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मन की बात - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

दोहे

तोड़ो चुप्पी और फिर, कह दो मन की बात

व्याकुल तपती देह पर, हो सुख की बरसात।१।



लाज शरम चौपाल की, यू मत करो किलोल

जो भी मन की बात हो, अँखियों से दो बोल।२।



मन से मन की बातकर, कम कर लो हर पीर

बाँध  रखो  मत  गाँठ  में, दुख  देगा  गम्भीर।३।



मन से निकलेगी अगर, दुखिया मन की बात

जो भी  शोषक  जन  रहे, देगी  ढब  आधात।४।



कहना मन की बात नित, करके सोच विचार

जोड़े  यह  व्यवहार  को, तोड़े  यह …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2019 at 6:00am — 10 Comments

यादें

अब सिर्फ़ तुम्हारी यादें ही तो हैं

जिन्हें संजोकर रक्खा हुअ है मैंने।

अपनी धुँधली होती हुई स्मृतियों में,

इन गुलाब के फूलों क़ी पंखुड़ियों में॥

 

मैं अभी तक भी कुछ नहीं भूला हूँ,

लैंपपोस्ट क़ी वो मद्दिम रौशनी में।

मेरे कांधे तुम्हारा धीरे से सर रखना,

औऱ फिर घंटो तलक अपलक निहारना॥

 

वो आकाश में बिजली का वो कौंधना,

तुम्हारा घबराकर मुझसे लिपट जाना।

मुझे अहसास कराता था सदियों का,

उन पलों का कुछ देर यूँ ही…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 27, 2019 at 6:30pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
क्या यही तेरा सृजन था

प्रश्न मैं तुझ पर उठाऊँ, हूँ नहीं इतना पतित भी,

किन्तु जो प्रत्यक्ष है उस पर अचंभित हूँ, अकिंचन!

पूछ बैठा हूँ स्वयं के, बोध की अल्पज्ञता में,

बोल दे हे नाथ मेरे, क्या यही तेरा सृजन था?

जब दिखी मुस्कान तब-तब, आँसुओं का आचमन था।

आस के मोती हृदय की, सीप में किसने भरे थे?

कौन भावों की लहर में, घोल रंगों को गया था ?

धड़कनों की थाप पर, किसने किया मन एकतारा?

प्रीत की पहली छुअन को, पुण्य सम किसने किया था?

किन्तु क्षण के बाद…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 27, 2019 at 5:00pm — 2 Comments

लघुकथा....अर्धांगिनी

डोरबैल पे उंगली रखते ही दरवाज़ा खुल गया।जैसे बंद दरवाज़े के पीछे खड़ी वसुधा बेसब्री से इसी पल का इंतज़ार कर रही थी । लपक कर पति के हाथ से उसने ब्रीफकेस ले लिया।जब तक उमेश ने कपड़े बदले वसुधा ने चाय के साथ गरम नाश्ता लगा दिया।

" पकौड़े…",चाय की टेबल पर बैठते…
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Added by Manju Saxena on November 26, 2019 at 8:30pm — 2 Comments

३ क्षणिकाएँ :

३ क्षणिकाएँ :

दूर होती गईं

करीब आती आहटें

शायद

घुटनें टेक दिए थे

साँसों ने

इंतज़ार के

.............................

दूर चला जाऊँगा

स्वयं की तलाश में

आज रात

जाने किसके बिम्ब में

हो गया है

समाहित

मेरा प्रतिबिम्ब

..............................

हां और न के

लाखों चेहरे

हर चेहरे पर

गहराती झुर्रियाँ

हर झुर्री

विरोधाभास को जीतने की

दफ़्न…

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Added by Sushil Sarna on November 26, 2019 at 4:30pm — 12 Comments

मन है कि मानता ही नहीँ ....

काश मैं भी उड़ सकती

खुले विस्तृत गगन में

बादलों को चीरते हुए 

और छू सकती आकाश

                                                                   

पर ये संभव ही कहाँ है …

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 26, 2019 at 1:00pm — 14 Comments

दूसरे का दर्द - डॉo विजय शंकर

दर्द की एक
अजब अनुभूति होती है ,
अपने और अपनों के दर्द
कुछ न कुछ तकलीफ देते हैं।
कभी किसी बिलकुल
दूसरे के दर्द को महसूस करो ,
वो तकलीफ तो कुछ ख़ास
नहीं देते हैं , पर जो दे जाते हैं
वो किसी भी दर्द से भी
कहीं अधिक कीमती होता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on November 26, 2019 at 11:57am — 14 Comments

उल्फत या कि नफ़रत। (अतुकांत कविता)

सुना था मसले,
दो तरफा हुआ करते हैं,
पर हैरानगी का आलम तब हुआ कि,
जब वे अकेले ही ख़फा हो, बैठ गए।
हमने भी यह सोच कर,
ज़िक्र न छेड़ा कि,
ख़ामोशी कई मर्तबा,
लौटा ही लाती है, मुहब्बते-इज़हार,
पर अफसोस कि,
पासा ही पलट गया,
अपना तो मजमा लग गया,
और वे जो उल्फ़तों के किस्से गढ़ा करते थे,
नफ़रतों की मीनारें खड़ी करते चले गए।

मौलिक व् अप्रकाशित।

Added by Usha on November 26, 2019 at 9:00am — 14 Comments

फुलवारी बन रहना (नवगीत)

जब तक रहना जीवन में

फुलवारी बन रहना

पूजा बनकर मत रहना

तुम यारी बन रहना

दो दिन हो या चार दिनों का

जब तक साथ रहे

इक दूजे से सबकुछ कह दें…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 25, 2019 at 7:33pm — 5 Comments

लम्हों की तितलियाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर ' ( गजल )

२२१/२१२१/२२२/१२१२



धन से न आप तोलिए लम्हों की तितलियाँ

कहना फजूल खोलिए लम्हों की तितलियाँ।१।

****

उड़ती हैं आसपास नित सबके मचल - मचल

पकड़ी हैं किस ने बोलिए लम्हों की तितलियाँ।२।

****

सुनते  जमाना  उन  का ही  होता  रहा  सदा

फिरते हैं साथ जो  लिए लम्हों की तितलियाँ।३।

****

किस्मत हैं लाए  साथ  में  तुमसे ही ब्याहने

कहती हैं द्वार खोलिए लम्हों की तितलियाँ।४।

****

जिसने न खोला  द्वार  फिर आती कभी नहीं

कितना भी चाहे रो लिए…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 25, 2019 at 5:24am — 14 Comments

क्षणिकाएं।

क्षणिकाएं।



इतने बड़े जहां में,

क्यों तू ही नहीं छिप सका,

ऐसा क्या खास तुझमें हुआ किया,

कि, हर नए ज़ख्म पर,

नाम तेरा ही छपा पाया।............. 1



सुना-सुना सा लगता है,

वो सदा है उसके वास्ते,

जीया-जीया सा सच है,

वो खुद ही है खुद के वास्ते,

हाँ, और कोई नहीं, कोई नहीं।............. 2



कहते…

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Added by Usha on November 24, 2019 at 10:18am — 14 Comments

हिताय और सुखाय (संस्मरण)

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 23, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

पानी पर चंद दोहे :

पानी पर चंद दोहे :

प्यासी धरती पर नहीं , जब तक बरसे नीर।

हलधर कैसे खेत की, हरित करे तकदीर।१ ।

पानी जीवन जीव का, पानी ही आधार।

बिन पानी इस सृष्टि का, कैसे हो शृंगार।२ ।

पानी की हर बूँद में, छुपा हुआ है ईश।

अंतिम पल इक बूँद से, मिल जाता जगदीश।३ ।



पानी तो अनमोल है, धरती का परिधान।

जीवन ये हर जीव को, प्रभु का है वरदान।४ ।

बूँद बूँद अनमोल है, इसे न करना व्यर्थ।

अगर न चेते आज तो, होगा बड़ा अनर्थ।५…

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Added by Sushil Sarna on November 22, 2019 at 7:30pm — 12 Comments

रौशन है उसके दम से - सलीम 'रज़ा' रीवा

221 2121 1221 212

 -

रौशन है उसके दम से सितारों की रौशनी 

ख़ुश्बू लुटा रही है बहारों की रौशनी

 -

इक वो है माहताब फक़त आसमान में 

फीकी है जिसके आगे हज़ारों की रौशनी…

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Added by SALIM RAZA REWA on November 21, 2019 at 8:52pm — 6 Comments

धुआँ-धुआँ क्यों है?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?
सुबू शाम बुझा-बुझा क्यों है?
इन्सां बाहर निकलने से डर रहा है
बीमारियों की फ़िज़ा क्यों है?

यह सारा किया उसी ने है
ज़हर फैलाया उसी ने है
बेजान इमारतों के ख़ातिर
वृक्षों को गिराया उसी ने है

कितने अपशिष्ट जलाए उसने?
कितने कारखाने चलाए उसने?
क्या उसे नहीं पता ?
इतनी बद्दुआएँ क्यों हैं?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on November 21, 2019 at 11:30am — 3 Comments

सरस्वती वंदना

(2122 2122 2122 212 )
.
वाग्देवी माँ हमें अपनी शरण में लीजिए | 
ज्ञान के जलने लगें माता हृदय में अब दिए ||  
 …
Continue

Added by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on November 19, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

दो क्षणिकाएँ ...

दो क्षणिकाएँ ...

पुष्प
गिर पड़े रुष्ट होकर
केशों से
शायद अभिसार
अधूरे रहे
रात में

........................

मौन को चीरता रहा
अंतस का हाहाकार
कर गयी
मौन पलों का शृंगार
वो लजीली सी
हार


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 19, 2019 at 4:34pm — 8 Comments

पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी

तरीफे उनकी क्यूँ लगती

जहर से भरी मीठी बातें

हर पिशुन/चुगलखोर की

झूठी बातें भी सच्ची लगती||

 

स्वार्थ की तह तक गिर

औछी हरकते करते रहते

भलाई का दामन औढकर  

सहकर्मियों की बुराई वो करते||

 

दूसरों के काम में टांग अड़ाना

आदतों में शुमार उनकी

सहकर्मियों को आपस में भिड़ाकर

फिर निश्छल होने का ढोंग रचाते||

 

लाभ ना हो जाए कहीं किसी को

बुगले के जैसा ध्यान लगाते

एडी चोटी का ज़ोर…

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Added by PHOOL SINGH on November 19, 2019 at 2:56pm — 5 Comments

शाम के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

जले दिवस भर धूप में, चलते - चलते पाँव

क्यों ओ! प्यारी शाम तुम, जा बैठी हो गाँव।१।

रोज शाम को झील पर, आओ प्यारी शाम

गोद तुम्हारी सिर रखूँ, कर लूँ कुछ आराम।२।

जब तक हो यूँ पास में, तुम ओ! प्यारी शाम

थकन भरे हर पाँव को, मिल जाता आराम।३।

बेघर पन्छी डाल पर, बैठा है उस पार

आयी प्यारी शाम है, खोलो कोई द्वार।४।

कितनी प्यारी शाम है, इत उत फैली छाँव

निकले चादर छोड़ कर, जी बहलाने पाँव।५।

आयी प्यारी शाम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 19, 2019 at 6:00am — 10 Comments

क्षणिकाएँ

दिन ढलते, शाम चढ़ते,

उसका डर बढ़ने लगता है,

क़िस्मत, दस्तक भी देगी और

भीनी यादें तूफान भी उठायेंगी ,

फिर भी होगा कुछ भी नया नहीं,

बस यह अहसास कराते हुए

कि वो किसी और पर मेहरबान है,

उसके पास से धीरे से सरक जाएगी

और चूम लेगी किसी और को।.............1

अटपटा दीवानापन सा,

महसूस तू करवाता है,

हर नए दिन,

हर नई शाम,

यकीन दिलाकर,

तू सिर्फ उसका है,

बाहों में किसी और की,

चला जाता है ।............…

Continue

Added by Usha on November 18, 2019 at 8:30am — 5 Comments

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