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कबाड़ी काल

 कुछ भी

अनुपयोगी नहीं है

उसके लिए

सभी पर है

उसकी निगाहें 

गहन कूड़े से भी

बीन और लेता है छीन

वह

प्राप्य अपना 

जो है जगद्व्यव्हार में

वह भी

और जो नहीं है वह भी

बीन लेगा एक दिन वह 

पेड़ –पौधे,  नदी=-पर्वत

और पृथ्वी

यहां तक की जायेगा ले    

सूरज गगन, नीहार, तारे

चन्द्र भी

ब्रह्माण्ड के सारे समुच्चय

लोग कहते हैं प्रलय 

कहते रहे  

किन्तु तय है

बीन…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 14, 2016 at 7:22pm — 4 Comments

दर्द खामोशियों

212 212 212 212
दर्द खामोशियों में लिखूंगा तुम्हे
गर मुनासिब हुआ तो सिउँगा तुम्हे

याद हर एक पन्ना किताबां बना
मैं जिगर में हमेशा रखूँगा तुम्हे

मैंकदों से नहीं है मेरा वास्ता
पर जरूरी हुआ तो पिऊंगा तुम्हे

हौसलों इस कदर टूट बिखरे अगर
तुम ही बोलो तो कैसे जिऊंगा तुम्हे

जिंदगी शक न कर तू मेरे वादे पर
मुस्कुराता हुआ ही मिलूँगा तुम्हे

Added by amod shrivastav (bindouri) on February 14, 2016 at 6:03pm — 1 Comment

शहीद हनुमन्थप्पा के नाम [अतुकांत ... प्रतिभा पांडे ]

ठिठका तो था वो 

एक पल को देहरी पर 

और फिर निकल गया I

शायद सुन ली होंगी

घर के अन्दर से आती हुई आवाजें

मुट्ठी भींचे ,नारे लगाती,

भ्रामित भी था

कि बाहर से आ रही हैं 

या घर के अन्दर से 

कि बाहर की  ऐसी ही आवाजों को 

रोकने के लिये ही तो 

ओढ़ी थी सफ़ेद मौत उसने 

फिर ये घर के अन्दर से कैसे ?

समझ नहीं सका होगा कुछ 

और फिर थक कर

 निकल गया उस पार 

हर भ्रम से दूर I…

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Added by pratibha pande on February 14, 2016 at 6:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल (निभा रहे हैं )

 ग़ज़ल ( निभा रहे हैं )

  12122 ----12122)

फरेब उल्फ़त में खा रहे हैं /

सितमगरों से निभा रहे हैं /

घटाएं हों क्यों न पानि पानी

वो छत पे ज़ुल्फ़ें सुखा रहे हैं /

हुई है  मुद्दत ये सुनते सुनते

वो मुझको अपना बना रहे हैं /

शराब ख़ोरी तो है  बहाना

किसी को दिलसे भुला रहे हैं /

लगाके इल्ज़ाम दूसरों पर

वो अपनी ग़लती छुपा रहे हैं /

मेरे लिए बज़्म में वो आये

मगर सभी फ़ैज़ पा…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2016 at 11:47am — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 3 ....// डॉ. प्राची



212 212 212 212

संग सुख-दुख सहेंगे ये वादा रहा।

साथ हर वक्त देंगे ये वादा रहा।

चाँदनी रात में ओढ़ कर चाँदनी

तुम जो चाहो, जगेंगे ये वादा रहा।

हाथ सर पर दुआओं का बस चाहिए

हम भी ऊँचा उढ़ेंगे ये वादा रहा।

राह काँटो भरी ये पता है हमें

हौसलों पर बढ़ेंगे ये वादा रहा।

दीप बाती से हम, जब भी मिल कर जले

हर अँधेरा हरेंगे ये वादा रहा।

देह के पार जो चेतना द्वार है

हम वहाँ पर मिलेंगे…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 14, 2016 at 11:30am — 5 Comments

काले काले घोड़े (नवगीत)

पहुँच रहे मंजिल तक

झटपट

काले काले घोड़े

 

भगवा घोड़े खुरच रहे हैं

दीवारें मस्जिद की

हरे रंग के घोड़े खुरचें

दीवारें मंदिर की

 

जो सफ़ेद हैं

उन्हें सियासत

मार रही है कोड़े

 

गधे और खच्चर की हालत

मुझसे मत पूछो तुम

लटक रहा है बैल कुँएँ में

क्यों? खुद ही सोचो तुम

 

गाय बिचारी

दूध बेचकर

खाने भर को जोड़े

 

है दिन रात सुनाई देती

इनकी टाप सभी…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 14, 2016 at 11:03am — 4 Comments

चौकीदारी - ( लघुकथा ) –

चौकीदारी -  ( लघुकथा )  –

"तिवारी जी,सुना है आप के तो दौनों बेटे बहुत बडे   गज़टैड अफ़सर हैं!आप कैसे आ फ़ंसे यहां बृद्धाश्रम में"!

"सुनील जी, मैं तो यहां स्वेच्छा से आया हूं, बच्चे तो बहुत ज़िद करते हैं अपने साथ रखने की"!

"क्यों मज़ाक करते हो तिवारी जी,दिल बहलाने को सब यही कहते हैं, पर कौन अपना घर परिवार छोड कर यहां आता है"!

"यह मज़ाक नहीं,हक़ीक़त है"!

"फ़िर इसके पीछे कोई विशेष कारण रहा होगा"!

"ठीक सोचा आपने"!

"अगर ऐतराज़ ना हो तो वह कारण भी बता…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 14, 2016 at 10:56am — 12 Comments

संग क़ातिल का तू मांगता, क्या करूँ- ग़ज़ल इस्लाह के लिये

2122 122 122 12
है गज़ब का तेरा, मामला क्या करूँ।
संग क़ातिल का तू, मांगता क्या करूँ।।

ये मुहब्बत की औ मुस्कुराने की ज़िद।
मन तू पागल हुआ, जा रहा क्या करूँ।

डूबकर तू नज़र के समन्दर में भी।
आंसुओं से बचत, चाहता क्या करूँ।।

जाल में खुद उलझ कर परिंदे बता।
ख्वाब परवाज़ के, देखता क्या करूँ।।

तू बता खुद ही तू, रास्ता अब दिखा।
आग से प्यास का, फैसला क्या करूँ।।

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 14, 2016 at 10:01am — 7 Comments

एक थी रानी (लघुकथा )राहिला

लंदन से जावेद को लौटे सिर्फ दो दिन ही हुये थे । और इन दो दिनों में वो खूब समझ गया था कि इस बार अम्मी-अब्बू किसी भी सूरत में उसकी शादी से फारिग होना चाहिते हैं। अब वो वक्त आ गया था जब उसे अपनी मुहब्बत का खुलासा कर देना चाहिये।

"अब्बा!मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है।"वो सोफे पर धसते हुये बोला ।

"किस बारे में?"

"जी..शादी के बारे में।"

"हां..हां..कहो।"

"दरासल मैं एक लड़की को बहुत पहले से पसंद करता हूं और चाहता हूं कि आप उसके घर पैगाम भिजवा दें।"कह वो अब्बा का चेहरा पढ़ने… Continue

Added by Rahila on February 14, 2016 at 12:03am — 14 Comments

अपने अपने सपने--

बनारसी गईया चरा के लौटे और उनको चरनी पर बाँध के पीठ सीधा करने के लिए झोलंगी खटिया पर लेट गए। इस बार पानी महीनों से बरस नहीं रहा तो घाँस भी कम हो गयी है सिवान में, गर्मी अलग बढ़ गयी है। गमछी से माथे का पसीना पोंछते हुए मेहरारू को आवाज़ दिए " अरे तनी एक लोटा पानी त पिलाओ रघुआ की महतारी, बहुत गरम है आज"। दरवाज़े पर नज़र दौड़ाये तो साइकिल नहीं दिखी, मतलब रघुआ कहीं निकला है।

" कहाँ गायब हौ तोहार नवाब, खेत बारी से कउनो मतलब त नाहीं हौ, कम से कम गईया के ही चरा दिहल करत", पानी लेते हुए मेहरारू से…

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Added by विनय कुमार on February 13, 2016 at 11:48pm — 6 Comments

लघुकथा (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"लघुकथा" साहित्यिक पत्रिका की वर्षगाँठ समारोह में नये व पुराने लेखकगण, एक दूसरे से रूबरू हुए। इस अवसर पर विशेष रूप से लगायी गई पेंटिंग को सभी ग़ौर से देख रहे थे।



"यह जो लकड़ी की रचना देख रहे हो न, यह दरवाज़ा रूपी एक उत्कृष्ट लघुकथा है, लघुकथा के फ्रेम में विधिवत संयोजित!"- पुराने ने एक नये लेखक को बताते हुए कहा।



"और ये खड़ी पट्टियां और पैबंद से...?"



"ये तीनों खड़ी पट्टियां क्रमशः लघुकथा का आरंभ, मध्य भाग और अंतिम भाग हैं... और वे आड़े से तीनों पैबंद नहीं हैं, वे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 13, 2016 at 11:05pm — 3 Comments

कोयल

बसंत की शोभा बनती  

कोयल मीठी बोलती

डाली डाली पर उड़ती

अमृत रस है घोलती

राही से कुछ कहती

नव उमंग से भरती

तन की पीड़ा हरती

मन में खुशियाँ भरती

कड़वाहट को दूर करती

सबका दिल है जीतती

प्यारी सबको लगती

कौवे पर नजर रखती

सदा मेहनत से बचती

घोसले का इंतेजार करती

मौका देख खुद अंडे देती

कौवे के अंडे बाहर करती

उसके संग साजिस करती

बच्चों को नहीं पालती

कोयल कौवे संग…

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Added by Ram Ashery on February 13, 2016 at 4:30pm — No Comments

नवगीत....’छंद माला के काव्य-सौष्ठ्व’

मन आंगन की चुनमुन चिड़िया,

चंचल चित्त पर धैर्य सिखाती.

‌गांव-शहर हर घर-आंगन में

इधर फुदकती उधर मटकती

फिर तुलसी चौरे पर चढ़ कर

 चीं चीं स्वर में गीत सुनाती

आस-पास के ज्वलन प्रदूषण

दूर करे इतिहास बुझाती.  1   मन आंगन की चुनमुन चिड़िया..

देह धोंसले घास-पूस के

मिट्टी रंग-रोगन अति सोंधी

आत्मदेव-गुरु हुये कषैले

सिर पर यश की थाली औंधी

बच्चों के डैने जब नभ को

लगे नापने, मां ! हर्षाती.   २   मन…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 13, 2016 at 3:00pm — 4 Comments

कोहरा (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

खुला दरवाज़ा देख कर वह सीधे अन्दर की ओर जाने लगी।



"शुभ प्रभात! आइये, अब कैसे आना हुआ?"



"भरी दोपहरी में अक्सर ख़ूब सताया है, सोचा ऐसे में इन्हें कुछ राहत दे दूँ! बच्चे तो होंगे न अंदर ?"- धूप ने अभिवादन स्वीकार कर झोपड़ी के दरवाज़े से कहा।



"नहीं, उन्हें भी सबके साथ काम पर जाना होता है भोर होते ही !" - दरवाज़े ने उत्तर दिया।



"इतने घने कोहरे में भी!"



"हाँ, अपने अपने पेट के लिए अपने हिस्से की कमाई के लिये..."



"ओह, यह कोहरा कैसे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 13, 2016 at 8:28am — 10 Comments

बसंत

(1)

आया बसंत

मेरा मन मलंग 

रंगों के संग

.

(2)

पीली सरसों 

इठलाती खेतों में 

मलय संग 



(3)

मुदित पुष्प 

सज कर रंगों से 

भौंरों के संग 

.

(4)

अमराई में 

कोयल की कुहुकें 

जल तरंग

.

(5)

विरह गीत 

मंजुल होठों पर 

अश्रु के संग 

.

(6)

तान सुरीली

दूर उपवन में 

राधा के संग 

.

(7)

लाल अगन 

दहके उपवन 

टेसू के…

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Added by Arun Kumar Gupta on February 12, 2016 at 4:30pm — No Comments

दीवानगी एक रोग (लघुकथा)/सतविंदर कुमार

मित्र के घर कि ओर जाना हुआ।घर के दरवाज़े पर दस्तक दी।दरवाज़ा खुला।पर दरवाज़ा खोलने वाले के चेहरे पर अज़ीब सा रूखापन।बहुत ही संक्षिप्त सा अभिवादन।चेहरा ही बहुत कुछ बोल रहा था।मित्र के बेटे का ,जिसने दरवाज़ा खोला ।घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करता है।ऐसा रूखापन उसके चेहरे पर पहले कभी नहीं देखा।वह बहुत हंसमुख और जिंदादिल लड़का है।आज उसकी भावभँगिमा शिकायत सी करती प्रतीत हो रही थी।

उसकी शिक्षा से सम्बन्धी बात हुई।फिर हाल चाल पूछा और अपने मित्र के बारे में पूछा।लड़के ने आश्चचर्य से देखा।उसका… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on February 12, 2016 at 3:10pm — 5 Comments

** कविता::सियाचीन के शहीदों के नाम **

सौ बार जनम दे मां मुझको, सौ बार तुझी पर मरना है,

सौ बार ये तूफां आने दे, बाहों में इसको भरना है,

ख्वाब है मेरा मां तुझपर सौ बार लुटानी हैं सांसे,

सौ बार तेरी गोदी में सोकर फख्र खुदी पर करना है,

जमती अन्तिम सांस ने जब ये शेरों की मानिन्द कहा,

तब वीरों के इस जज्बे को हर दुश्मन ने जय हिंद कहा ll



जो तूफां की सरशैया पर हंसते-हंसते लेटा हो,

हंसकर उसकी मां बोली हर मां का ऐसा बेटा हो,

फख्र है मुझको जाते-जाते सियाचीन की गोद भर गया,

खाली मेरी गोद नहीं…

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Added by Er Anand Sagar Pandey on February 12, 2016 at 11:00am — 8 Comments

"माँ शारदे वंदना "

भवदिव्य भाव मनोरमां,झन झनक झन झनकार दे

जय जयति जय जय ,जयति जय जय जयति जय माँ शारदे

कमलासिनी वरदायिनी माता हमें वरदान दे

जय जयति ........

चरणों में तेरे हैं समर्पित ज्ञान की ले याचना

वेदों का कर दो दान माते कर रहे हम प्रार्थना

माँ हम फसें मझधार में भवतारिणी तू तार दे

जय जयति.......

माँ छेड़ दो वो राग जिससे स्वरमयी धारा बहे

लोकों में तीनो मातु तेरी लोग सब जै जै कहें

स्वरदायनी माँ स्वरस्वती स्वर का हमें अधिकार दे

जय…

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Added by Amit Tripathi Azaad on February 12, 2016 at 10:00am — 1 Comment

ग़ज़ल-नूर ख़ुशबुओं का सफ़र

२१२२/१२१२/२२/

ख़ुशबुओं का सफ़र नहीं आया,
खत लिए नाम:बर नहीं आया.
.
सुब’ह, राहें भटक गया... कोई,
शाम तक उस का घर नहीं आया.
.
देर तुम से न देर मुझ से हुई,
वक़्त ही वक़्त पर नहीं आया.
.  
चलते चलते गुज़ार दी सदियाँ,
अब भी मौला का दर नहीं आया.   
.
जिस्म की छाँव में रखा जिन को,
उन पे मेरा असर नहीं आया.
.
‘नूर’ ऐसा!! निगाहें क्या उठती,
हश्र पर कुछ नज़र नही आया.
.
मौलिक / अप्रकाशित 
निलेश "नूर"

Added by Nilesh Shevgaonkar on February 11, 2016 at 6:40pm — 4 Comments

गजल

2122 2122 212

काँपती घाटी बुलाती है किसे
वादियाँ चुप अब उठाती हैं किसे?1

उलफतें अब हो रहीं बेजार हैं
मुफ्त की माशूका'भाती है किसे?2

हो गयी कुर्सी सियासत की कला
देखिये फिर से लुभाती है किसे?3

शोर कितने कर रहे बेघर सभी
सोचते हैं फिर बसाती है किसे?4

हो भले अपना निशाँ अब एकला
चंचला इसको थमाती है किसे?5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on February 10, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

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