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मुझे मार कर क़्यों ज़लाया नहीं है

तेरा कुछ भी मुझ पर बक़ाया नहीं है
मुझे मार कर क़्यों ज़लाया नहीं है
..
सज़ा बे-बज़ह ही मिली है क़सम से
क़िसी को भी मैंने सताया नहीं है
..
गया तू नज़र से,मेरी ज़ान लेक़र 
मग़र जहर क्यों कर पिलाया नहीं है
..
मोहब्बत में कर दूँ ज़रा भी मिलावट
व़फा ने ये मुझको सिख़ाया नहीं है
..
मुझे कह रही हैं मुसलसल ये हिचकी
अभी तक भी तूने भुलाया नहीं है

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Added by umesh katara on January 11, 2015 at 7:30pm — 27 Comments

प्यार की भी कोई जात होती है ?

लग गयी हमारे-तुम्हारे प्यार को,

कुछ हवा शायद जो नज़र होती है !

 

और नज़र उतारती थी जो अम्मा,

अब कौन जानता किधर सोती है !

 

मुस्कराते थे पनघट, जो हम पर ,

उनकी हँसी अब उन्हीं पर रोती है !

 

लगे हमारे तुम्हारे मिलन पर पहरे,

दीवार  हर बात- बात पर रोती है !

 

मिल नहीं पाता  मैं अब तुमसे ,

तुमसे ख्वाबों में मुलाकात होती है !

 

दिन नहीं होता  धरती पर अब ,

अब धरती पर  सिर्फ रात होती…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 11, 2015 at 4:30pm — 19 Comments

जन्मदिन--

" बहुत बहुत बधाई जन्मदिन की, आज तो पार्टी बनती है " , ऑफिस पहुँचते ही सहकर्मियों ने घेर लिया शर्माजी को | एक बारगी तो वो सोच ही नहीं पाये कि कैसे प्रतिक्रिया दें इस पर , उनसठवां जन्मदिन था उनका | अगले साल सेवानिवृत्त हो जायेंगे और घर में बेरोज़गार पुत्र एवम शादी के योग्य पुत्री |

चेहरे पे फीकी मुस्कान लाते हुए सबका आभार व्यक्त करने लगे और आवाज लगायी " सबके लिए नाश्ते का इंतज़ाम आज मेरी तरफ से कर देना भोला " | सब प्रसन्न थे पर उनके मन में यही चल रहा था कि ऐसा जन्मदिन किसी का न हो | …

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Added by विनय कुमार on January 11, 2015 at 2:14pm — 17 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२२१

ये अखबार

सच बीमार

कैसा धर्म

गो,तलवार

सच की राह

है दुश्वार

मरघट देगा

रिश्तेदार

आ ऐ मौत

कर उद्धार

जग गुमनाम

किसका यार

मौलिक व अप्रकाशित

आपकी समालोचना की प्रतीक्षा है

Added by gumnaam pithoragarhi on January 11, 2015 at 11:53am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल........ पुराना-नया क्या

1 2 2

 

भला क्या ?

बुरा क्या ?

 

खुदी से

मिला क्या…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 11, 2015 at 4:26am — 13 Comments

भूमिका(कविता )

भूमिका(कविता)

अश्रु-पूरित चन्दन से भी

अगर टीकूँ|

है असम्भव अब तुम्हारा

लौट आना||

मैं इस मंच पर अभी कुछ

और खेलूँगा|

तुमकों जो अभिनय जँचे

तो मुस्काना ||

था टिका सम्बन्ध जिस पर

घुना वो आलम्ब|

हो सके तो उसपे कुछ

रेह लगाना||

हो सघन  तिमिर जब कोई  

राह ना सूझे|

तुम करना मेरा पथ-प्रशस्त

टिमटिमाना |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अप्रकाशित)     

 

Added by somesh kumar on January 11, 2015 at 1:23am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
नयन सखा डरे डरे, प्रमाद से भरे भरे......मिथिलेश वामनकर

नयन सखा डरे डरे, प्रमाद से भरे भरे......

 

सबा चले हजार सू फिज़ा सिहर सिहर उठे

भरी भरी हरित लता खिले खिले सुमन हँसे

चिनार में कनेर में खजूर और ताड़ में

अड़े खड़े पहाड़ पे घने वनों की आड़ में

उदास वन हृदय हुआ उदीप्त मन निशा हरे.............

 

शज़र शज़र खड़े बड़े करें अजीब मस्तियाँ

विचित्र चाल से चले बड़ी विशेष पंक्तियाँ

सदा कही नहीं मगर दिलो-दिमाग कांपता

मधुर मधुर मृदुल मृदुल प्रियंवदा विचिन्तिता

विचारशील कामना प्रसंग से…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2015 at 11:30pm — 34 Comments

क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .

नहीं वे जानते मुझको, दुश्मनी करके बैठे हैं ,

मेरे कुछ मिलने वाले भी, उन्हीं से मिलके बैठे हैं ,



समझकर वे मुझे कायर, बहुत खुश हो रहे नादाँ

क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .



गिला वे कर रहे आकर , हमारे गुमसुम रहने का ,

गुलूबंद को जो कानों से , लपेटे अपने बैठे हैं .



हमें गुस्ताख़ कहते हैं , गुनाह ऊँगली पे गिनवाएं ,

सवेरे से जो रातों तक , गालियाँ दे के बैठे हैं .



नतीजा उनसे मिलने का , आज है सामने आया ,

पड़े हम…

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Added by shalini kaushik on January 10, 2015 at 11:00pm — 7 Comments

'' कविता.. कविता सी लगे ''

कैसे लिखूं कि कविता ;

एक कविता सी लगे ,

बहते हुए भावों की ;

एक सरिता सी लगे !



चंचल किशोरी सम जो ;

खिलखिलाए खुलकर ,

बांध ले ह्रदय को ;

नयनों के तीर चलकर ,

ऐसी रचूँ कि कुमकुम सी

मांग में सजे !

कैसे लिखूं कि कविता ;

एक कविता सी लगे !



हो मर्म भरी ऐसी ;

जो चीर दे उरों को ,

एक खलबली मचा दे ;

पिघला दे पत्थरों को ,

निर्मल ह्रदय जो कर दे ;

वो सुर लिए सधे !

कैसे लिखूं कि कविता ;

एक कविता सी लगे…

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Added by shikha kaushik on January 10, 2015 at 9:00pm — 11 Comments

सच्चाई

‘पता चला है सेठ से तुम्हारे पुराने सम्बन्ध थे ?’- इंस्पेक्टर ने कड़क कर पूंछा I

‘जी हाँ ----I’

‘कैसे सम्बन्ध थे ?’

‘एक समय मै रखैल थी उसकी I’

‘तब तूने उसकी हत्या क्यों की ?’

‘क्योंकि वह मनुष्य नहीं राक्षस था I वह मेरी बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने जा रहा था I मैंने साले को वही चाकू से गोद दिया I’

‘तो तेरी बेटी क्या सती सावित्री थी ?’

‘नहीं साहिब , हम जैसे लोग पेट के लिए देह बेचते है I सती -सावित्री होना हमारे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 10, 2015 at 7:30pm — 31 Comments

चॉंद की महफिल

भले ही दर्द हो कितना नहीं उसको भुलाना है

मुझे अब गम जमाने को नहीं अपना दिखाना है

मिटाये से नहीं मिटती न जाने याद क्‍यों उसकी

बनी तस्‍वीर है प्‍यारी जिगर में आज भी जिसकी

न हो जब पास वो मेरे लगे ये जिन्‍दगी वैसे

सजी हो चॉंद की महफिल न हो पर चॉंदनी जैसे

बता यह बात दुनिया को नही मुझको हँसाना है

मुझे अब गम जमाने को नहीं अपना दिखाना है

भले ही दर्द हो कितना नहीं उसको भुलाना है

बना कर नाँव कागज की चला मैं ढूढ़ने…

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Added by Akhand Gahmari on January 10, 2015 at 7:09pm — 12 Comments

असर (लघुकथा)

"यार सुरेश देखो! हमारा देश अब कितनी प्रगति कर रहा है।"
"मुझे तो अभी ऐसा कहीं कुछ नजर नहीं आ रहा है।"
"यार लगता है तुम टी वी नहीं देखते हो।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on January 10, 2015 at 6:40pm — 14 Comments

ग़ज़ल : वक़्त भी लाचार है.

** ग़ज़ल : वक़्त भी लाचार है.

2122,2122,212

आदमी क्या वक़्त भी लाचार है.

हर फ़रिश्ता लग रहा बेजार है.

आज फिर विस्फोट से कांपा शहर.

भूख पर बारूद का अधिकार है.

क्यों हुआ मजबूर फटने के लिए.

लानतें उस जन्म को धिक्कार है.

औरतों की आबरू खतरे पड़ी,

मारता मासूम को मक्कार है.

कर रहे हैं क़त्ल जिसके नाम पर,

क्या यही अल्लाह को स्वीकार है.

कौम में पैदा हुआ शैतान जो,

बन…

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Added by harivallabh sharma on January 10, 2015 at 3:47pm — 21 Comments

तीन लोगों के बीच (कविता )

पूर्ण नहीं हूँ मैं

मुझे उपमा ना बना

प्यार को प्यार रहने दे

इसे रिश्ता ना बना |

आदमी मैं भी हूँ

जज्बात समझता हूँ

हिकार ना कर उसकी

मुझे देवता ना बना |

एक फ़ासले के बाद

लौटना ठीक नहीं

मुझे मंजिल ना समझ

उसे रस्ता ना बना |

किनारे मैं हूँ खड़ा

मझदार में तू

कोई तो फैसला कर

उसे उलझा ना बना |

.

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अमुद्रित )

Added by somesh kumar on January 10, 2015 at 3:00pm — 7 Comments

एक रचना,,,,,

एक रचना,,,,,

(कुकुभ छंद और लावणी छंद का संधिक प्रयॊग)

**********************************

चॊर लुटॆरॆ निपट उचक्कॆ, चढ़ उच्चासन पर बैठॆ !

काली करतूतॊं सॆ अपनॆ, मुँह कॊ काला कर बैठॆ !!

राम भरॊसॆ प्रजातन्त्र की, अब भारत मॆं रखवाली !

जिसकॊ माली चुना दॆश नॆं,है काट रहा वह डाली !!

चीख रही हैं आज दिशायॆं,नैतिकता का क्षरण हुआ !!

चारॊ ऒर कपट कॊलाहल, सूरज का अपहरण हुआ !!१!!

अमर शहीदॊं  कॆ अब  सपनॆं, सारॆ चकनाचूर हुयॆ ! …

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 10, 2015 at 2:30am — 7 Comments

ग़ज़ल -- नफ़रत नहीं तो उस से मुझे प्यार भी नहीं। ( इस्लाह हेतु )

221-2121-1221-212



नफ़रत नहीं तो उस से मुझे प्यार भी नहीं.

मेरे लिए वो शख़्श मगर अजनबी नहीं।



दुनिया में बुतपरस्त फ़क़त मैं नहीं ख़ुदा.

तेरे जहाँ में आशिक़ों की कुछ कमी नहीं।



कुछ तो मेरा नसीब ही सहरा की धूप है.

उस पर तुम्हारे प्यार की बौछार भी नहीं।



सहरानवर्द दिल है मिरा आप के बग़ैर.

जब से गए हैं आप मेरी ज़िन्दगी नहीं।



प्यालों को तोड़ कर दिल ए बेज़ार कह उठा.

जामे अजल नहीं तो कोई मयकशी नहीं।



इतना न ग़ौर से मुझे… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 9, 2015 at 7:00pm — 20 Comments

युग्मों का गुलदस्ता …

युग्मों का गुलदस्ता …



एक  पाँव  पे  छाँव  है  तो  एक  पाँव  पे   धूप

वर्तमान  में  बदल  गया  है  हर रिश्ते का रूप



अब  मानव  के  रक्त  का  लाल  नहीं   है   रंग

मौत  को  सांसें  मिल  गयी  जीवन हारा  जंग



निश्छल प्रेम अभिव्यक्ति के बिखर गए हैं पुष्प

अब  गुलों  के  गुलशन  से  मौसम  भी  हैं रुष्ट



तिमिर  संग  प्रकाश  का  अब  हो गया  है मेल

शाश्वत  प्रेम अब बन गया है शह मात का खेल



नयन  तटों  पर  अश्रु  संग  काजल…

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Added by Sushil Sarna on January 9, 2015 at 12:30pm — 20 Comments

ग़ज़ल --१२२२--१२२२--१२२२--१२२२

१२२२-१२२२-१२२२-१२२२

अना के ज़ोर से कमज़ोर रिश्ते टूट जाते हैं

ज़रा सी बाहमी टक्कर से शीशे टूट जाते हैं

 

गले मिलकर बनाते हैं यही मज़बूत इक रस्सी

गर आपस में उलझ जायें तो धागे टूट जाते हैं

 

बहारों में शजर की डालियों पर झूमते हैं जो

ख़ज़ाँ के एक झोंके से वो पत्ते टूट जाते हैं

 

किसी दर पर झुकाना सिर नहीं मंजूर हमको भी

करें क्या पेट की खिदमत में काँधें टूट जाते हैं

 

तू चढ़कर पीठ पर आँधी की इतराता है क्यूं…

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Added by khursheed khairadi on January 9, 2015 at 10:59am — 20 Comments

"अपने गावँ बुलाती हो"

जब भी उमड़ घुमड़ कर काले बादल नभ में आते हैं,

पुरवाई के झोंके आ आकर चुप-चुप दस्तक दे जातें हैं !

मेरे कानों में आ चुपके से तुम  कुछ कह जाती हो,

मुझको लगता फिर बार-बार तुम अपने गावँ बुलाती हो !!

 

कहती हो आकर देखो फिर ताल-तललिया भर आई,

आकर देखो वन उपवन में फिर से हरियाली छाई !

शुष्क लता वल्लारियाँ भी अब दुल्हन बन इठलाती हैं,

कुञ्ज बनाकर आँख मिचौली खेल –खेल मुस्कातीं हैं !!

 

बुढा बरगद फिर छैला बन पुरवाई संग झूम रहा…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on January 9, 2015 at 2:00am — 14 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : फेस वैल्यू (गणेश जी बागी)

"चंद्रा साहब कवि सम्मलेन कैसा रहा ? इस कार्यक्रम का टोटल मैनेजमेंट मेरे द्वारा ही किया गया था."

"गुप्ता जी मैं कोई साहित्यकार तो हूँ नहीं किन्तु खचाखच भरा सभागार, श्रोताओं के कहकहे और तालियों से लगा कि कार्यक्रम सफल रहा. किन्तु मुझे एक बात समझ में नहीं आयी कि वो दो लड़कियां... अरे क्या नाम था ... हां कविता ‘क्रंदन’ और शबनम ‘सिंगल’, इन्हें क्यों मंच पर बैठाया गया था, वो दोनों क्या पढ़ रहीं थीं ... यार मेरे पल्ले तो कुछ भी नहीं पड़ा."

"हा हा हा, लेकिन सीटियाँ और तालियाँ तो बजी न !…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 8, 2015 at 4:03pm — 30 Comments

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