“तुम साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहती, विमला की माँईं, तुम्हे शादी करवानी भी है या नहीं? एक से एक रिश्ते बताये तुमको... तुम हो कि किसी के कान छोटे, किसी के होठ मोटे बता रिश्ते ठुकराती ही चली जा रही हो!” वामन काकी के सब्र का बाँध टूट गया था आज तो. “पूरे गाँव के रिश्ते करवाएं हैं मैंने. कोई कह तो दे किसी की भी बिटिया अपने घर में सुख से ना है, या किसी भी घर में बेमेल बहू आई है आज तक.”
“ना, ना, काकी, तुम तो बेकार में लाल-पीली हो रही हो. मेरा वो मतलब ना था,” ठकुराइन मक्खन सी नरमी आवाज़ में लाकर बोली.…
Added by Seema Singh on March 15, 2016 at 6:00pm — 8 Comments
22 22 22 22
खंजर या तलवार नहीं हूँ
मैं घातक हथियार नहीं हूँ
अपनी शर्तों पर जीती हूँ
क्यूँ कहते खुद्दार नहीं हूँ
मैं नदिया की शीतल धारा
जलता सा अंगार नहीं हूँ
ईश्वर की अनमोल कृति हूँ
औरत हूँ लाचार नहीं हूँ
उज्जवल रश्मि हूँ सूरज की
रातों का अंधियार नहीं हूँ
स्वाभिमान मुझे है प्यारा
मैं दुनिया में भार नहीं हूँ
मुझसे ही परिवार है…
ContinueAdded by Rama Verma on March 15, 2016 at 5:30pm — 11 Comments
" पापा मुझे कुछ रूपये चाहिए " ड्यूटी पर निकलने को तैयार भँवरलाल , बेटे की आवाज पर चौंक उठे ।
" कितने बार कहा , ड्यूटी पर जाते वक्त मत टोका करो , अभी तो दिये थे पिछले हफ्ते दस हजार ,उसका क्या हुआ ? "
" दस हजार से होता क्या है पापा ! सारे खर्च हो गये " नजरें चुराते हुए उसने कहा ,तो भँवरलाल ठठा कर हँस पड़े ।
" बता कितना चाहिए ? " जेब में पर्स टटोलते हुए पूछा ।
" सिर्फ चालिस हजार "
" क्या ,इतने सारे रूपये ! कौन सा ऐसा काम आन पड़ा ? "
" उससे आपको मतलब नहीं , बस आपको देना ही…
Added by kanta roy on March 15, 2016 at 4:00pm — 13 Comments
पकी फसल पर असमय बरसात और ओलों के कहर ने किसानों के पेट और कमर पर जो लात मारी थी। उसी का सर्वे चल रहा था। कौन किस हद तक घायल है उसी हिसाब से मुआवजा मिलना था। सो,दो सरकारी मुलाजिम एक पुरवा से दूसरे पुरवा जा जाकर कागज़ रंग रहे थे।
"भाग यहाँ से साsssले, यहाँ आया तो तेरी खैर नहीं। हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? तेरा मन नहीं भरा मेरे बाल बच्चे खा कर? और कितनों को खायेगा?आ..ले,खाले...सब को खाजा..आजा,आ के दिखा तुझे अभी मजा चखाता हूं"कह कर वो अंधाधुंध पत्थर मारने लगा। उसकी विक्षिप्त सी हालत देख…
Added by Rahila on March 15, 2016 at 1:30pm — 31 Comments
Added by Dr.Prachi Singh on March 15, 2016 at 12:41pm — 8 Comments
1222 1222 1222 1222
न जाने बे खयाली में हुआ है क्या बुरा मुझसे
हवादिस पूछने आते हैं अब मेरा पता मुझसे
मुहब्बत हो कि नफरत हो , झिझक कैसी है कहते अब
हया कैसी है डर कैसा , बयाँ कर दे, जता मुझसे
अगर इनआम देना है , कहीं से भी शुरू कर तू
सजा का वक़्त गर आये तो फिर कर इब्तिदा मुझसे
न कह मुझसे जलाऊँ मै चरागों को कहाँ, कैसे
जलाऊँगा , अभी ठहरो , मुख़ालिफ़ है हवा मुझसे
समझ पाते तो अच्छा…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on March 15, 2016 at 10:49am — 5 Comments
नीलामी में चित्र उस व्यक्ति ने खरीद ही लिया, उस चित्र का सौन्दर्य ही कुछ ऐसा था कि उसकी नीलामी में देश के कई बड़े नेता, उद्योगपति, शिक्षाविद, कलाकार, लेखक और बुद्धिजीवी आये थे|
उसने धन देकर चित्र हाथ में लिया और देखा| एक हरे-भरे बगीचे की आकृति देश के मानचित्र के समान थी, बगीचे में एक हाथ में पुस्तक लिए कुछ शिक्षाविद थे, एक हाथ में सफ़ेद झंडे फहराते कुछ बच्चे थे, कुछ उद्योग थे जिनकी गगनचुम्बी चिमनियाँ थी, कुछ धनवान धन बाँट रहे थे, आकाश में सूर्योदय के केसरिया-नारंगी रंग की छटा बिखरी हुई…
ContinueAdded by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 15, 2016 at 9:30am — 1 Comment
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 14, 2016 at 10:30pm — 2 Comments
सावन के दिन झर गये, ठरी पूस की रात.
रंग बसंती रो रही, पतझड़ करते घात.१
आंखों का सावन कभी, हुआ न तन का मीत.
कहें बसंती-फाग रस, पतझड़ जग की रीत.२
वन उपवन नद ताल को, देकर दु:ख अतीव.
दशा दिशा श्रुति ज्ञान सब, बिगड़े मौसम जीव.३
सरोकार रखते नहीं, जो समाज के साथ.
श्वेत वस्त्र उनके मगर, रंगे रक्त से हाथ.४
तंत्र मंत्र हर यंत्र जब, हारे हरि का नाम.
कृषक छात्र जन आज खुद, हुये कृष्ण-बलराम.५
राम…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 14, 2016 at 9:00pm — 6 Comments
एक पारिवारिक फिल्म घर पर ही देखने के बाद दोनों के चेहरे ऐसे मुरझा गये थे, मानो फ़िल्म ने उन्हें आइना दिखाकर शर्मिन्दा कर दिया हो!
कुछ पलों के बाद वह उसके पास जाकर बैठ गया। लम्बी चुप्पी के बाद मन के भाव बह पड़े।
" सच है कि मैं तुम्हें कभी ख़ुश नहीं रख सका, और न ही तुम मुझे!"
वह चौंककर उसकी तरफ़ देखती रही, फिर बोल पड़ी, "मालूम है, बच्चों की वज़ह से तुमने मुझे तलाक़ नहीं दी, वरना..."
"वरना क्या? उस वक़्त मेरी माली हालत अच्छी नहीं थी, मेरी पसंद की कोई दूसरी मुझसे निकाह कैसे…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 14, 2016 at 8:00pm — 9 Comments
221 2122 2212 122
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मत पूछ किस लिए वो तेवर बदल रहे हैं
शह पा के दोस्तों की दुश्मन उछल रहे हैं l1l
होगी वफा वतन से यारो भला कहाँ अब
हुंकार जाफरों की शासन दहल रहे हैं l2l
हमको पता है लोगों शैलाब बढ़ रहा क्यों
दरिया के प्यार में कुछ पत्थर पिघल रहे हैं l3l
आँखों को सबकी यारों चुँधिया न दें कहीं वो
तम के दयार में से तारे निकल रहे हैं l4l
ताकत विरोध की तज अपनायी…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2016 at 11:15am — 14 Comments
Added by Seema Singh on March 14, 2016 at 9:49am — 10 Comments
122 122 122 122
निगाहें भला क्यूँ मिलाते नहीं हो।
मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाते नहीं हो।।
छिपाते हो तुम राज अपने जिया के।
बताओ मुझे क्यों बताते नहीं हो।।
हैं चेहरे पे क्यों ये उदासी की पर्तें।
भला नूर क्यूँ तुम दिखाते नहीं हो।।
सघन वेदना के जो घन हैं हृदय में।
भला फिर क्यूँ दरिया बहाते नहीं हो।।
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।
सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।
है 'पंकज'का नाता अगर नीर ही से।
तो नैनों में…
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 14, 2016 at 12:00am — 17 Comments
ग़ज़ल(एतबार न कर )
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2122 ----1212 -----112
मान मेरी सलाह प्यार न कर |
हुस्न वालों का एतबार न कर |
हो न जज़्बात जाएँ बेक़ाबू
जानेजां हद वफ़ा की पार न कर
बेच दी जिन सुख़नवरों ने क़लम
उनके जैसा मुझे शुमार न कर|
हुस्न वाले वफ़ा नहीं करते
तू यक़ीं उनपे बार बार न कर |
आँख भीगी है और हंसी लब पर
राज़े उल्फ़त को आशकार न कर |
वक़्ते रुख़सत निगाह नम…
ContinueAdded by Tasdiq Ahmed Khan on March 13, 2016 at 9:20pm — 12 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on March 13, 2016 at 9:00pm — 14 Comments
कैनवास ...
मुझे बहुत खुशी हुई थी
जब हर शख़्श
तुम्हें सलाम कर रहा था
तुम्हारे हर रंग की कद्र हो रही थी
तुम वाहवाही के नशे में गुम थे //
भीड़ में तन्हा
मैं तुम्हारे चहरे को निहार रही थी
इतने चहरे लिए
न जाने लोग कैसे जी लेते हैं
खुद को ज़िंदा रखने के लिए
न जाने
कितनों की खुशियाँ पी लेते हैं //
तुम कैसे पुरुष हो
औरत चाहते हो पर
उसे समझ नहीं पाते
उसके अहसासों से खिलवाड़ करते हो
न जाने कौन से…
Added by Sushil Sarna on March 13, 2016 at 6:16pm — 12 Comments
Added by शिज्जु "शकूर" on March 13, 2016 at 3:30pm — 6 Comments
सोने की चिडिया - (लघुकथा ) -
"भाई साहब, आपने घनश्याम के साथ बहुत बडा अन्याय कर दिया"!
"ऐसा क्या होगया छोटे, कुछ साफ़ साफ़ बोल ना"!
"आपके इस फ़ैसले पर सारी बिरादरी और खानदान थू थू कर रहा है"!
"किस फ़ैसले की बात कर रहा है "!
" घनश्याम की शादी का फ़ैसला ! ऐसी बदसूरत लडकी आजतक पूरे समाज और रिश्तेदारी में नहीं आयी, ना रंग, ना रूप, पता नहीं घनश्याम जैसे गोरे चिट्टे, सुंदर,सजीले , शिक्षित और प्रोफ़ेसर बेटे के लिये यही एक लडकी मिली थी आपको"!
" छोटे, कभी कभी…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on March 13, 2016 at 10:45am — 10 Comments
पूरा अधूरा वायदा
शब्दों के अभाव में कहे-अनकहे के
कढ़वे अन्तराल में
पार्क में पत्थर के बैंच को साक्षी बना
आसान था कितना
हम दोनों का अलविदा के समय कह देना ...
" हो सके तो भूल जाना तुम मुझको "
" तुम भी ..."
उस शाम के मेघों की वाणी में कुछ था, कुछ कहा
अत: वायदा वह पूरा हो न सका, न तुमसे, न मुझसे
रुँधी हुई ज़िन्दगी में भुलाने के असफ़ल प्रयास में
स्मृतिओं के धुँआते खंडहर के…
ContinueAdded by vijay nikore on March 13, 2016 at 6:35am — No Comments
२१२२ १२१२ २२
सूर्य से जो लड़ा नहीं करता
वक़्त उसको हरा नहीं करता
सड़ ही जाता है वो समर आख़िर
वक्त पर जो गिरा नहीं करता
जा के विस्फोट कीजिए उस पर
यूँ ही पर्वत झुका नहीं करता
लाख कोशिश करे दिमाग मगर
दिल किसी का बुरा नहीं करता
प्यार धरती का खींचता इसको
यूँ ही आँसू गिरा नहीं करता
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(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2016 at 11:22pm — 8 Comments
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