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माँझी ( एक कुण्डलिया छंद) ... डॉ० प्राची सिंह

माँझी मंजिल से पृथक डालो नहीं पड़ाव

भँवर भरे मझधार में क्यों उलझाते नाव?

क्यों उलझाते नाव, लहर पथ कहाँ उकेरे

उथल-पुथल संघर्ष, लाख चौरासी फेरे ,

एकल करो विमर्श! बात करनी क्या साँझी?

क्या होगा परिणाम, राह भटके जो माँझी?

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Dr.Prachi Singh on January 18, 2015 at 10:24pm — 18 Comments

त्रिपथगा

 दुपट्टा

भारत के वक्ष पर

सलीके से पड़ा

सफ़ेद दुपट्टा

वायुयान से दिखी

धवल गंगा !

गंगा अब यहाँ नहीं बहती

साधु ने बालक से कहा…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 18, 2015 at 2:00pm — 14 Comments

अच्छे दिन

अच्छे दिन

दिखे हैं अभी इश्तिहारो में अच्छे दिन|

या सुनता हूँ  बस नारों में अच्छे दिन|

सड़क पर बेचता है खिलौना अभी भी बच्चा

तेल सस्ता हुआ तो कारों के अच्छे दिन|

दिहाड़ी- मजदूर चौराहे पर खड़ा बेरोजगार

सजी दूकानें हैं तो बाजारों के अच्छे दिन|

घोटालेबाज बरी , अफसर की तब्दीली

खूब समझते हैं इशारों के अच्छे दिन|

किसान करे खुदखुशी, हाथ बस मायूसी

 हैं खेत हड़पते सिसियाते  अच्छे दिन|

पी. के. पर विवाद, ऍम.एस.जी पर सेंसर…

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Added by somesh kumar on January 18, 2015 at 1:31pm — 8 Comments

मधुमास की भोर

आई भोर कोयलिया बोले मीठे गान में

पारिजात बागान में।

उषा ने अपना आँचल बाँधा

अरुण ने अपना वेग सम्हाला

चला दिवाकर बिहंसी किरणें

जग में सुंदर जादू है डाला । 

दिन सुस्ताता तुम्हें देख पहले पहल विहान में

पारिजात बागान में।

देख मुझे वो देहरी ठिठ्की

केशर हार वो हाथ में लाई

अभी-अभी बचपन बीता है

लेकिन गई नहीं तरुणाई। 

पाला नहीं पड़ा है जब तक रूप और अभिमान में

पारिजात बागान…

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Added by kalpna mishra bajpai on January 18, 2015 at 1:30pm — 10 Comments

अच्छे दिन व्यापार हुआ करते हैं-- डॉ o विजय शंकर

दुआओं में याद कीजियेगा ,

जब याद कीजियेगा ,

दुआ कीजियेगा।

मिलते हैं तो कहते हैं ,

आपकी सुबह अच्छी हो ,

शाम अच्छी हो ,

रात अच्छी हो,

जितनी बार मिलते हैं , हर बार कहते हैं ।

दिन रहते , विदा होते हैं , तो

आपका दिन अच्छा हो , कहते हैं ।

दुआओं में असर होता है ,

लोग यूँ भी दुआ करते हैं ,

हाथ मिला कर कहते हैं,

सिर को थोड़ा झुका कर कहते हैं ,

मुस्कुरा कर कहते हैं ,

जिसे जानते हैं , उस से कहते हैं ,

नहीं जानते , उस से भी…

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Added by Dr. Vijai Shanker on January 18, 2015 at 11:30am — 14 Comments

‘कलुआ’

“अरे क्या हुआ ये भीड़ कैसी है, कोई मर गया है क्या ?”

“हाँ यार वो साहब का नौकर, अरे वही यार जो साहब के घर के सारे काम करता था, झाड़ू - पोछा, चूल्हा-चौका ,बर्तन माँजने से लेकर सब्जी-भाजी लाने तक....जिसे साहब गाँव से लेकर आये थे, कहते थे चपरासी रखवा दूंगा डिपार्टमेंट में !”

“ओह वो गूंगा, वो तो बड़ा ही भला था और ठीक-ठाक भी, कैसे मरा ?”

“दोस्त, सब कह रहें हैं आत्महत्या कर ली, पर यार तू बताना मत किसी को, मेमसाहब की चेन चोरी हो गयी थी, कल रात पुलिस भी आई थी, बहुत मारा उसे, पर वह…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 18, 2015 at 1:57am — 20 Comments

ग़ज़ल (कौन है हमदर्द यारा )

२१२२ २१२२

घिर गया है मर्द यारा !

कौन है हमदर्द यारा !!

लोग आते बात करते !

दे गये सरदर्द यारा !!

आज गुस्से में है बीवी !

दे दिया है दर्द यारा !!

यार अब तो बात करना !

मत दिखाना फर्द यारा !! (फर्द -सूची )

वो परेशां है बहुत अब !

उसको देना कर्द यारा !!

मत खड़े हो सब यहाँ पर !

लो गिरी है गर्द यारा !!

लो रजाई साथ में भी !

रात होती सर्द यारा…

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Added by Alok Mittal on January 17, 2015 at 2:00pm — 7 Comments

गजल- जान हो तुम मेरी जान लो जानेमन

212 212 212 212

एक है जान हम टुकडे दो जानेमन!
कैसे समझाए हम आपको जानेमन!!

हो नहीं सकते तुम दूर मुझसे कभी!
जान हो तुम मेरी जान लो जानेमन!!

तुम दुआ हो मेरी मेरे अरमान हो!
जिन्दगी बन्दगी तुम ही हो जानेमन!!

देख लूं जो तुझे साँस आ जाती है!
जाएँगे मर अगर तू न हो जानेमन!!

तुमको 'राहुल' पे अब भी यकीं गर नहीं!
चीर कर दिल मेरा देख लो जानेमन!!

मौलिक व अप्रकाशित!

Added by Rahul Dangi Panchal on January 16, 2015 at 10:26pm — 26 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

2122  2122  2122  212

याद करे दुनिया तुझे ऐसी निशानी छोड़ जा,

जोश भर दे जो सभी में वो जवानी छोड़ जा।

नाम पर तेरे कभी कोई उदासी हो नहीं,

प्यार से भरपूर कुछ यादें सुहानी छोड़ जा।

देश की खातिर लुटाओ जान अपनी शान से,

हर किसी की आँख में दो बूँद पानी छोड़ जा।

हो भरोसा हर किसी को तेरी बातों पर सदा,

देश हित की प्रेरणा दे वो बयानी छोड़ जा।

मौत आतीे है सभी को देख ‘‘मेठानी’’ यहां,

गर्व हो अपनाें को कुछ ऐसी…

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Added by Dayaram Methani on January 16, 2015 at 9:55am — 16 Comments

आसमाँ--

" मिल गया चैन तुमको , हो गयी तसल्ली " , उसके पिता खुद को संभाल नहीं पा रहे थे | " कितनी बार मना किया था कि उसे वहां मत भेजो , अब खो दिया न उसको "| बेटी की असमय मौत ने उनको तोड़ दिया था |

टूट तो मैं भी गयी थी लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बेटी को उसकी मर्ज़ी की जगह नौकरी करने की वकालत करके मैंने कौन सा गुनाह कर दिया था | उसकी कही बात जेहन में घूम रही थी " जाना तो एक दिन सब को है माँ , तो क्यों न निडर होके अपने तरीके से जिया जाए | अपना आसमाँ खुद ढूंढा जाए "| बेहद मुश्किल था अब लेकिन…

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Added by विनय कुमार on January 16, 2015 at 1:00am — 12 Comments

"सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम्"

अखण्ड आर्यावर्त की, उमंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

बुद्ध-कृष्ण-राम की, पुनीत –भूमि पावनी !

सुहार्द सम्पदा अनन्त, श्ष्यता संवारती !

सतार्थ धर्मं युद्ध में, सशक्त श्याम सारथी !

परार्थ में दधीचि ने, स्वदेह भी बिसार दी !!

 

निनाद कर रही उभंग, बंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

धर्मं-जाति-वेश में, जरूर हम अनेक हैं !

परम्परा अनेक और बोलियाँ अनेक हैं…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 12:30am — 20 Comments

मुक्तक- बेटियाँ

      बेटियाँ    

बेटियों की ज़मीन को सींचो

उग रही पौध को नहीं खींचो

ये हमारे समाज की जड हैं,

इन जडों के शरीर मत भींचो।

मौलिक व अप्रकाशित  

Added by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:12pm — 4 Comments

ग़ज़ल: कोई पत्थर और कोई आईने ले के(भुवन निस्तेज)

कोई पत्थर और कोई आईने ले के

आ रहा हर एक अपने दायरे ले के



यूँ चले हो रात को दीपक बुझे ले के

खुद अँधेरा भी परेशाँ है इसे ले के



बस ठिठुरते रह गए दरवाजे बाहर ख्वाब

ये सुबह आई है कितने रतजगे ले के



जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई

मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के



आपका आना तो कल ही सुर्ख़ियों में था

आज फिर अख़बार आया हादसे ले के



साकिया यूँ बेरुखी से मार मत हमको

रिन्द जायेगा कहाँ ये प्यास ले ले के



कुछ न कुछ…

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Added by भुवन निस्तेज on January 15, 2015 at 7:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक तरही ग़ज़ल - "हवा के रुख पे चलती किश्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं" ( गिरिराज भंडारी )

1222       1222      1222      1222

पहन रख पैरहन, उरियानियाँ अच्छी नहीं लगतीं

कि बद को भी, कभी बदनामियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

फसादी हो अगर, तो बोलियाँ अच्छी नहीं लगतीं

वहीं बेवक़्त की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

खुला आकाश हो सबका ,परों मे ताब हो सबके 

कफस अंदर की ये आज़ादियाँ, अच्छी नहीं लगतीं

 

भरम रख़्ख़ें वे मौसम का , कहे कोई उन्हें जा कर

कभी बे वक़्त छाई बदलियाँ, अच्छी नहीं लगतीं 

चला आया है जुगनू…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 15, 2015 at 5:30pm — 23 Comments

ग़म मौत के .......(एक रचना )

ग़म मौत के ......(.एक रचना )

ग़म  मौत  के  कहाँ  जिन्दगी भर साथ चलते हैं

चराग़  भी  कुछ  देर  ही किसी के लिए जलते हैं



इतने  अपनों  में  कोई  अपना नज़र नहीं आता

अब  तो  रिश्ते  स्वार्थ  की कड़वाहट में पलते हैं



दोस्ती  राहों  की  अब राह में ही दम तोड़ देती है

अब किसी के लिए कहाँ दर्द आंसुओं में ढलते हैं



मिट  जाते  हैं  गीली  रेत पे मुहब्बत भरे निशाँ

फिर  भी  क्यूँ  लोग  गीली रेत पे साथ चलते हैं



सच  को छुपा कर लोग…

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Added by Sushil Sarna on January 15, 2015 at 4:10pm — 10 Comments

कुछ बदला है क्या?

सचमुच,कुछ बदला है क्या?

हाँ ...

बदली हैं सरकारें, लेकर लुभावने वादे,

खाऊँगा न खाने दूंगा,

साफ़ करूंगा, साफ़ रखूंगा,

मेक इन इण्डिया

मेड इन इण्डिया

‘सायनिंग इण्डिया’ का नया…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on January 15, 2015 at 10:39am — 17 Comments

प्‍यार के इक पल



हुई क्‍यों दूर दिल से मैं मिले फुरसत बता देना

बनाना इक कहानी तुम मुझे फिर वो सुना देना



बनी दुल्‍हन चली आई सजन मैं साथ में तेरे

करोगे प्‍यार मुझको तुम यही अरमान थे मेरे

मगर टूटे सभी अरमा जला दिल मैं दिखाऊँ क्‍या

नजर के पास रह कर भी बढी दूरी बताऊँ क्‍या

न आना पास अब मेरे सभी सपने जला देना

बनाना इक कहानी तुम मुझे फिर वो सुना देना

हुई क्‍यों दूर दिल से तुम मिले फुरसत बता देना



मिला है तन तुझे मेरा नहीं क्‍यों मन लिया तुमने

कभी भी प्‍यार के इक…

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Added by Akhand Gahmari on January 15, 2015 at 10:29am — 8 Comments

ग़ज़ल--बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को

नहीं राजी हुआ कोई ,मेरा किरदार करने को

बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को

..

कोई सोये कहीं भूख़ा ,ज़लाये मुल्क़ भी कोई

इन्हें बस वोट लेने हैं, मज़े  सरक़ार करने को

..

कोई मौजूद था मेरा ,मेरे दुश्मन की महफ़िल में

रची साजि़श उसी ने थी, मुझे गद्दार करने को

..

तुम्हारे इक इशारे पर , मेरी ये ज़ान जानीं है

मग़र ज़िन्दा जो रक़्खा हैं,गुनाह स्वीकार करने को

..

चली आयी तसव्वुर में , तेरी तस्वीर धुँधली सी

मेरी ये जान बाक़ी है ,फ़क़त दीदार…

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Added by umesh katara on January 15, 2015 at 8:58am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुट्ठी भर सैलाब

मेरा जीवन पी  गया, तेरी कैसी प्यास ।

पनघट से पूछे नदी, क्यों तोड़ा विश्वास ।१।

                 

मन में तम सा छा गया, रात करे फिर शोर।

दिनकर जो अपना नहीं, क्या संध्या क्या भोर ।२।…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 14, 2015 at 10:30pm — 33 Comments

पंचायती अल्ट्रासाउंड (लघुकथा)

"सरपंच साहब, रमेश नंबरदार की लड़की ने अपने ही गांव के लड़के के साथ भागकर शादी कर ली है। इससे पूरे गांव की नाक कट गई है। अब कानून भी इन लड़कियों का ही साथ देता है अपनी इज्जत बचाने के लिए इसका समाधान किया जाना जरूरी हो गया है।"
"ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी। एक काम करते हैं पंचायती अल्ट्रासाउंड मशीन ले आते हैं।"


मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on January 14, 2015 at 9:33pm — 7 Comments

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