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अतुकांत कविता : हिंसा (गणेश जी बागी)

मारते हो पशु

फैलाते हो हिंसा

'नीच' जाति के हो न

असभ्य कहीं के

कभी नहीं सुधरोगे

इतिहास गवाह है...



मारते तो तुम भी हो

'शिकार' के नाम पर

तुम तो 'नीच' न थे

याद है ?

वो शब्द भेदी बाण

जो असमय वरण किया था

अंधों के पुत्र का,

भागे थे हिरण के पीछे

चर्म चाहिए था न

इतिहास गवाह है...



हिंसक तो तुम दोनों ही हो

एक शौक के लिए

तो दूजा भूख के लिए

हाँ जी हाँ, बिलकुल

इतिहास गवाह है…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 7, 2015 at 4:30pm — 28 Comments

बसर तो प्यार से करते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1212   1122  1212     22

***************************

किरन की साँझ पे यल्गारियाँ नहीं चलती

तमस  की  भोर पे हकदारियाँ नहीं चलती

**

बचाना  यार  चमन बारिशें भी गर हों तो

हवा की आग से कब यारियाँ नहीं चलती

**

बसर तो प्यार से करते वतन में हम  दोनों

धरम  के नाम की गर आरियाँ  नहीं चलती

**

चले वही जो करे जाँनिसार खुश हो के

वतन की राह में गद्दारियाँ नहीं चलती

**

बने हैं संत ये बदकार मिल रही इज्जत

कहूँ ये कैसे कि…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 7, 2015 at 4:04pm — 15 Comments

ग़ज़ल

समझ कर भी ये कुछ समझा नहीं है

ख़ुदा से आदमी डरता नहीं है



हमें हक़ के लिये लड़ना पड़ेगा

ये मौक़ा हाथ मलने का नहीं है



शराफ़त की दुहाई देने वालों

मुक़ाबिल इतना शाइस्ता नहीं है



ये आवाज़ों का जंगल है यहाँ पर

कोई फ़न्कार की सुनता नहीं है



नज़र के सामने रहता है लेकिन

कभी हमने उसे देखा नहीं है



ये दुनिया है संभल कर पाँव रखना

तुम्हारे घर का बाग़ीचा नहीं है



मैं अपनी क़ब्र में लेटा हुवा हूँ

मुझे अब कोई अन्देशा नहीं… Continue

Added by Samar kabeer on February 7, 2015 at 3:30pm — 23 Comments

संतुष्टि कहाँ है...? (अतुकांत)

धीमी-धीमी सी

हवाओं में

दीपों की टिमटिमाती लौ

दे जाती है

अंतर को भी रोशनी

बे-समय आँधियों ने

कब किया है, रोशन

बस! बुझा दिया

या फूंक दिए है जीवन

उन्ही दीपों से.

अथाह तेज बारिशों ने भी

बहा दिए हैं, जीवन

नदियों के मटमैले

जल से

प्यासा, प्यासा ही रहा

वैसे ही, जैसे

वैशाख-ज्येष्ठ की धूप में

बैठा हो

शुष्क किनारों पर

जीवन को तो

उतनी ही…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on February 7, 2015 at 1:03pm — 23 Comments

ग़ज़ल --बहारों में

२१२२ — १२१२ — ११२(२२)

खिल रहे हैं सुमन बहारों में

झूमता है पवन बहारों में

 

ओढ़कर फागुनी चुनर देखो

सज गया है चमन बहारों में

 

आइने की तरह चमकता है

निखरा निखरा गगन बहारों में

 

यूँ तो संजीदा हूं बहुत यारों

हो गया शोख़ मन बहारों में

 

देखते हैं खिलाता है क्या गुल

आपका आगमन बहारों में

 

हो धनुष कामदेव का जैसे

तेरे तीखे नयन बहारों में

 

घुल गई है फिज़ा में मदिरा…

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Added by khursheed khairadi on February 7, 2015 at 12:00pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
( ग़ज़ल )- ज़रूरी है क्या ? चश्मे तर खोजिये ---- गिरिराज भंडारी

ज़रूरी है क्या ? चश्मे तर  खोजिये

********************************

 

122    122    122    12

जहाँ ग़म  न हो ऐसा घर  खोजिये

जो हँसता मिले , बामो दर खोजिये

 

कोई  बाइसे  ज़िंदगी  भी  तो  हो

इधर  खोजिये  या उधर   खोजिये

 

बाइसे  ज़िंदगी = ज़िन्दगी का कारण

 

गिरा एक क़तरा था सागर में कल

ज़रा जाइये   अब  असर  खोजिये

 

अँधेरा , यक़ीनों…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 7, 2015 at 9:00am — 29 Comments

वो कातिल शोख नजरों से पिलाती है दिवाली में

तरही ग़ज़ल 

नयी उम्मीद की किरने जगाती है दिवाली में 

वो नन्ही जान जब दीपक जलाती है दिवाली में 

अगर हो हौसला दिल में तो तय है मात दुश्मन की 

जला के खुद को बाती ये सिखातीहै दिवाली में 

बताशे खील खिलते फूल दीपक झिलमिलाते यूं 

नहीं मुफलिस को यादे गम सताती है दिवाली में 

दियों का नूर चेहरे पर चले बल खा के शरमा के 

वो कातिल शोख नजरों से पिलाती है दिवाली में 

है रुत बहकी, हवा महकी, अजब दिलकश नज़ारा…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on February 6, 2015 at 11:30pm — 15 Comments

मैं अपनी मुहब्बत को …

मैं अपनी मुहब्बत को …एक रचना 



मैं अपनी मुहब्बत को इक मोड़ पे छोड़ आया हूँ

इक ज़रा सी ख़ता पे मैं हर क़सम तोड़ आया हूँ



जाने कितने लम्हे मेरी साँसों की ज़िंदगी थे बने

मैं तमाम ख़्वाब उनकी पलकों में छोड़ आया हूँ



जिसकी मौजूदगी  में खामोशी भी बतियाती थी

अब्र की  चिलमन में वो माहताब छोड़ आया हूँ



बन के  हयात  वो हमसे क्यों बेवफाई .कर गए

उनकी  दहलीज़ पे  मैं  हर  आहट छोड़ आया हूँ



हिज्र का  दर्द  चश्मे  सागर में न सिमट पायेगा…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 6, 2015 at 12:02pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़लत कोई और है ( अतुकांत ) -- गिरिराज भंडारी

ग़लत कोई और है , हम क्यों बदलें

********************************

बैलों का स्वभाव उग्र होता है , प्रकृति प्रदत्त

होना भी चाहिये

बिना उग्रता के भारी भारी गाड़ियाँ  नहीं खींची जा सकती

जो उसे जीवन भर खींचना है

बिना शिकायत

 

गायें ममता मयी , करुणा मयी होतीं है

गायों की थन से बहता दूध ,

दर असल उसकी ममता ही है ,

अमृत तुल्य , कल्याण कारी

 

गायें उग्र नहीं होतीं

प्रकृति जिसे धारिता के योग्य बनाती है , उसे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on February 6, 2015 at 11:00am — 18 Comments

अपनी पीठ थपथपाना ---डॉo विजय शंकर

कठिन है

बहुत ही कठिन है

हाथ पीछे कर अपनी ही पीठ थपथपाना,

लेकिन....

कुछ लोग थपथपा लेते हैं,

बार बार थपथपाते हैं ,

लगातार थपथपाते हैं ,

खुद, खुश भी हो लेते हैं,

किन्तु भूल जाते हैं कि...

हाथ का प्रयोजन केवल यही नहीं है,

जिंदगी बीत जाती है,

किन्तु नहीं जान पाते,

और न ही कर पाते हैं

हाथों का सही इस्तेमाल,

बस अपनी पीठ थपथपा

खुश होते जाते हैं |

कभी कभी तो सौगातें आती हैं,

और सामने से निकल जाती है,

किन्तु, उनकें… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 6, 2015 at 11:00am — 19 Comments

कुकुभ छंद


कुलषित संस्कृति हावी तुम पर, बांह पकड़ नाच नचाये ।
लोक-लाज शरम-हया तुमसे, अब बरबस नयन चुराये ।।
किये पराये अपनो को तुम, गैरों से आंख मिलाये ।
भौतिकता के फेर फसे तुम, घर अपने आग लगाये ।।

पैर धरा पर धरे नही तुम, उड़े गगन पंख पसारे ।
कभी नही सींचे जड़ पर जल, नीर साख पर तुम डारे ।
नीड़ नोच कर तुम तो अपने, दूजे का नीड़ सवारे ।
करो प्रीत अपनो से बंदे, कह ज्ञानी पंडित हारे ।।

...............................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on February 5, 2015 at 11:39pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बाजरे की बालियाँ...... ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

2122—2122—2122—212

 

खेत की, खलिहान की औ गाँव की ये मस्तियाँ

कितनी  दिलकश हो गई है  बाजरे की बालियाँ

 

वो कहन क्यूं खो गई जो महफिलों को लूट…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on February 5, 2015 at 11:00pm — 27 Comments

एक सपनों की दुनियाँ में ---- डॉ ० उषा चौधरी साहनी

यूँ ही बस यूँ ही लगता है , 
कभी इस दुनियाँ से निकल जाऊं , 
दूर  बहुत दूर चली जाऊं , 
किसी और दूसरी दुनियाँ में खो जाऊं, 
सपनों  दुनियाँ में चली जाऊं , 
आँखें मूँद लूँ ,  सपने देखूं , 
खूब ढेर  से  सपने देखूं , 
वो चाहे झूठे  ही क्यों न हों , 
कितने ही झूठे , पर देखूं , 
हँसू , खुद पर हँसू , इतराऊँ , 
मुस्कुराऊँ , धीरे से मुस्कुराऊँ, 
अपने में ही  खो जाऊं…
Continue

Added by Usha Choudhary Sawhney on February 5, 2015 at 10:30pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
किसी का कभी गम लिया होता..(ग़ज़ल 'राज')

122  122   122  2

कभी जिन्दगी को जिया होता

ख़ुदा का अदा शुक्रिया होता

 

मुकम्मल नई इक ग़ज़ल होती

अगर अश्क़ हँस के पिया होता

 

फ़लक चूमता ये कदम तेरे

कोई काम ऐसा किया होता

 

बिखरती न गिरती दुआ रब की

अगर चाकदामन सिया  होता

 

कई रास्ते  खुल गए होते

किसी का कभी गम लिया होता

 

कहाँ काटता यूँ अकेलापन

किसी को सहारा दिया होता

 

है क्या जीस्त खानाबदोशों की

ठिकाना न…

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Added by rajesh kumari on February 5, 2015 at 7:42pm — 18 Comments

न मैखाना शहर में है

बता दो याद अब उनकी मिटायें हम कहॉं जाकर

लिखा जो प्‍यार के किस्‍से सुनायें हम कहॉं जाकर



बजाकर जो कभी पायल जिगर के पास आती थी

नज़र उसको लगी मेरी बतायें हम कहाँ जाकर



न मैखाना शहर में है न उसका घर पता मुझको

जरा कोई बताये दिल लगायें हम कहाँ जाकर



न पीया जाम क्‍यों मैने अगर पूछो न तुम मुझसे…

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Added by Akhand Gahmari on February 5, 2015 at 6:30pm — 8 Comments

भूख हो रोटी न हो तो आप हँसकर देखिये।।

2122 2122 2122 212



भूख हो रोटी न हो तो आप हँसकर देखिये।।

मुफलिसी कहते है किसको इक नज़र कर देखिये।।



आशियाँ उजड़ा है उनका और वे बेघर हुए।

उन परिंदों की लिये खुद को शज़र कर देखिये।।



क्यों भटकते हो भला इस तंग दुनियाँ में मनुष।

इक दफे बस आप अपने घर को घर कर देखिये।।



तोड़ता दिन रात पत्थर चंद सिक्को के लिए।

उसके जैसी बेबसी को भी सहन कर देखिये।।



ख़्वाब नींदों को चुरा सकता नहीं इस शर्त पर।

शब को'दीपक'आप भी इक दिन सहर कर…

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Added by ram shiromani pathak on February 5, 2015 at 3:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल :फ़क़ीरों को डराओ मत

1222-1222-1222-1222

दिखाकर तुम हथेली की लकीरों को डराओ मत

रियाज़त से बदल देंगे नसीबों को डराओ मत               रियाज़त=परिश्रम

 

तबस्सुम के दिये की लौ गला देगी हर इक ज़ंजीर

शब-ए-गम की तवालत से असीरों को डराओ मत            तवालत=लम्बाई, असीर=कैदी

                                                  

ये जन्नत की हक़ीक़त भी बख़ूबी जानते हैं जी

दिखाकर डर जहन्नुम का ग़रीबों को डराओ मत

 

मज़ा आने लगा है अब सभी को दर्द-ए-उल्फ़त…

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Added by khursheed khairadi on February 5, 2015 at 1:00pm — 13 Comments

गाँव को तहजीब में यारो नगर मत कीजिए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212

******************************

कोशिशें  पुरखों  की  यारों बेअसर मत कीजिए

नफरतों को फिर दिलों का यूँ सदर मत कीजिए

******

मिट गये  ये तो  नरक  सी जिंदगी हो जाएगी

प्यार  को  सौहार्द  को यूँ दरबदर मत कीजिए

******

कर रहे हो  कत्ल  काफिर बोलकर मासूम तक

नाम  लेकर  धर्म का  ऐसा कहर  मत कीजिए

******

वो  शहीदी  कैसे  जिनसे  है  फसादों   की  फसल

उनको ये इतिहास में लिख के अमर मत कीजिए

*******

दुश्मनी …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 5, 2015 at 12:34pm — 22 Comments

भूख....(लघुकथा)

“ हे. भगवान..बस! एक पोते की कामना थी,  वो भी पूरी नहीं हो पाई इस बार. तीन-तीन पोतियों की लाइन लग गई ” अपनी बहु के कमरे से बाहर, खले की ओर जाते हुए मन में बडबडा ही रही थी, कि

“ माँ!! मैं बाजार जा रहा हूँ, कुछ लाना हो बता दो ” बेटे ने पूछा

“ हाँ! बेटा.. गुड़ ले आना, वो बूढी गाय न जाने कब जन जाए, अब की बार बछिया ले आये तो आगे भी घर का दूध मिल जाया करेगा “

      जितेन्द्र पस्टारिया

   (मौलिक व् अप्रकाशित)    

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on February 5, 2015 at 10:54am — 24 Comments

राधॆश्यामी छन्द:(मत्त सवैया)

राधॆश्यामी छन्द:(मत्त सवैया)

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रूपवती मृग-नयन सुन्दरी,कञ्चन काया भी पाई थी !!

दिल बार बार यॆ कहता था, वह इन्द्रलॊक सॆ आई थी !!

गर्दन ऊँची तनी हुई थी,त्रिभुवन जीत लिया हॊ जैसॆ !!

या त्रिलॊक सुंदरी का उसकॊ,रब वरदान दिया हॊ जैसॆ !!



तालाब किनारॆ बैठी थी वॊ,अधलॆटी सी कुछ सॊई थी !!

ऊहा-फॊह मची थी भीतर,अपनी ही धुन मॆं खॊई थी !!

मतवाली नार नवॆली वॊ,स्वयं स्वयं सॆ कुछ बात करॆ !!

ठहरॆ ठहरॆ गहरॆ जल मॆं, चुन चुन कंकड़ आघात करॆ !!…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on February 5, 2015 at 2:30am — 9 Comments

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