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क़दमों को आज भी याद है

आज फिर लड़खड़ाते कदमों से

गिरने की कोशिश की

यह लालच संजोये हुए कि

आप आ जाओगे

फिर से मुझे चलना सिखाने को

मेरी अंगुली पकड़ के

मुझे गिरने नहीं दोगे...

काश आपकी पदचाप फिर सुन पाता,

या काश, मेरे क़दमों को गिरते हुए

आपकी आदत ना होती..

 

साथ थे आप तो पैर अल्हड़ थे

घिसटते कदम थे चाल बेताल थी..

विश्वास था फिर भी ना गिरने का 

 

आज आपकी याद है...

पैर तने हैं, कदम सधे हैं

चाल भी सीधी…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 11, 2014 at 9:00pm — 6 Comments

अब भी चेतो मानव मन तू!

कल कल कल कल नदियाँ बहती, झरने गीत सुनाते हैं,

तरु शाखाओं पर छिपकर खग, पंचम सुर में गाते हैं.

गिरि, नद, जंगल, अवनि, पशु सब, सृष्टि के अनमोल रतन,

मानव सबसे बुद्धि शील बन, अपनी राह बनाते हैं.

नदियों की धारा को रोकी, शिखरों को भी ध्वस्त किया,

काटके जंगल, भवन बनाते, अब क्यों वे पछताते हैं.

सीख नहीं कुछ लेते मानव, प्रकृति सब कुछ देख रही,

कभी केदार, कभी कश्मीर में, मानव ही दुःख पाते हैं.  

सेना सीमा की रक्षक है, आपद में करती…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on September 11, 2014 at 5:27pm — 10 Comments

काशी की दुनिया.........

काशी की दुनिया हो

या काबा की बस्ती हो

यूँ ही न उजड़े चाहे

फ़कीर बाबा की बस्ती हो।।

साहिल से बिछड़ी हुई

मुक़ाम-ए-पास हो जाए

लहरों में फँसती चाहे

केवट की कश्ती हो।।

शोहरत की मस्ती हो

या माले की हस्ती हो

यूँ ही न टूटे कोई चाहे

मुफ़लिसी में घरबां गिरस्ती हो।।

मातहतों की मस्ती…

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Added by anand murthy on September 11, 2014 at 4:00pm — 8 Comments

व्यवस्था (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

कौआ एक बार फिर प्यासा था। बहुत ढूंढने पर उसे फिर एक घड़े में थोड़ा सा पानी दिखाई दिया। एक बार फिर उसने पास पड़े कंकड़-पत्थर उठा उसमें डाले और जैसे ही पानी उसकी पहुँच तक आया तभी कुछ ताकतवर कौऐ एक झुंड में उस पर टूट पड़े और उसे वहां से खदेड़ कर उस पानी पर कब्जा कर लिया। बेचारा प्यासा कौआ एक बार फिर से पानी की तलाश में जुट गया।

.


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on September 11, 2014 at 12:00pm — 8 Comments

सो जाता

हमें भी जिन्‍दगी से प्‍यार हो जाता।।।

हमारे प्यार मे गर कोई खो जाता

शिकायत भी नहीं उनसे दोष मेरा है

निभाते प्‍यार गर हम तो न वो जाता

तड़पता ही रहूँगा रात भर क्‍या मैं

मिलन की अास गर भी होती  सो जाता

न पाये रूह उसकी चैन जन्‍नत में

दिखा सपने सुहाने छोड़ जो जाता

बहे जो आज नफरत की हवा जग में

मिटा मैं काश नफरत प्‍यार बो जाता

मौलिक व अप्रकाशित अखंड गहमरी

Added by Akhand Gahmari on September 11, 2014 at 3:45am — 5 Comments

"खुद से खुद की दूरी क्यों"

खुद से खुद की दूरी क्यों।
ऐसी भी मजबूरी क्यों।।

गर वो सबकुछ जानता है।
उससे बात ज़रूरी क्यों।।

तेरी मेरी इक ज़ुबान।
पूरी बात अधूरी क्यों।।

रात रातभर बातें की।
होती बात न पूरी क्यों।।

गर वो सच में बेगुनाह।
फाँसी की मंज़ूरी क्यों।।

पता नहीं उसमें क्या है।
ऐसे को कस्तूरी क्यों।।
*******************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 10, 2014 at 7:07pm — 11 Comments

पाच दोहे - लक्ष्मण रामानुज

तेरी मेरी बात पर फँस जाता इन्सान,

धन दौलत को देखकर, खो देता ईमान |

 

अग्नि परीक्षा दे रही कितनी सीता आज,

दुष्ट दुशासन लूटते, नित श्यामा की लाज |

रिश्ते नातो में भरो मधुर प्रेम का सार

प्यार भरे व्यवहार से मिटते कष्ट हजार |

संस्कारी परिवार में, बच्चें ही जागीर, 

ह्रदय प्रेम उमड़े सदा, दिल से रहे अमीर |

भावुकता वरदान हो, समझे मन की पीर,

गलत काम का खौफ हो, खुशियों में हो सीर |

(मौलिक व…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 10, 2014 at 6:00pm — 9 Comments

स्मृतियाँ और आंसू--डा० विजय शंकर

आँख में आया हरेक आंसू

तेरी वजह से हो ,जरुरी

नहीं होता है .

आँख में पड़ जाये कोई

छोटी सी किरकिरी

तो भी होता है .



दो बून्द आंसू की

एक अधखिला गुलाब,

यही स्मृतियाँ हैं तुम्हारी ,

कोई पर्वत नहीं ,

कोई सागर भी नहीं .

कि संभाल न सकूँ , छिपा न सकूँ ,

कि जिंदगी भर संजों न सकूँ .



हाँ , तुमको अपनी आँखों में जरूर

बसाया था ,और छिपाया भी था,

आंसू की तरह .

एक किरकिरी पड़ी आँख में ,

और तुम जरा भी सह न सके

और… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 10, 2014 at 4:13pm — 12 Comments

हिंदी पखवाड़े/हिंदी दिवस को समर्पित कुछ ग़ज़ले

१.

देश की शान है अपनी हिंदी

फिर भी हल्कान है अपनी हिंदी

 

एक डोरी से जुड़ जाए भारत

एक अभियान है अपनी हिंदी

 

घर में अपने ही होकर पराई

आज हैरान है  अपनी हिंदी

 

अपना सिर क्यूं झुके जग में यारों

अपना अभिमान है अपनी हिंदी

 

सारी दुनिया में फहराया परचम

हिन्द की आन है अपनी हिंदी

 

हिंदी से हैं सभी हिन्दवासी

अपनी पहचान है अपनी हिंदी

 

जितना सीधा सरल मन है…

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Added by khursheed khairadi on September 10, 2014 at 1:30pm — 6 Comments

बोध (नवगीत)

मौत का सघन  साया

अनुभूति बनकर आया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

यह आत्मीयता प्रदर्शन

करुणा  का कलित क्रंदन

चीत्कार आर्त्त रोदन

या नाट्य  अभिनय मंचन

.

इसे देख जी में आया 

छोडूं न अभी काया

मेरे अंतिम क्षणों में I

*

सर्वांग व्यथित परिजन

सूने उदास से मन

इतना असीम कम्पन

तब था न  जब था जीवन

.

यह मोह है या माया

कुछ कुछ समझ में आया

मेरे अंतिम क्षणों में…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 10, 2014 at 1:30pm — 23 Comments

शहरों की भीड़ भाड़ में

शहरों की भीड़ भाड़ में

बस आदमी ही आदमी।

चलता ही जा रहा है

थकता नहीं है आदमी।

वाहनों की दौड़ भाग से

नहीं इसे परहेज

न है इसे प्रतिद्वंद्विता

न द्वेष रखता है सहेज

इसका तो अपना ध्‍येय है

पीढ़ियों से अपराजेय है

फि‍र भी देवताओं सा

लगता नहीं है आदमी।

इसकी अभिलाषाओं का

अभी न अंत होना है

अभी न तृप्‍त होगा यह

अभी न संत होना है

अभी इसे विकास के

सोपानों पर चढ़ना है…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 10, 2014 at 9:40am — 1 Comment

देर हो रही है

देर हो रही है

जागो-जागो

आओ रे भगाओ रे भेडिए

इधर व्यवस्था के पालने में

सोया हे प्रजातंत्र

और सत्ता के गलियारे तक…

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Added by rawal rajesh on September 9, 2014 at 11:00pm — 2 Comments

आलेख- विकास ही गतिमान है।

भारतीय या किसी अन्य देश व प्रांत की भाषा,संस्कृति,धर्म व जीवन शैली वंहा की अपनी मौलिक व प्राकृतिक होती है । जिसका स्वतः विकास होना अति आवश्यक होता है। परंतु अन्य धर्मावलम्बियों द्वारा दूसरे राज्य,संस्कृति,धर्म,पर अनावश्यक दबाव मानवीय मूल्यों को क्षति तो पहुंचाता है साथ ही अनैतिक है। किसी भी सच्चे अर्थों में जो मानव होते हैं उन्हें यह अनैतिक दबाव सहन नहीं होता , जिसके कारण मानव आपस में लडते हैं और मानवीय मूल्यों का ह्रास होता है। सच्चे अर्थों में मानव के लिये ऐसा कार्य निंदनीय होता है। भारतीय…

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Added by सूबे सिंह सुजान on September 8, 2014 at 10:27pm — No Comments

ग़ज़ल...मुस्कुराना आ गया.

हौंठ सीं गर्दन हिलाना आ गया.

दोस्त ! जीने का बहाना आ गया.



जिन्दगी में गम मुझे इतने मिले,

अश्क पीकर.. मुस्कुराना आ गया.



ख्वाब सब आधे अधूरे रह गए,

दर्द सीने में ...बसाना आ गया.



दर्द के किस्से सुनाऊँ किस तरह,

गीत गज़लें गुनगुनाना आ गया.



साथ रहने का असर भी देखिये,

आप से बातें छिपाना आ गया.



हादसों ने पाल रख्खा है मुझे.

मौत से बचना बचाना आ…

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Added by harivallabh sharma on September 8, 2014 at 9:10pm — 18 Comments

ग़ज़ल - तेरी यादों में ़ज़ालिम गुजर जाएगी - पूनम शुक्ला

2122. 1221. 2212

तेरी यादों में ज़ालिम गुजर जाएगी
जिन्दगी अब न जाने किधर जाएगी

इक नजर देखिए बस जरा सा हमें
आपको देखकर ये सँवर जाएगी

रोशनी अब ये पा लेगी लगता तो है
चीर देगी अँधेरा जिधर जाएगी

आँसुओं की लड़ी बह रही थी कहीं
बह के जानूँ न वो किस नहर जाएगी

कुछ कहेंगे नहीं फिर भी हम तो सनम
बात अपनी दिलों तक मगर जाएगी

पूनम शुक्ला ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on September 8, 2014 at 8:24pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक तरही ग़ज़ल - “ शाम ढले परबत को हमने सौंपे बंदनवार नए “ ( गिरिराज भंडारी )

“ शाम ढले परबत को हमने सौंपे बंदनवार नए “

   22   22   22   22   22   22   22  2

लगे कमाने जब भी बच्चे बना लिए घर बार नए

मगर बुढ़ापे को क्या देंगे उस घर में अधिकार नए ?

 

आयातित हो गयी सभ्यता पच्छिम, उत्तर, दच्छिन की

बे समझे बूझे ले आये घर घर में त्यौहार नए

 

हाय बाय के अब प्रेमी सब, नमस्कार पिछडापन है

परम्पराएं आज पुरानी खोज रहीं स्वीकार नए

 

पत्ते - डाली ही  काटे  हैं ,  जड़ें वहीं की  वहीं रहीं

इसी लिए तो…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 8, 2014 at 6:30pm — 25 Comments

मैंने भी तेज नजरो को...

बन के अजनबी वो अक्सर मेरे दर से गुजरते हैं

फ़कत दीदार को खुद को रस्तों से जोड़ रक्खा हैं

दिल की दरियादिली दर्पण-सी सच्ची देखकर

घर के आईनों में तेरी तस्वीर को जोड़ रक्खा हैं

हकीकत की सतह से उस चाँद को देख रक्खा है..

खुदा के उस हसीं अजूबे से नाता जोड़ रक्खा है

कहने को तो उन्होने बहुत कुछ छोड़ रक्खा है...

चाहत की चिट्ठी को लिफाफों में मोड़ रक्खा है..

हवाओं के सहारे खुशबू कुछ इस तरफ़ आयी....

मैंने भी तेज नजरो…

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Added by anand murthy on September 8, 2014 at 6:00pm — 2 Comments

मसखरा उस को न कहना - (गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    2122

****

हौसला  देते  न  जो  ये  पाँव  के  छाले  सफर में

हर सफर घबरा के यारो,  छोड़ आते हम अधर में

****

एक भटकन है जो सबको, न्योत लाती है यहाँ तक

कौन  आता  है स्वयं ही, यार दुख के इस नगर में

****

एक  वो  है पालती  जो,  काजलों के साथ आँसू

कौन रख पाता भला अब, सौतने  दो  एक घर में

****

आशिकी की इंतहाँ ये, खुदकुशी का शौक मत कह

हॅसते-हॅसते डाल दी जो किश्तियाँ उसने भवर में

****

खो गया चंचलपना सब,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 8, 2014 at 12:00pm — 8 Comments

हमारे दर्द को दुनिया

हमारे दर्द को दुनियाँ तमाशो में न गा जाये

बजा ताली सभी झूमें हमारा दर्द भा जाये

न आये है किनारे पर अभी ठहरा समुन्‍दर है।

बड़ी खामोश लहरे हैं कहीं तूफाँ न आ जाये।।

सहेगें जुल्‍म अब कितना बड़ा जालिम हुआ हाकिम।

पड़ी थी लाश सड़को पे कफन वो बेच खा जाये।।

सभालो अब वतन अपना तबाही का दिखे मंजर

घरों में आज खुशियाँ है कहीं मातम न छा जाये

जला कर आस का दीपक न जाओ छोड़ कर हमको '

कुचलने का हमारा सिर न दुश्‍मन मौका पा जाये

मौलिक…

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Added by Akhand Gahmari on September 8, 2014 at 11:00am — 11 Comments

ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सर दाँव पे लगा के अब खेल खेल देखें ।
अपना नसीब देखें, उनकी गुलेल देखें ।

शायद उठे भड़क ही कोई दबी चिंगारी
चल राख हौसलों की परतें उधेल देखें ।

चेहरे सफ़ेद सबको कमज़ोर कर रहे हैं
इन बूढ़े नायकों को पीछे धकेल देखें ।

उद्दंड अश्व खाईं की ओर जा रहे हैं
हाथों में अपने लेकर इनकी नकेल देखें ।।

क्या सूखते दरख्तों का हाल पूछते हैं
हर ओर सर उठाये है अमरबेल देखें ।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Sulabh Agnihotri on September 7, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

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