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तुम इस ही बहाने आओ भी

16 रुक्नी ग़ज़ल

=================================

हम अब भी साँसें खींच रहे; कुछ और सितम तुम ढ़ाओ भी।

दीदार तो होगा कम से कम; तुम इस ही बहाने आओ भी।।



कल सुब्ह चले जाना ये शब, तूफ़ान भरी को बीतने दो।

बादल झरते हैं आँखों से, बरसात है तुम रुक जाओ भी।



अरमान भरे दिल की दुनिया, उजड़ी है अभी बर्बाद हुई।

बस बाकी है दीवार ज़रा, माटी में इसको मिलाओ भी।।



तैयार ज़रा कर दो मुझको, बिखरा बिखरा हूँ ठीक नहीं।

शृंगार अधूरा है मेरा, कुछ मोती मुझपे चढ़ाओ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 2, 2015 at 10:30pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
नज़र अपनी सितारों पर टिकाने से जरा पहले--(ग़ज़ल)--मिथिलेश वामनकर

1222—1222—1222—1222

 

नज़र अपनी सितारों पर टिकाने से जरा पहले

जमीं पर तुम जमा लेना सलीके से कदम अपने

 

फलक को चाँद भी रौशन करे खुद के उजालों…

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Added by मिथिलेश वामनकर on November 2, 2015 at 5:28pm — 14 Comments

"शह और शिकस्त" - [लघुकथा] 25 (शतरंज संदर्भित) - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"शह और शिकस्त" - (लघुकथा)



दोनों अलमारी में बहुत ही गोपनीय तरीके से रखे गए थे कई आवरणों से लपेट कर पैकेटों में। काले धन का पैकेट और कंडोम का पैकेट।



"आख़िर तुम गलकर सड़ ही गये न ! उत्पत्ति को रोकने के लिए किसने किया तुम्हारा उपयोग "- काले धन ने कहा।



"सच कहते हो" - कंडोम का पैकेट बोला - " जब तुम्हारी व्यवस्था करने में ही पुरुष दिन-रात एक करेगा, तो दाम्पत्य कर्तव्य वह कैसे निभायेगा , और निभायेगा भी तो उतावलेपन में मेरा इस्तेमाल करेगा कौन,भले उत्पत्ति होती रहे, कष्ट… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 2, 2015 at 5:09pm — 1 Comment

ग़ज़ल- सारथी || इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है ||

इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है 

ऐतबार ऐतबार है तो है /१

मैं हूँ नादाँ अगर तो, हूँ तो हूँ 

वो अगर होशियार है तो है /२ 

छोड़कर मुझको सिर्फ़ इक वो चाँद 

हिज़्र का राज़दार है तो है /३  

कल वो हँसता था मेरी हालत पर 

वो भी अब बेक़रार है तो है /४ 

दीद का लुत्फ़ हो गया हासिल 

अब नज़र कर्ज़दार है तो है /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: २१२२ १२१२ २२ 

Added by Saarthi Baidyanath on November 2, 2015 at 3:30pm — 4 Comments

"माहौल" एक सच्चाई

ऑफिस से आकर सबसे पहले टीवी ऑन किया तो गलती से दूरदर्शन लग गयाI  इसे देख कर लगा की  देश अपनी रफ़्तार से प्रगति कर रहा हैI चारों और शांति हैI सब अपना अपना काम कर रहे हैI हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब एकता की मिसाल दे रहे हैI और भारत दुनिया के अग्रसर देशो में शुमार होने जा रहा हैI लेकिन जैसे ही निजी न्यूज़ चेंनलो की और बढ़ा तो लगा,  देश में साम्प्रदायक माहौल बिगड़ गया हैI चारो और हत्याए हो रही हैI हर जगह दंगे भड़क गए हैI  चारो और धारा144 लगी हुई हैI सवर्ण दलितों को मार रहे हैI जगह जगह बलात्कार हो…

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Added by harikishan ojha on November 2, 2015 at 2:10pm — 7 Comments

वो कहते हैं तू पत्थर है।

वो कहते हैं तू कट्टर (पत्थर) है

बहर:-1222-1222-1222-1222



नहीं मिलती तबीयत तो ,वो कहते हैं तू पत्थर है

मगर जाना नही उसने, की कितना मन समंदर है



हुई हरकत बुरी हमसे ,बदलने की जो कोशिस की

तभी मालुम हुआ हमको, खिलाड़ी तो सितमगर है



सिला अपनी मुहब्बत का,लिखा पन्ने पे जब मैंने

खुदा भी रो पड़ा बोला, धरा का तू सिकंदर है



जो मुंसिफ घर गया उनके, उधारी में दिया लेने

चिरागां हंस के बोला तब,अँधेरा तेरे अंदर है



बताओ रास्ता मुझको…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on November 2, 2015 at 1:30pm — 11 Comments

कोख जाया [लघु कथा ]

नवेली बहू और बेटे के साथ आँगन में मेहमान जमे थे I तभी  जोर जोर से तालियाँ और मर्दानी आवाजों में गाते , चार हिजड़े घर में आ गए  I  घबरा कर वो अन्दर आ गई I तालियों की आवाज़ चेतना में हथौड़े चला रही थी I

"बहू वो नेग लेने आये हैं I तू भी बाहर आ जा ,दूल्हे की अम्मा है तू " सास अन्दर आ गई थी I "क्या हुआ ? थक गई है ?रहने दे ,आराम कर " I

सास के बाहर जाते ही वो  पलंग पर गिर गई Iआँखों से यादें बहकर चादर भिगोने लगीं Iपचास साल पहले उसके घर भी आये थे ये ,तालियाँ बजाते नेग लेने नहीं , छोटे…

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Added by pratibha pande on November 2, 2015 at 1:00pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
संसार हो गया है, अब अंगहीन जैसे---(ग़ज़ल)--- मिथिलेश वामनकर

221—2122—221--2122

 

संसार हो गया है, अब अंगहीन जैसे

सब लोग सोचते है, केवल मशीन जैसे

 

ये जात ही जुदा है, बस नाम ‘लोकसेवक’…

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Added by मिथिलेश वामनकर on November 1, 2015 at 11:00pm — 14 Comments

गजल(मनन)

गजल

2122 2122 122

जब से'मैं बातें बनाने लगा हूँ,

मैं समझ में खूब आने लगा हूँ।

गालियाँ खायी बयाँ की हकीकत,

झूठ कह अब उनको' भाने लगा हूँ।

आरजू थी वे बुला लेते कभी,

मैं अभी उनके ठिकाने लगा हूँ।

तंग था मैं तंगदिल से निभाते,

ठाँव अब दिल में बनाने लगा हूँ।

तर्ज़ भी तब्दील होगी अभी तो,

बात से अब मैं रिझाने लगा हूँ।

गुत्थियाँ उलझी पड़ी थीं कभी की,

हौले'-से बातें बुझाने लगा हूँ।

हो रहा मैं हूँ अदीबो-मुकम्मिल,

उनके' मन का गीत गाने… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 1, 2015 at 10:00pm — 11 Comments

- अंधे-

- अंधे - ( लघु कथा )



" माई ओ माई ! " चिल्लाते हुए श्यामू ने राम रत्ती को आवाज़ लगाई।

" क्या है रे ! आज़ कौन सा तीर मार लाया ?"

" ये ले माई !" तेल से भरा डिब्बा और चावल उरद की कच्ची खिचड़ी सामने रख दी।

" वाह , और पैसे ?"

" ये ले पूरे 86 रूपये हैं ।"

" बहुत खूब बेटा ! दस-पन्द्रह दिन तो खाने का अच्छा जुगाड़ हो गया।"



" माई ! एक बात मेरी समझ में नहीं आती ?"

" क्या ?" सामान सहेजती रामरत्ती ने नज़रें उठाई।

" सारे लोग अपनी अला-बला ज़ादू -टोना हर… Continue

Added by Janki wahie on November 1, 2015 at 6:40pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
परवाह उसको है कहाँ कितने शज़र गए(ग़ज़ल 'राज')

221  2121  1221  212

 

उनके खजाने जैसे ही वोटों से भर गये                                                                                                                                       नकली लगे हुए वो मुखौटे उतर गये

आकाश में उड़े न उड़े फिक्र क्या उन्हें

,जाते हुए गरीब के वो पर कुतर गए

 …

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Added by rajesh kumari on November 1, 2015 at 6:30pm — 15 Comments

अच्छा तो ! हिन्दुस्तान के हो तुम " अज्ञात "

लकीरें खींच कर सब लोग,                        

मुझसे पूछते हैं जब,                               

असम के हो ,या जम्मू के,                    

या राजस्थान के हो तुम ,                      

मैं कहता हूँ, वहाँ का हूँ,                        

जहाँ की, सोना है माटी,                     

जहाँ सौहार्द का मेला,                        

जहाँ की प्रेम परिपाटी ,                         

वो कहते हैं…

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Added by Ajay Kumar Sharma on November 1, 2015 at 3:54pm — 2 Comments

मुहब्बत का शहर हु मैं..

मुहब्बत का शहर हूँ मैं

बहर :- 1222-1222-1222-1222



मुहब्बत का शहर हूँ मै मुझे बस प्यार होता है

मगर तनहा वही होता है जो खुद्दार होता है





शिकायत है मुहब्बत की की जो रूठा नहीं लौटा

सियासत है कि फितरत है नही ऐतबार होता है



कभी मिटता नहीं दिल से मुहब्बत का वो पहला गम

के दिल में बस गया कुछ भी नही उपचार होता है



अगर पतझड़ जो आया है तो हिस्से में बहारे हैं

ये किस्मत तब पलटती है जहाँ मजधार होता है



बदलता रुख हवाओं का जरा… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on November 1, 2015 at 2:57pm — 6 Comments

ग़ज़ल -- दोस्तों का दिनेश भाई है

2122--1212--22



पीर आँखों में जो पराई है

हम फकीरो की ये कमाई है



दौरे-हाज़िर में रोज़ सूरज ने

इन अँधेरों से मात खाई है



बाप को फिर से एक बेटे ने

उसकी नज़रों की हद बताई है



जिसने रिश्वत में रोशनाई दी

उस पे किसने क़लम उठाई है



अपनी हद में रहो, सबक देकर

मौज़ साहिल से लौट आई है



क्या ज़मीं आसमान मिल ही गए

कहकशां जो ये मुस्कुराई है



दुश्मनों का अगरचे है दुश्मन

दोस्तों का दिनेश भाई… Continue

Added by दिनेश कुमार on November 1, 2015 at 2:55pm — 4 Comments

है हरा पीपल अभी जो....

है हरा पीपल

बहर:- 2122-2122-2122-212



है हरा पीपल अभी जो जिंदगी है आप की

कुछ कही कुछ अनकही बातें लिखी है आप की



प्रेम की तब छांव लेने को जहा थे बैठते

वो तसब्बुर वो अदाये कीमती है आप की



लोक नजरों से बचा कर जो भिजाये थे कभी

उन गुलाबों में अभी खुसबू वही है आप की



वो दुपट्टे का झटकना वो सदाये प्यार की

लफ्ज का ठिठकाव् न्यारा सादगी है आप की



(है पुरानी गर्त लिपटी कुछ किताबे वही)

कुछ पुरानी गर्त लिपटी उन किताबों में… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on November 1, 2015 at 11:37am — 9 Comments

मन की देवी कुछ पल ठहरो

2222 2222 2222 2222

(16 रुक्नी ग़ज़ल- बीच बीच में 2 मात्रा को 1-1 भी लिखा गया है)

=====================================

मन की देवी कुछ पल ठहरो, मैं तेरा शृंगार तो कर लूँ।

इन आँखों से झरते हैं जो, उन मोती के हार तो गढ़ लूँ।।



जिस मन्दिर को तोड़ चली हो, उससे बहते रक्तिम रस से।

तेरे इन गोरे हाथों पर, मेहदी बन कर आज बिखर लूँ।।



कुंडल कंगन बिंदिया बाली, ये तेरे होंठों की लाली।

दिल की भष्म से करके टीका, इनकी नज़र मैं आज तो हर लूँ।।



जाना है तो… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 1, 2015 at 10:46am — 10 Comments

मीर के जैसी गज़लें कहना सबके बस की बात नही।

हाले गमे तन्हाई लिखना सबके बस की बात नही।

दीवानो सी बातें करना सबके बस की बात नही।



दोस्ती यारी सब करते हैं आज भी इन्सां दुनिया में

कृष्ण सुदामा जैसी निभाना सबके बस की बात नही।



हँसते बच्चों को तो रुलाना होता हैं आसान यहाँ

रोते को है आज हँसाना सबके बस की बात नही।



हमने लिखा है नाम तुम्हारा दिल के लहू से कागज़ पर

कैसे कहें हम इसको मिटाना सबके बस की बात नही।



दो मिसरों को जोड़ के हमने गज़लें तो कह डाली हैं

मीर के जैसी गज़लें कहना सबके… Continue

Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on November 1, 2015 at 8:37am — 6 Comments

फिसली फसल

         

           "क्या मम्मी आप भी जरा-जरा सी बातों पर तुनक पड़ती हो,पूरा आसमान सिर पर उठा लेती हो.पापा के दोस्तों के बीच में ही तो थीं आप   वे लोग कोई जानवर तो नहीं,हँसी-मजाक ही तो किया चीर हरण तो नहीं.."सुनकर खून उतर आया था उसकी आँखों में,अपनी ही लाठी,अपने पर वार,तिलमिलाते हुए पलकें बंद कर ली तो दर्द आंसू बन बह निकला.वह सोचने लगी,

     'उम्र की पहली फसल बाबा की अँगुलियों में अटक गई,सतरंगी सपने उड़े भी न थे कि उम्र की दूसरी फसल बिन हवा-पानी घूँघट में उजड़ गई और तीसरी को तो…

Continue

Added by asha jugran on October 31, 2015 at 11:30pm — 17 Comments

कैश बाॅक्स के नजारे

साफ़ नीला आसमान

सफेद रूई सा हल्का

बिलकुल हल्का ,

हल्का वाला सफेद बादल

कभी बहुत भारी सा हो जाता है

वक्त रेशम सी ,

रेशम सी मुलायम वक्त

फिसलती हुई ,सरकती हुई

रेशमी सा एहसास देती हुई गुजर जाती है

वक्त के वजूद में

जाने क्यों पहिए होते है

जो दिखाई नहीं देते पर ब्रेक नहीं होते है

शायद ब्रेक भी रहें हो कभी लेकिन

आजकल वक्त  नहीं रूकता

यहाँ बाजार में बहुत भीड़ है

यह भीड़ कभी खत्म नहीं…

Continue

Added by kanta roy on October 31, 2015 at 10:09am — 6 Comments

आज मेरे गाँव से गली ओझल हो गयी। "अज्ञात "

जब थी उठी बरसात से,                        

पहले पहल भीनी महक,                         

था मन तरंगित हो उठा,                              

सुन पक्षियों की चह चहक,                                   

गुमशुदा, अब बाग से,                       

क्यों कली कोमल हो गयी।                       

बीते पलों को याद कर,                         

आँख, बोझल हो गयी।

पत्थरों की शगल में,                               

सड़क सौतन क्या…

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 30, 2015 at 7:04pm — 3 Comments

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