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प्यार/लघुकथा /कान्ता राॅय

पति को आॅफिस के लिये विदा करके ,सुबह की भाग - दौड़ निपटा पढने को अखबार उठाया , कि दरवाजे की डोर बेल बज उठी ।

"इस वक्त कौन हो सकता है !" सोचते हुए दरवाजा खोला। उसे मानों साँप सूँघ गया । पल भर के लिये जैसे पूरी धरती ही हिल गई थी । सामने प्रतीक खड़ा था ।

"यहाँ कैसे ?" खुद को संयत करते हुए बस इतने ही शब्द उसके काँपते हुए होठों पर आकर ठहरे थे ।

"बनारस से हैदराबाद तुमको  ढूंढते हुए बामुश्किल पहुँचा हूँ ।" वह बेतरतीब सा हो रहा था । सजीला सा प्रतीक जैसे कहीं खो गया था ।

"आओ…

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Added by kanta roy on September 8, 2015 at 10:30am — 2 Comments

मेरे शानों पे .....

मेरे शानों पे .....

साँझ होते ही मेरे तसव्वुर में

तेरी बेपनाह यादें

अपने हाथों में तूलिका लिए

मेरी ख़ल्वत के कैनवास पर

तैरती शून्यता में

अपना रंग भरने आ जाती हैं

रक्स करती

तेरी यादों के पाँव में

घुंघरू बाँध

अपने अस्तित्व का

अहसास करा जाती हैं

मेरी रूह की तिश्नगी को 

अपनी दूरी से

और बढ़ा जाती हैं

मेरे अश्क

मेरी पलकों की दहलीज़ पे

चहलकदमी करने लगते हैं

न जाने कब

सियाह…

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Added by Sushil Sarna on September 7, 2015 at 10:22pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मसरूफ है दुआ करने-- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

1212--- 1122---1212---22

 

जरा खंरोच जो आई लगे सदा करने

कलम जो धड़ से है, जाएँ कहाँ दवा करने

 

उसे भरम है अदालत से फैसला…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 7, 2015 at 9:30pm — 36 Comments

गजल

2122 2122 2122

लग गये दिल चाँद अब धरती उतारें।

ठान ली है आ यहीं सरसी उतारें।

खूब मचली हैं घटायें झूमती- सी

आ अभी उनको जली परती उतारें।

सूखती जो दूब भी अब चाहती है

जिंदगी कुछ पल अभी मरती उतारें।

आरजू तब की हमारी माँगती कुछ

अब तलक घातें रहीं ठगती उतारें।

हो चुकी बातें बहुत बोलूँ कहूँ क्या

हो गयी जो बात अब जगती उतारें।

मौन आँखों से भिंगोने थी चली वह

रह गयी जाने कहाँ चरती उतारें।

ख्वाहिशें अबतक थमी थीं नामुरादें

रे नहीं फिर वे… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 7, 2015 at 8:26pm — 5 Comments

कृष्ण जन्माष्टमी पर चार कुण्डलिया छंद

1)

लगी कहन माँ देवकी….सुनलो तारनहार

सफल कोख मेरी करो…..मानूँगी उपकार

मानूँगी उपकार ……. रहूँ ममता में भूली

हृदय भरें उद्गार…...भावना जाये झूली

स्वारथ हो ये जन्म...जाऊँ बन तेरी सगी

हे करुणा के धाम,लगन मनसा ये लगी॥

***************************************

 2)

कारा गृह में अवतरित......दीनबंधु भगवान

मातु-पिता हर्षित हुए, लख शिशु की मुस्कान

लख शिशु की मुस्कान, व्यथा बिसरी तत्क्षण…

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Added by kalpna mishra bajpai on September 7, 2015 at 8:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल- तुम मिले तो धडकनों में फिर रवानी सी लगी।

2122 2122 2122 212



तुम मिले तो धडकनों में फिर रवानी सी लगी।

तुम मिले तो जिन्दगानी जिन्दगानी सी लगी।



तुम मिले तो आज ये दुनिया सुहानी सी लगी।

तुम मिले तो सच मुहब्बत जाविदानी सी लगी।



तुम मिले तो दिल के हर इक मोड पर खुशियाँ सजी।

तुम मिले तो साँस सुख की राजधानी सी लगी।



तुम मिले तो प्यार का हर एक किस्सा दिलरुबा।

मुझको अपनी और तेरी ही कहानी सी लगी।



जब तुम्हें पहली दफा देखा मेरे जज्बात ने।

तुम कोई पिछले जनम की जानी जानी सी… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on September 7, 2015 at 2:30pm — 14 Comments

जाता नहीं अब कोई भी दर्द दवा लेकर (ग़ज़ल)

(221 1222 221 1222)

जाता नहीं अब कोई भी दर्द दवा लेकर..

ज़ख्मों को भरा दिल के,यादों का नशा लेकर..

-

अब तक न मेरे फ़न को पहचान सके हैं जो,

फिर बाद में ढूंढेंगे वो मुझको दिया लेकर..

-

फीके सभी पकवानों के स्वाद हो जाते हैं,

खाता है नमक रोटी, जब भी वो मज़ा लेकर..

-

खोले खिड़की बैठा मैं देख रहा रस्ता,

शायद पहुँचे, कोई पैगाम हवा लेकर..

-

न ढूंढ सकेगा सारी उम्र खुदा को 'जय',

फिर बोल करेगा क्या, तू उसका पता…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 6, 2015 at 11:53pm — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ब्राह्मणवाद (अतुकान्त) // --सौरभ

अतिशय उत्साह

चाहे जिस तौर पर हो 

परपीड़क ही हुआ करता है 

आक्रामक भी. 

 

व्यावहारिक उच्छृंखलता वायव्य सिद्धांतों का प्रतिफल है 

यही उसकी उपलब्धि है 

जड़हीनों को…

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Added by Saurabh Pandey on September 6, 2015 at 7:30pm — 31 Comments

गजल(मनन)

हर तरफ आखिर हँसी छा गयी है

आज कौवे को चिड़ी भा गयी है।



काँव कितनी बार करता रहा वह,

ठाँव उसके आज मैना गयी है।



टक लगा बगुला रहा था कभी से,

चोंच मछली एक छलक आ गयी है।



देख वंशी है लगी हो कहीं कुछ,

लोग बोलें टोना' ले जा गयी है।



साँढ़ बूढ़ा कुलबुलाया शहर में,

देख बछिया खुद अचंभा गयी है।



विश्व-जय सी हो गयी तो अभी है

कंत-घर अमृत नवोढ़ा गयी है।



बाग़ में बुलबुल अभी गा रही थी,

क्यूँ न जाने चुप हवा छा गयी…

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Added by Manan Kumar singh on September 6, 2015 at 7:30pm — 5 Comments

गरीब /लघुकथा /कान्ता राॅय

" पापा , हम गरीब क्यों है ? "

" नहीं बेटा हम गरीब कहाँ .... देखो तो ....तुम शहर के सबसे बडे़ स्कूल में जो पढते हो ! " बेटे को दुलारते हुए पिता ने गोद में बिठा लिया ।

"लेकिन पापा , मेरे दोस्त कहते है कि मै गरीब हूँ । " बच्चे का मन बेहाल सा था ।

" क्यूँ कहते है तुम्हें वो गरीब ... अभी तो ...उस दिन तुम्हारे जन्मदिन पर शानदार दावत दी तुम्हारे दोस्तों को ! " पिता मन को कड़ा कर रहे थे ।

" तभी तो कहा ! उस दिन हमारे घर आने से ही तो उनको मालूम हुआ की हम गरीब है । वो कहते है कि…

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Added by kanta roy on September 6, 2015 at 7:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेरी भी दास्ताँ समझे कोई

1222 1222 12
मेरी भी दास्ताँ समझे कोई
मुझे इंसाँ यहाँ समझे कोई

मुहब्बत में तनाफ़ुर ढूँढ ले
मुझे फिर हमज़बाँ समझे कोई

दिखाता हूँ उजालों की तरफ़
ये कोशिश रायगाँ समझे कोई

मुझे भी दर्द होता है बहुत
तड़प मेरी कहाँ समझे कोई

जला के निकला हूँ इक शम्अ मैं
मगर आतिश-फिशाँ समझे कोई

(रायगाँ= व्यर्थ, आतिश-फिशाँ= ज्वालामुखी)

मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on September 6, 2015 at 2:47pm — 5 Comments

पाखण्डी समाज (कहानी)

सांझ का समय था. किसनलाल अपने बेलों को चारा खिलाने में मग्न था. मंद-मंद पूरबा चल रही थी. कुछ पल के लिए वह ठिठक गया और कमर सीधी करते हुए नथुना फूलाकर इधर-उधर सर घुमाते हुए कुछ पयान करने लगा. जोर-जोर से वह सांसें भर रहा था, सीआईडी कुत्ते की तरह जैसे किसी चीज का सुराग खोज रहे हो. हाँ, वह सुराग ही खोज रहा था. बासमती चावल की खीर की सुगंध का सुराग. खीर की सुगंध आ कहां से रही थी इसका अंदाजा लगाने का वह भरसक प्रयास कर रहा था.…

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Added by Govind pandit 'swapnadarshi' on September 6, 2015 at 11:00am — No Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

2122  2122  2122  212

यार मेरे आज फिर से दिल दुखाने आ गए

इस बहाने वो चलो मिलने मिलाने आ गए

जब कभी परदेश में  मुझको सताया यादों ने

साथ देने दादी के किस्से सुहाने आ गए

बोझ से लगते हैं उनको आज बूढ़े माँ-पिता

जेब में  बच्चों के जब भी चार आने आ गए

पढ़ किताबें शहर से जब गाँव आया तो मुझे

बस अना से दूर रहना सब बताने आ गए

कर चुका मैं मय से तौबा फिर हुआ ऐसा यहाँ

हुश्न वाले आँखों से मुझको पिलाने…

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Added by gumnaam pithoragarhi on September 6, 2015 at 9:17am — 5 Comments


प्रधान संपादक
गुरु गोविन्द (लघुकथा) - शिक्षक दिवस पर विशेष

"देख ली अपने चेले की करतूत?" वयोवृद्ध शायर के सामने एक पत्रिका को लगभग फेंकते हुए एक समकालीन ने कहा। 

"क्या हो गया भाई ? इतना भड़क क्यों रहे हो ?"

"इसमें अपने चेले का आलेख पढ़िए ज़रा।" 

"कैसा आलेख है?"

"आपकी ग़ज़लों में नुक्स निकाले हैं उसने इस पत्रिका में, आपकी ग़ज़लों में। मैं कहता था न कि मत सिखाओ ऐसे कृतघ्न लोगों को?" 

समकालीन बोले जा रहे थे, किन्तु वयोवृद्ध शायर बड़ी तल्लीनता से आलेख पढ़ने में व्यस्त थे। 

"देख लिया न? अब बताइए, क्या मिला आपको ऐसे लोगों…

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Added by योगराज प्रभाकर on September 5, 2015 at 5:19pm — 19 Comments

ग़ज़ल

२ १ २ २ १ १ २ २ १ १ २ २ २ २

याद तेरी को ऐसे दिल में छुपा रक्खा है 

राह जिस पे चले उस को भी भूला रक्खा है 

लोग सो जाए हमें नींद न आती है अब ,

रात कैसा तेरा अब साथ निभा रक्खा है 

क्यूँ बता दी हमें उसकी ये कहानी तुमने ,

जो  रहा…

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Added by मोहन बेगोवाल on September 5, 2015 at 4:30pm — 4 Comments

हस्ताक्षर

उकेर दिया है

समय की रेत पर

अपना हस्ताक्षर.

जानता हूँ

ख़त्म हो जाएगा

रेत के बिखराव से

मेरा वज़ूद.

संभावना यह भी

किसी संकुचन क्रियावश

घनीभूत हो रेत

प्रस्तर बन जाय .

तब देख पाओगे

खंडित होने तक

मेरा हस्ताक्षर.

कुच्छ भी तो नहीं है

अनंत.

(विजय प्रकाश)

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on September 5, 2015 at 1:30pm — 12 Comments

शिक्षा का महत्त्व --- डॉo विजय शंकर

"यार , शिक्षा , आई मीन , एजुकेशन , है बड़ी इम्पॉर्टेंट चीज़।"
"अच्छा तुझे भी टीचर्स डे पर ही शिक्षा याद आ रही है "
"हाँ यार , गागर में सागर भर देती है , सागर से मोती निकालना सिखा देती है। "
"ठीक कहते हो यार, पर लगता नहीं यार कि हमारे यहां तो लोग पढ़ कर या तो सागर पार चले जाते हैं ,
या फिर इस पार रेत माफिया जैसे बन कर रह जाते हैं। "
"तुम्हारा मतलब सागर में उतरता कोई नहीं। "

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 5, 2015 at 11:30am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बता क्या होगा?-- ग़ज़ल -- (मिथिलेश वामनकर)

2122—1122—1122—22

 

मेरी नींदों को सताने से बता क्या होगा?

इस तरह ख़ाब में आने से बता क्या होगा?

 

आज अहसास का सागर जो कहीं गुम यारों  …

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 5, 2015 at 10:00am — 24 Comments

तो क्या ? (लघुकथा) शिक्षक दिवस पर विशेष

"बहू, पेपर पढ़ा आज का ? एक तरफ द्रोणाचार्य पुरस्कार पाने वाले शिक्षकों के बारे में लिखा है ,वहीँ दूसरी तरफ एक दूसरे गुरूजी  की महिमा मंडिता है I ये महाशय अपने शिष्यों से दूसरों  के खेतों से सब्जी और भुट्टे  चोरी  करवा के मंगवाते हैं " दादाजी भुनभुना रहे थे I

"ये तो कुछ भी नहीं है बाबूजी Iआजकल के टीचर्स के बारे में कितनी बातें पढने में आती हैं ,जिन्हें पढ़कर सिर शर्म से झुक जाता है "बहू ने अपना ज्ञान जोड़ा I

"तो क्या हो गया दादाजी ?"  ये 17..18 वर्ष का पोता थाI

"क्या हो गया…

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Added by pratibha pande on September 5, 2015 at 9:00am — 16 Comments

चलो! दुआ ये अभी बैठकर /श्री सुनील

1212 1122 1212 22/112



चलो! दुआ ये अभी बैठकर ख़ुदा से करें

कुछेक मुश्किलों के हल तो अब दुआ से करें.



वो अम्नो चैन यहाँ यूँ बह़ाल हों शायद

ख़िरद से काम लें गर बात क़ाइदा से करें.



अ़जीब नस्ल के इस दर्द पे कहा ये तबीब

अब ऐसे दर्द का दरमां भी किस दवा से करें.



ख़ुदा है सबपे, अगर सच यही है तो ऐ दिल!

चराग़ तू तो जला, बात क्या हवा से करें.



वो ख़ुशनिहाद है, ख़ुशदिल है, ख़ुशज़बाँ है तो

अब ऐसे शख्स का पैमाई किस उला से…

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Added by shree suneel on September 5, 2015 at 1:00am — 6 Comments

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