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एक ताज़ा नवगीत -----जगदीश पंकज---मैं स्वयं निःशब्द हूँ,



एक ताज़ा नवगीत -----जगदीश पंकज

मैं स्वयं निःशब्द हूँ,

निर्वाक् हूँ

भौंचक्क ,विस्मित

क्यों असंगत हूँ

सभी के साथ में

चलते हुए भी

खुरदरापन ही भरा

जब जिंदगी की

हर सतह पर

फिर कहाँ से खोज

चेहरे पर सजे

लालित्य मेरे

जब अभावों के

तनावों के मिलें

अनगिन थपेड़े

तब किसी अवसाद

के ही चिन्ह

चिपकें नित्य मेरे

मुस्कराते फूल

हंसती ओस

किरणों की चमक से …

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Added by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on June 19, 2014 at 7:30pm — 34 Comments

बरसाती बादल आ ही गए

बरसाती बादल आ ही गए, ठंढक थोड़ी पहुंचा ही गए.

तपती धरती, झुलसाते पवन, ऊमस की थी घनघोर घुटन,

खाने पीने का होश नहीं, 'बिजली कट' और बढ़ाते चुभन

अब अम्बर को देख जरा, बिजली की चमक दिखला ही गए... बरसाती बादल आ ही गए,

सरकारें आती जाती है, बिजली भी आती जाती है,

वादों और सपनों की झोली,जनता को ही दिखलाती है

पर एक नियंता ऐसा भी, बस चमत्कार दिखला ही गए... बरसाती बादल आ ही गए,

अंकुरे अवनि से सस्य सुंड, खेतों में दिखते कृषक…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 19, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

गजल- चल रही है आँंधियॉं...

गजल- चल रही है आँंधियॉं...

बह्र-- 2122 2122 2122 212

जिन्दगी है आस्मां हर ओर खालीपन चुभे। 

आजकल की दास्तां हर ओर खालीपन चुभे।।

चॉंद, अपनी चॉंदनी रखता नहीं जब पास में,

मेघ-मावस से जहां हर ओर खालीपन चुभे।1

भोर की लाली चहक कर मॉंगती वर खास है,

सॉंझ को लुटती यहां हर ओर खालीपन चुभे।2

प्यार आँंखों में दिलों में दर्द का दरिया बहे,

डूबती कश्ती शमां हर ओर खालीपन चुभे।3

झॉंकते हैं अब झरोखों से…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 19, 2014 at 1:30pm — 19 Comments

अहं के ताज़ को

अहं के ताज़ को ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है

तो कहीं भय से की जाती है

कभी मन्नत के लिए की जाती है

तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो

ये निशिचित है

पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले

हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं

अपनी इच्छाओं पर

अपना अधिकार जताते हैं

इधर…

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Added by Sushil Sarna on June 19, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

जिसको तुमने खोया माना-डा० विजय शंकर

जिसको तुमने खोया माना है ,

उसको मैंने पाया जाना है ।

कुछ अटपटा , उलटा सा लगता है ,

पर जिन्दगीं तुमको मैंने ऐसा ही जाना है

जो खो गया , वो क्या ले गया ,

हाँ, अपनी स्मृतियाँ छोड़ गया ||

कुछ मीठी , कुछ तीखी,

पर जीने के लिए बहुत

काफी है , एक सहारे की तरह ||

एक गीत , एक कविता लिखता हूँ ,

जब तक लिखता हूँ , मेरा है , जब

छोड़ देता हूँ , पढ़ने वालों के लिए,

मेरा क्या रह गया उसमें , पर

खो दिया, क्या मैंने उसको ,

गर खो दिया , तो वही तो… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 19, 2014 at 8:53am — 16 Comments

ग़ज़ल -कि साज़िश के निशाने पर ही हमने दिन गुजारे हैं

 १२२२      १२२२     १२२२       १२२२

हमें माझी की आदत है उसी के ही सहारे हैं

डुबो दे बीच में चाहे, वो चाहे तो किनारे हैं

मिटाने को हमें अब जा मिला घड़ियाल से माझी

कि साज़िश के निशाने पर ही हमने दिन गुजारे हैं

चमकती चीज ही मिलती रही सौगात में हमको

समझ बैठे ये धोखे से कि किस्मत में सितारे हैं

सियासत जो हमारे घर में ही होने लगी है अब

तभी हर बात में कहने लगे वो  हम तुम्हारे हैं

अदावत घर में ही…

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Added by sanju shabdita on June 18, 2014 at 11:30pm — 34 Comments

कुंडलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

कुंडलिया छंद- समाज और बेटियाँ 
(1)
सक्षम बेटी वधु बने, वधुएँ घर की लाज 
वंश बढ़ाती कोख से, हर घर करता नाज 
हर घर करता नाज, मिले जब ढेरों खुशियाँ 
जागे सकल समाज, सृजन से महके बगिया 
त्यागे बाल विवाह, अपराध है ये अक्षम 
करे पढ़ाकर ब्याह, बने समाज तब सक्षम ||
(2)

बेटी बिन क्या हो सके, विकसित कभी समाज 

बेटी आती है सदा,  लिए प्यार  का साज 
लिए प्यार का साज, हाथ…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 18, 2014 at 8:00pm — 18 Comments

सिसकियाँ भरते रहे हम रात भर

सिसकियाँ भरते रहे हम रात भर

चाँद ने भी देखा पर कुछ ना कहा

हवाएँ भी सुनकर चलती रही

दर्द सीने में लहरों सा उठता रहा

चाँदनी बादलों में छुपने लगी

सांस भी रह-रह कर रूकने लगी

सिर्फ बची मैं और मेरी तन्हाईयाँ

यादें करती रही पीछा बनकर परछाइयाँ

घटाओं ने समझा दर्द बस मेरा

बरसती रही वो रात भर

जख्म रिस-रिस कर ऐसे बहने लगे

घाव मरहम की ख्वाहिश में सहने लगे

पिघलकर रूह बिछने लगी

साया भी खुद से सहमने लगा

लौ जलती रही मगर तेल कम था

एक…

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Added by Pragya Srivastava on June 18, 2014 at 5:30pm — 9 Comments

हाइकु !

६ - हाइकु !

=======
१. 
लटकी लाशें 
जड़ ! पेड़ की जड़ें 
हुए तमाशे। 
२. 
सामंतवाद 
रक्षक ही भक्षक 
समाजवाद !
३. 
अदालत है 
रुके हुए फैसले 
अदावत है 
४. 
गुणात्मक हो 
रिश्तों की बुनावट 
भावात्मक हो 
५. 
चला चरखा 
जीवन की कताई 
चल चर…
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Added by AVINASH S BAGDE on June 18, 2014 at 3:07pm — 6 Comments

उफ़ गर्मी बहुत है रे ....

उफ़ गर्मी बहुत है रे

पैसे कौड़ी रह रह दिखाए

पास खड़ी खूब इतराए

महंगी से महंगी साड़ी पहने

गले में हीरो के लादे गहने

उफ़ गर्मी बहुत है रे ....



मंहगे पार्लर में जा के आये

कृतिम सुन्दरता पर भी इतराए

बालों की सफेदी मंहगे कलर से छुपाये

पैडी-मैनी क्योर न जाने क्या क्या करवाए

दात भी डाक्टर से चमकवाये

अपनी हर कुरूपता छुपाये

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....



पति की नौकरी…

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Added by savitamishra on June 18, 2014 at 11:21am — 18 Comments

जैसे तैसे काम चलाता है आदमी - डा० विजय शंकर

बहुत दिन हो गए हँसी मजाक किये हुए ,

बहुत दिन हो गए कोई व्यंग लिखे हुए ,

तो चलो आज ही ये काम भी कर लेतें हैं

बीते बहुत दिन परेशान जमाने को हँसे हुए ।

मित्रों , हँसना है तो विवेक-मुक्त होकर हँसे अन्यथा शब्दों में ही रह जायेगें और हस भी नहीं पायेगें .



जैसे तैसे काम चलाता है आदमी ,

कोई काम ठीक से कर नहीं पाता है आदमी .

यह तो सृष्टि की अद्वितीय रचना हैं , जो

एक साथ सत्रह - अदठ्ठारह काम

कर लेतीं हैं , बिना कोई गलती किये .

वो एक साथ खाना बना… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 18, 2014 at 8:06am — 22 Comments

आओ ! जश्न मनायें …

कभी कभी

जब/ वाणी ,कलम और अनुभूतियाँ

यूँ छिटक जाते हैं

जैसे पहाड़ी बाँध से छूटी

उत्श्रिङ्खल लहरें

बहा ले जाती हैं /अचानक

खुशियाँ /सपने /और जिंदगियाँ …

जब /बदहवास रिश्ते

बहा नहीं पाते

अपनी आँखों और मन से

पीड़ा /स्मृतियाँ

और वो

जो ढह जाता है

ताश के महल की तरह

जब एक हूक उठती है

सीने में /और

भर देती है

अनंत आसमान का

सारा खालीपन

कभी सारा समन्दर

और उसका खारापन

जब जुगलबंदी…

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Added by dr lalit mohan pant on June 18, 2014 at 1:00am — 12 Comments

है ताब मुझे / एक ताज़ा तरही गज़ल

2122 1212 112

इश्क में जायेगी ये जान भी क्या

सब्र तोड़ेगा इम्तेहान भी क्या

.

ठोकरें हमको कर गयीं हैरां

आपने बदली है जबान भी क्या

.

गिर के नज़रों में कोई तुम ही कहो

जीत पायेगा ये जहाँन भी क्या

.

चाँद देखा था रात सहमा सा

'इस जमीं पर है आसमान भी क्या'

.

काट दे पर मेरे है ताब मुझे

रोक पायेगा तू उड़ान भी क्या

.

फिर मुझे प्यार पर यकीन हुआ

नर्म दिल में तेरा निशान भी क्या

.

एक जुम्बिश हुयी है दिल में…

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Added by वेदिका on June 18, 2014 at 12:42am — 40 Comments

आदमी (गीतिका छंद)

आदमी से आदमीयत, खो ग है रे कहां ।

आदमी से आदमी को, डर तभी तो है यहां ।।

आदमी में जो पड़ा है, स्वार्थ का साया जहां ।

आदमी अब आदमी से, बच नही पाये यहां ।।



आदमी आतंकवादी, उग्रवादी जो बने ।

आदमी के हाथ दोनो, खून से ही हैं सने ।।

मर्द जो है आदमी में, वो बलत्कारी लगे ।

गोद की बेटी उसे तो, ना दिखे अपने सगे ।।



आदमी को आदमी जो, है बनाना फिर कहीं ।

आदमी में तो जगाओ, आदमीयत फिर वही ।।

आदमी जो आदमी से, प्रेम करने फिर लगे…

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Added by रमेश कुमार चौहान on June 17, 2014 at 11:00pm — 6 Comments

सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में..

कल घूमने गया था समंदर के गांव में,
हिचकोलियां खाती रही कश्ती बहाव में।
 
निकले उधर से जब वो समंदर ठहर गया,…
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Added by atul kushwah on June 17, 2014 at 10:00pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ये नुमायाँ है किसे क्या चाहिये - ग़ज़ल

2122/ 2122/ 212

ये नुमायाँ है किसे क्या चाहिये

बेख़िरद को सिर्फ़ चेहरा चाहिये                      बेख़िरद =कम अक्ल

 

हो गया है ताज़िरों का ये वतन                        ताज़िर=व्यापारी

खुश हुये वो जिनको वादा चाहिये

 

बच तो आयें लहरों से अहले जिगर

बस उन्हें कोई किनारा चाहिये

 

तख़्त पर जिसने बिठाया उनका कर्ज़

जानो दिल से अब चुकाना चाहिये

 

आप भी हँस लीजिये इस बात पर

झूठे को अब काम सच्चा…

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Added by शिज्जु "शकूर" on June 17, 2014 at 9:59pm — 23 Comments

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में...तुझे करीब पाता हूँ

तुझे हर ख्याल में अपना हबीब पाता हूँ

बिन तेरे ज़िंदगी की हर मसर्रत है झूठी

राहे वफ़ा में तुझे अपना नसीब पाता हूँ

तुम्हारे वाद-ए-फ़र्दा पर ..यकीं करूँ कैसे

हर दीद में इक तिश्नगी ..अजीब पाता हूँ

कूए कातिल से गुजरना ..आदत है मेरी

अपने ज़ख्मों में .अपना अज़ीज़ पाता हूँ

रूए-ज़ेबा को भला ज़हन से भुलाऊँ कैसे

बिन तुम्हारे तो मैं खुद को गरीब पाता…

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Added by Sushil Sarna on June 17, 2014 at 4:30pm — 20 Comments

किताबें कहती हैं/गज़ल/कल्पना रामानी

मात्रिक छंद

हमसे रखो न खार, किताबें कहती हैं।

हम भी चाहें प्यार, किताबें कहती हैं।



 घर के अंदर एक हमारा भी घर हो।  

भव्य भाव संसार, किताबें कहती हैं।



 बतियाएगा मित्र हमारा नित तुमसे,  

हँसकर  हर किरदार, किताबें कहती हैं।



 खरीदकर ही साथ सहेजो, जीवन भर,

लेना नहीं उधार, किताबें कहती हैं।



 धूल, नमी, दीमक से डर लगता हमको,

रखो स्वच्छ आगार, किताबें कहती हैं।



 कभी न भूलो जो संदेश…

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Added by कल्पना रामानी on June 17, 2014 at 2:30pm — 22 Comments

दौर...(लघु-कथा)

“ आज का मैच तो बड़ा रोमांचक है यार, बड़े जबर्दस्त फार्म में  है टीम...”

“अरे हाँ यार!   तेरे घर  तो मैच देखने का आनंद ही अलग है, पर यार ये अन्दर से कराहने की आवाज तेरी मम्मी की आ रही है क्या..?”

“ आने दे यार!  वो तो उनकी रोज की आदत है, बूढी जो हो गई है थोड़ी देर में सो जाएँगी. तू तो मैच देख  मैच”

 

              जितेन्द्र ’गीत’

      ( मौलिक व् अप्रकाशित )

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on June 17, 2014 at 12:35pm — 36 Comments

साथ जीने की सज़ा

चाहतों ने गुलज़मीं पे चाँदनी जब छा दिया

आहटों ने बढ़ तराना प्यार का तब गा दिया |

 

हाथ क़ैदी की तरह सहमे हुए थे क़ैद में

क़ैदख़ाने में किसी ने दिल थमा बहका दिया |

 

पाँव में थीं बेड़ियाँ, बेदम नज़र, मंजिल न थी

हौसले ने वक़्त पे सिर से कफ़न फहरा दिया |

 

होंठ काँटों के हवाले खूँ से लथपथ थे पड़े

फूल की ख़ुशबू ने टाँके खींचकर महका दिया |…

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Added by Santlal Karun on June 16, 2014 at 9:00pm — 20 Comments

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