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कोयल

बसंत की शोभा बनती  

कोयल मीठी बोलती

डाली डाली पर उड़ती

अमृत रस है घोलती

राही से कुछ कहती

नव उमंग से भरती

तन की पीड़ा हरती

मन में खुशियाँ भरती

कड़वाहट को दूर करती

सबका दिल है जीतती

प्यारी सबको लगती

कौवे पर नजर रखती

सदा मेहनत से बचती

घोसले का इंतेजार करती

मौका देख खुद अंडे देती

कौवे के अंडे बाहर करती

उसके संग साजिस करती

बच्चों को नहीं पालती

कोयल कौवे संग…

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Added by Ram Ashery on February 13, 2016 at 4:30pm — No Comments

नवगीत....’छंद माला के काव्य-सौष्ठ्व’

मन आंगन की चुनमुन चिड़िया,

चंचल चित्त पर धैर्य सिखाती.

‌गांव-शहर हर घर-आंगन में

इधर फुदकती उधर मटकती

फिर तुलसी चौरे पर चढ़ कर

 चीं चीं स्वर में गीत सुनाती

आस-पास के ज्वलन प्रदूषण

दूर करे इतिहास बुझाती.  1   मन आंगन की चुनमुन चिड़िया..

देह धोंसले घास-पूस के

मिट्टी रंग-रोगन अति सोंधी

आत्मदेव-गुरु हुये कषैले

सिर पर यश की थाली औंधी

बच्चों के डैने जब नभ को

लगे नापने, मां ! हर्षाती.   २   मन…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 13, 2016 at 3:00pm — 4 Comments

कोहरा (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

खुला दरवाज़ा देख कर वह सीधे अन्दर की ओर जाने लगी।



"शुभ प्रभात! आइये, अब कैसे आना हुआ?"



"भरी दोपहरी में अक्सर ख़ूब सताया है, सोचा ऐसे में इन्हें कुछ राहत दे दूँ! बच्चे तो होंगे न अंदर ?"- धूप ने अभिवादन स्वीकार कर झोपड़ी के दरवाज़े से कहा।



"नहीं, उन्हें भी सबके साथ काम पर जाना होता है भोर होते ही !" - दरवाज़े ने उत्तर दिया।



"इतने घने कोहरे में भी!"



"हाँ, अपने अपने पेट के लिए अपने हिस्से की कमाई के लिये..."



"ओह, यह कोहरा कैसे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 13, 2016 at 8:28am — 10 Comments

बसंत

(1)

आया बसंत

मेरा मन मलंग 

रंगों के संग

.

(2)

पीली सरसों 

इठलाती खेतों में 

मलय संग 



(3)

मुदित पुष्प 

सज कर रंगों से 

भौंरों के संग 

.

(4)

अमराई में 

कोयल की कुहुकें 

जल तरंग

.

(5)

विरह गीत 

मंजुल होठों पर 

अश्रु के संग 

.

(6)

तान सुरीली

दूर उपवन में 

राधा के संग 

.

(7)

लाल अगन 

दहके उपवन 

टेसू के…

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Added by Arun Kumar Gupta on February 12, 2016 at 4:30pm — No Comments

दीवानगी एक रोग (लघुकथा)/सतविंदर कुमार

मित्र के घर कि ओर जाना हुआ।घर के दरवाज़े पर दस्तक दी।दरवाज़ा खुला।पर दरवाज़ा खोलने वाले के चेहरे पर अज़ीब सा रूखापन।बहुत ही संक्षिप्त सा अभिवादन।चेहरा ही बहुत कुछ बोल रहा था।मित्र के बेटे का ,जिसने दरवाज़ा खोला ।घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करता है।ऐसा रूखापन उसके चेहरे पर पहले कभी नहीं देखा।वह बहुत हंसमुख और जिंदादिल लड़का है।आज उसकी भावभँगिमा शिकायत सी करती प्रतीत हो रही थी।

उसकी शिक्षा से सम्बन्धी बात हुई।फिर हाल चाल पूछा और अपने मित्र के बारे में पूछा।लड़के ने आश्चचर्य से देखा।उसका… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on February 12, 2016 at 3:10pm — 5 Comments

** कविता::सियाचीन के शहीदों के नाम **

सौ बार जनम दे मां मुझको, सौ बार तुझी पर मरना है,

सौ बार ये तूफां आने दे, बाहों में इसको भरना है,

ख्वाब है मेरा मां तुझपर सौ बार लुटानी हैं सांसे,

सौ बार तेरी गोदी में सोकर फख्र खुदी पर करना है,

जमती अन्तिम सांस ने जब ये शेरों की मानिन्द कहा,

तब वीरों के इस जज्बे को हर दुश्मन ने जय हिंद कहा ll



जो तूफां की सरशैया पर हंसते-हंसते लेटा हो,

हंसकर उसकी मां बोली हर मां का ऐसा बेटा हो,

फख्र है मुझको जाते-जाते सियाचीन की गोद भर गया,

खाली मेरी गोद नहीं…

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Added by Er Anand Sagar Pandey on February 12, 2016 at 11:00am — 8 Comments

"माँ शारदे वंदना "

भवदिव्य भाव मनोरमां,झन झनक झन झनकार दे

जय जयति जय जय ,जयति जय जय जयति जय माँ शारदे

कमलासिनी वरदायिनी माता हमें वरदान दे

जय जयति ........

चरणों में तेरे हैं समर्पित ज्ञान की ले याचना

वेदों का कर दो दान माते कर रहे हम प्रार्थना

माँ हम फसें मझधार में भवतारिणी तू तार दे

जय जयति.......

माँ छेड़ दो वो राग जिससे स्वरमयी धारा बहे

लोकों में तीनो मातु तेरी लोग सब जै जै कहें

स्वरदायनी माँ स्वरस्वती स्वर का हमें अधिकार दे

जय…

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Added by Amit Tripathi Azaad on February 12, 2016 at 10:00am — 1 Comment

ग़ज़ल-नूर ख़ुशबुओं का सफ़र

२१२२/१२१२/२२/

ख़ुशबुओं का सफ़र नहीं आया,
खत लिए नाम:बर नहीं आया.
.
सुब’ह, राहें भटक गया... कोई,
शाम तक उस का घर नहीं आया.
.
देर तुम से न देर मुझ से हुई,
वक़्त ही वक़्त पर नहीं आया.
.  
चलते चलते गुज़ार दी सदियाँ,
अब भी मौला का दर नहीं आया.   
.
जिस्म की छाँव में रखा जिन को,
उन पे मेरा असर नहीं आया.
.
‘नूर’ ऐसा!! निगाहें क्या उठती,
हश्र पर कुछ नज़र नही आया.
.
मौलिक / अप्रकाशित 
निलेश "नूर"

Added by Nilesh Shevgaonkar on February 11, 2016 at 6:40pm — 4 Comments

गजल

2122 2122 212

काँपती घाटी बुलाती है किसे
वादियाँ चुप अब उठाती हैं किसे?1

उलफतें अब हो रहीं बेजार हैं
मुफ्त की माशूका'भाती है किसे?2

हो गयी कुर्सी सियासत की कला
देखिये फिर से लुभाती है किसे?3

शोर कितने कर रहे बेघर सभी
सोचते हैं फिर बसाती है किसे?4

हो भले अपना निशाँ अब एकला
चंचला इसको थमाती है किसे?5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on February 10, 2016 at 9:00pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 2....//डॉ. प्राची

2122 2122 2122 212



हाय दिल में बस गयी एक गीत गाती सी नज़र ।

कुछ बताती सी नज़र और कुछ छुपाती सी नज़र ।



उसकी आहट से सिहर उठते हैं मेरे जिस्मो-जाँ

बाँचती है मुझको उसकी सनसनाती सी नज़र ।



ज़िन्दगी के फलसफे को पंक्ति दर पंक्ति पढ़ा

क्या गहनता नाप पाती सरसराती सी नज़र ?



आज फिर खामोश सहमा सा कहीं आँगन कोई

सूँघ ली क्या बच्चियों ने बजबजाती सी नज़र ?



कतरा कतरा हो रही है रूह जैसे अजनबी

मुझको मुझसे छीनती है हक़ जताती सी नज़र।…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 10, 2016 at 4:00pm — 9 Comments

दुकानदारी (लघुकथा ) जानकी बिष्ट वाही

" रॉय जी ! मुझे नायर जी ने बताया कि आप भी शिक्षा के क्षेत्र में बिजनेस करना चाहते हैं।"

 " जी हाँ, आप से इसी बारे में बात करनी है।आप दो- दो इंजिनियरिंग कॉलेज और एक मेडिकल कॉलेज चला रहे हैं।आपको काफी अनुभव होगा।"

 " रॉय जी ! इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना अब घाटे का सौदा है।मेरे ही दोनों कॉलेज में इस साल दो हज़ार सीटें खाली हैं ।समझ नहीं आ रहा लोगों को अब क्या हो गया।पहले तो हर माँ -बाप अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहते थे। " गुप्ता जी ने दीवार पर लगे गांधी जी की तस्वीर पर एक नज़र डालते…

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Added by Janki wahie on February 10, 2016 at 12:00pm — 8 Comments

गुनगुनाऊँ मैं- ग़ज़ल (पंकज)

1222 1222 1222 1222



सदा खामोश रहने से है बेहतर गुनगुनाऊँ मैं।

कभी खुद की कभी औरों की ख़ातिर मुस्कुराऊँ मैं।।



ग़मों के नीर से दुनिया तो वैसे ही लबालब है।

बताओ क्यों भला आँखों से दरिया इक बहाऊँ मैं।।



रुलाने के लिए कारण बहुत सारे हैं राहों में।

अभीप्सा है कि रोते मन को भीतर तक हंसाऊँ मैं।।



नहीं मालूम हूँ कितना सफल मैं इस प्रयोजन में।

बिना फल की किये चिंता करम करता ही जाऊँ मैं।।



हाँ इतना तो है तय लोगों के भावों तक पहुंच… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 9, 2016 at 11:00pm — 13 Comments

दिन गुज़रता रहा, रात ढलती रही (ग़ज़ल)

212 212 212 212



दिन गुज़रता रहा, रात ढलती रही

दिल में उम्मीद की शम्अ जलती रही



सोचकर,किस क़दर फ़ासला ये मिटे

रात-दिन ज़िंदगानी पिघलती रही



वाकया शह्र में आम ये हो गया

आदमी मर गया,साँस चलती रही



आदमी, आदमी को चबाता रहा

आदमीयत खड़ी हाथ मलती रही



बेक़ली, बेबसी, बेख़ुदी ना गई

सिर्फ कहने को ही रुत बदलती रही



कर गया था वो पूरी मेरी हर कमी

फिर,कमी उसकी ताउम्र खलती रही



एक गिरते हुए को उठा क्या… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2016 at 8:34pm — 11 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४४ (वक़्त गुज़रता है गुज़र जाता है)

वक़्त गुज़रता है गुज़र जाता है

जैसे धूप की सीढ़ियों से दिन 

पहाड़ों की रेल पकड़े-पकड़े 

हर रोज़ उतर जाता है 

जैसे शाम से आगे 

रात के अँधेरे में सूरज 

किसी अपरास्त सैनिक की मानिंद

भरे-भरे कदमों घर जाता है

बच्चे स्कूल और कॉलेज चले जाते हैं 

घर के कुत्ते भी खाना खाकर सो जाते हैं 

तोता पिंजरे में टांय टांय करके

झूले से उतर जाता है 

और घर के आँगन में 

पीपल का…

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Added by राज़ नवादवी on February 9, 2016 at 6:00pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४५ (हाँ, कुछ महीनों से घर बैठा हूँ)

हाँ, कुछ महीनों से घर बैठा हूँ

और इसलिए 

आजकल कविता ही लिखता हूँ

मगर तुम तो जानती हो 

कविता लिखने से काम तो नहीं चलता

बाजारों में कड़कते नोट चलते हैं 

और खनकते सिक्के 

रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए 

शायर का नाम तो नहीं चलता

हाँ, वाहवाहियाँ मिलती हैं

और शाबाशियाँ भी खूब

इरशाद इरशाद कहके चिल्लाते हैं 

और देते है तालियाँ भी खूब

लाइक्स भी मिलते हैं और…

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Added by राज़ नवादवी on February 9, 2016 at 6:00pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४3 (दिल रेल की पटरी है और तुम एक आती-जाती ट्रेन)

दिल रेल की पटरी है 

और तुम एक आती-जाती ट्रेन 

तुम सीने को रौंद के जाते हो 

तभी अच्छे लगते हो 

जब मुफ़स्सिल बियाबानों से 

कोहसारों की खुशबू लाते हो 

तभी अच्छे लगते हो 

कभी चलते-चलते सीटी बजाते, 

कभी पहियों से गुनगुनाते हो 

तभी अच्छे लगते हो 

कभी सुबह की किरणों के संग जगाते 

कभी रातों को झुरमुटों में सुलाते हो 

तभी अच्छे लगते हो 

कभी रुकने वाले स्टेशनों पर न रुक कर 

किसी अनजान से मोहल्ले में…

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Added by राज़ नवादवी on February 9, 2016 at 6:00pm — 4 Comments

तुम्हारी सोच में फिरका -ग़ज़ल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर "

1222    1222    1222    1222

**********************************

सदा सम्मान  इकतरफा  कहाँ तक  फूल  को दोगे

तिरस्कारों  की हर गठरी  कहाँ  तक शूल को दोगे /1



उठेगी  तो करेगी  सिर से  पाँवों तक बहुत गँदला

अगर तुम प्यार का कुछ जल नहीं पगधूल को दोगे /2



नदी  आवारगी  में  नित  उजाड़े  खेत  औ  बस्ती

कहाँ तक दोष इसका  भी कहो  तुम कूल को दोगे /3



तुम्हारी  सोच  में  फिरके  उन्हें ही पोसते हो नित

सजा  तसलीमा  रूश्दी को  दुआ मकबूल…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2016 at 11:00am — 12 Comments

लेन-देन की परम्परा [ अतुकांत कविता] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

लेन-देन की परम्परा

नीचे से ऊपर तक

छोटों से बड़ों तक



ऊपरवाला भी अब करता

व्यवसाय सी प्रक्रिया

कभी देता, कभी लेता

हिसाब बराबर सब करता

संकेतों को कौन समझता?



इन्सान ही तो कर्ता-धर्ता

दूर-तंत्र से नचता

विकास संग विनाश का मेला

रंगीन, संगीन, ग़मगीन

कोई बदनाम, कोई नामचीन



गति, प्रगति, मति या अति में

यति करती स्वत: प्रकृति

सृष्टि की अजब नियति

अवसरवादिता की प्रखर

मानव जैसी चतुर

लेन-देन की… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 9, 2016 at 9:18am — 8 Comments

नब्ज :लघुकथा: हरि प्रकाश दुबे

“वह दौड़ कर अपने बड़े भाई के गले से लग गया और बोला, भईया कितने दिनों बाद मिल रहा हूँ आपसे, बता नहीं सकता कितनी ख़ुशी हो रही है मुझे, बस इस महानगर में अपना ही घर खोजने में जरा सी दिक्कत हुई..हा हा ।“

“हाँ –हाँ ठीक है छोटे, और बताओ कैसे आना हुआ, सब ठीक तो है ना, और माँ-पिताजी कैसे हैं, एक-आध दिन तो रुकोगे ना?”

भाई की नीरसता को देखकर वह कुछ देर के लिए उलझन में पड़ गया पर मुस्कराते हुए बोला नहीं भईया आज ही निकल जाऊँगा, शाम की गाड़ी है, मैं तो बस आपको चाचा की लड़की की शादी का…

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Added by Hari Prakash Dubey on February 9, 2016 at 8:30am — 11 Comments

थाप पे तबले की ....



थाप पे तबले की ....

थाप पे  तबले  की  घुंघरू बजने लगे

किसने  पहचानी  इनकी  परेशानियां

दाम लगने लगे ज़िस्म थिरकने लगे

आई नज़र में नज़र तो बस हैवानियाँ

थाप पे तबले की ......

सब  खरीददार  थे  कोई  अपना न था

सूनी  आँखों  में  कोई भी सपना न था

चीर डाला  हर  एक  हाथ ने जिस्म को

बज़्म में चश्म से दर्द छलकना  न  था

शोर साँसों  की सिसकी का हर ओर था

हर  सिम्त  थी  बस नादान नादानियां

पाँव  घुंघरू  बंधे  महफ़िल में बजते रहे

किसने  …

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Added by Sushil Sarna on February 8, 2016 at 9:58pm — 8 Comments

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