

जो नेवले की जात हो, साँपों से जा मिले

 

बादल बरस के साथ ही ऐलान कर गया

क़िस्मत ही फैसला करे, अब तुझको क्या…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 2, 2016 at 9:30am — 28 Comments

ग़ज़ल - अश्क़ आए तो निगाहों को सज़ा क्या दोगे

2122 1122 1122 22



अश्क आए तो निगाहों को सजा क्या दोगे ।

है पता खूब वफाओं को सिला क्या दोगे।।



खत जो आया था मुहब्बत की निशानी लेकर ।

लोग पूछें तो जमाने को बता क्या दोगे ।



सुन लिया मैंने तेरे प्यार के किस्से सारे ।

टूट जाए जो मेरा दिल तो खता क्या दोगे ।।



मेरी किस्मत ने मुझे जब भी पुकारा होगा ।

मुझको मालूम मेरे घर का पता क्या दोगे ।।



आशियाँ जब भी उजाड़ोगे तो मुश्किल होगी ।

तेरी हस्ती ही नही मुझको हटा क्या दोगे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2016 at 2:30am — 16 Comments

गजल(दाँव पर लगता रहा मैं....)

बंद हुए बैंक नोट का आत्मकथ्य

दाँव पर लगता रहा मैं
आँख में सबकी बसा मैं।1

रूप बदला, रंग बदला,
रात-दिन चंचल चला मैं।2

बन जिगर का पुरशकूं क्षण
घर भरा,कितना सहा मैं।3

फिर चलन से दूर होकर
बे-चलन अब हो गया मैं।4

रो रहा,जगता 'बटोरू',
चैन से अब सो रहा मैं।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on December 1, 2016 at 4:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल- यूँ निभाते हैं यहाँ फर्ज निभाने वाले

2122 1122 1122 22

मांग इनसे न दुआ जख़्म दिखाने वाले ।

दौलते हुस्न में मगरूर ख़जाने वाले ।।



जो निगाहों की गुजारिश से खफा रहता है ।

कितने जालिम हैं अदाओं से जलाने वाले ।।



एक मुद्दत से तेरी राह पे ठहरी आँखें ।

क्या मिला तुझ को हमे छोड़ के जाने वाले ।।



था रकीबों का करम शाख से टूटा पत्ता ।

यूं निभाते है यहां फर्ज ज़माने वाले ।।



टूट जाते है वो रिश्ते जो कभी थे चन्दन ।

इश्क़ क्यों जुर्म है मजहब को चलाने वाले ।।



मेरी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 1, 2016 at 4:00pm — 13 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण रामानुज

कुण्डलिया छंद 
=========
तिल हो गोरे गाल पर, निखरे गोरे गाल,
अला बला फटकें नहीं, किसकी गलती दाल
किसकी गलती दाल, पस्त हो सबकी हिम्मत 
रखें फटें में पाँव, कौन की खोटी किस्मत | 
चन्दा के भी दाग, सिन्धु में प्रेम सलिल हो 
सुन्दरता का चिन्ह, अगर गौरी के तिल हो |

- लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 1, 2016 at 3:30pm — 10 Comments

हो गया हूँ बुरा

करता रहा समझौता
सहता रहा चुपचाप सब
जब तक मैं
तब तक
अच्छा था सबकी
नज़रों में बहुत
हाँ, तुम्हारी भी तो
पर आज जब मैंने सच बोला
बोल दिया झूठ को झूठ
तो हो गया हूँ बुरा
सबसे बुरा
गिर गया हूँ गहरे
कहीं बहुत गहरे
सबकी नज़रों से
और हाँ, तुम्हारी भी तो!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 1, 2016 at 1:30pm — 10 Comments

नयी ग़ज़ल - रहता नहीं

नयी ग़ज़ल 

बह्र - २१२२ २१२२ २१२

अजनबी हमसे सदा रहता नहीं 
चाहता है फिर गिला रहता नहीं

वो जफ़ा कर क्यों खफा तुमसे हुआ 
बा वफ़ा साथी जुदा रहता नहीं

आईना टूटा तभी तो रो दिये 
नूर आँखों का बुझा रहता नहीं

दोस्त तेरा प्यार मुझ पे इस कदर 
टूटकर भी वो ख़फा रहता नहीं

तू मना ले चाह कर भी ऐ “निधी”
नाखुशी से वो ख़ुदा रहता नहीं

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Nidhi Agrawal on November 30, 2016 at 11:00am — 4 Comments

मग़र मड़ई छवानी है, कमाना भी ज़रूरी है------पंकज द्वारा ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

चलूँ स्कूल लेकिन घर में दाना भी ज़रूरी है

पढूँगा तो मग़र ये घर बचाना भी ज़रूरी है



ग़रीबी श्राप है इस श्राप से है मुक्ति शिक्षा में

मग़र मड़ई छवानी है, कमाना भी ज़रूरी है



मुझे मालूम है कूड़े में मिलते रोग के कीड़े

ये कचरे ही मेरी रोजी, जुटाना भी ज़रूरी है



उसे भी छोड़िये, पिल्लू अभी भैंसें ले जाएगा

बहुत महँगा हुआ दर्रा, चराना भी ज़रूरी है



हमारे गाँव की चट्टी पे, पे टी एम् नहीं होता

तो मुर्री में बचत अपनी छिपाना भी… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 29, 2016 at 11:49pm — 12 Comments

क्षण भर पीर को सोने दो .....

क्षण भर पीर को सोने दो .....

क्षण भर  पीर को सोने  दो

चाह को  मुखरित  होने दो

जाने चमके फिर कब चाँद

अधर को अधर का होने दो

क्षण भर पीर को सोने दो .....

आलौकिक वो मुख आकर्षण

मौन भावों का प्रणय समर्पण

अंतस्तल  को  तृप्त तृषा  का

वो छुअन अभिनंदन होने दो

क्षण भर पीर को सोने दो .....

बीत न जाए शीत विभावरी

विभावरी तो विभा से  हारी

अंग अंग  को प्रीत गंध का

अनुपम  उपवन  होने  दो

क्षण भर पीर…

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Added by Sushil Sarna on November 29, 2016 at 8:34pm — 6 Comments

सिन्धु सी नयनों वाली (रोला गीत) भाग-२

लिपट चंद्रिका चंद्र, करें वे प्रणय परस्पर।

निरखें उन्हें चकोर, भाग्य को कोसें सत्वर।।

हाय रूप सुकुमार, कंचु अरुणाभा वाली।

स्वर्ग परी समरूप, सिन्धु सी नयनों वाली॥



व्याकुल हुए चकोर, मेघ चंदा को ढक ले।

रसधर सुन्दर अधर, हृदय कहता है छू ले।।

सीमा अपनी जान, लगे सब रीता खाली।

स्वर्ग परी समरूप, सिन्धु सी नयनों वाली॥



रहे उनीदे नैन, सजग अब निरखे उनको।

देख देख हरषाय, तृप्त करते निज मन को।।

हुए अधूरे आप, नहीं वह मिलने वाली।

स्वर्ग परी…

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Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on November 28, 2016 at 10:30pm — 8 Comments

गीतिका/सतविन्द्र कुमार राणा

आधार छन्द -- वाचिक भुजंगप्रयात

मापनी - 122 122 122 122

समान्त-- आ

पदान्त -- है

गीतिका

-------------------------------------------



बिना कर्म के कब किसे कुछ मिला है

करे कर्म जो साथ उसके खुदा है।



लिए माल को आज चिल्ला रहा जो

गरीबी है' क्या वो नहीं जानता है।



सदा श्रम से' सींचा है' जिसने जमीं को

उसी से ही' तो अन्न सबको मिला है।



नहीं मिलता' उसको जो है चाहता वो

बहुत कुछ मगर उसने सब को दिया है।



सही कर्म… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 28, 2016 at 7:48pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा - ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा

बेखुदी में तूने मेरे दोस्त ये क्या-क्या लिखा

 

वो तो सीधे रास्ते पर था मगर यह देखिये

नासमझ लोगो ने उसका हर क़दम उल्टा लिखा

 

एक मुद्दत से अदब में है सियासत का चलन

मैं अलग था नाम के आगे मेरे झूठा लिखा

 

जब तेरे दिल में कभी उभरा जो मंज़र शाम का

तूने काग़ज़ पर महज मय सागर-ओ-मीना लिखा

 

अब मुहब्बत पर अक़ीदत ही नहीं है लोगों को

इसलिए पाक़ीज़गी को ही…

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Added by शिज्जु "शकूर" on November 28, 2016 at 2:30pm — 20 Comments

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