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होली ग़ज़ल-उस बस्ती में

२११-२११-२११-२११-२११-२११

होली का कुछ और मज़ा था उस बस्ती में

जश्न नहीं था एक नशा था उस बस्ती में

 

दिल के जंगल में यादों के टेसू लहके

तेरा मेरा प्यार नया था उस बस्ती में

 

शहरों में क्या धूम मचेगी, होली पर वो

भांग घुटी थी रंग जमा था उस बस्ती में

 

चंग बजाते घर घर जाते रसियों के दल   

हरदम दिल का द्वार खुला था उस बस्ती में

 

जोश युवाओं का भी ठंडा ठंडा है अब

बूढों का भी जोश युवा था उस बस्ती…

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Added by khursheed khairadi on March 1, 2015 at 9:00pm — 21 Comments

कुण्डलिया छंद

जनमत जिसके साथ में, उसकी होती जीत,

अहंकार जिसने किया, जनता करे न प्रीत |

जनता करे न प्रीत, जीत न उसे मिल पाए

जो भी चाहे जीत, काम जनता के आए

कह लक्ष्मण कविराय, मिटावे दिल से नफरत

जनहित की हो सोच, उसे ही मिलता जनमत |

 

दिल में भाव अभाव है,कोरा है वह चित्र 

दुख में कभी न छोड़ता,वह है सच्चा मित्र |

वह है सच्चा मित्र, श्रेय न कभी वह लेता

कपट धूर्तता बैर, पास न फटकने देता

लक्ष्मण देती साथ,ह्रदय से पत्नी इसमें

रहे…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 1, 2015 at 7:30pm — 19 Comments

ये भटकते हुये रास्ते

मैं हिला तक नहीं हूँ 

उस जगह से 

जहाँ तुमने छोडा था कभी 

तुम लौट आये हो

कौनसा रास्ता आया है 

लौटकर मुझ तक

खैर ! तुम्हारा कोई दोष नहीं है  

तुम्हारे लौट आने में 

ये रास्ते ही ऐसे हैं 

घूम फिर कर 

फिर आ पहुँचते हैं वहीं 

जहाँ से चले थे कभी 

राह से भटके हुये 

ये भटकते हुये रास्ते

तुम लौट ही आये हो 

तो कुछ देर आराम करलो

निकल जाना सुबह होते होते 

फिर किसी भटकते हुये रास्ते के साथ

रोज कई रास्ते निकलते…

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Added by umesh katara on March 1, 2015 at 5:00pm — 23 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल

1212 1122 1212 112/22



दबी हर आह तेरा इश्क़ भी दबा ही सही

जुदा है तेरा ये अंदाज़ तो जुदा ही सही



मेरी ग़ज़ल में उतर आती है वो आहिस्ता

मेरा हयात से बस इतना वास्ता ही सही



ग़ज़ल में डूब के खुद को भुला दिया हमने

चलो कुछ और नहीं तो यही नशा ही सही



खयाल तेरी तमन्ना का है मेरे दिल में

सो रहनुमाई को अब तेरा मशविरा ही सही



हर एक शय में मुहब्बत के किस्से बिखरे हैं

महल नहीं न सही एक मक़बरा ही सही



मेरा खयाले मसर्रत में… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2015 at 4:52pm — 22 Comments

मुझसे नकाब क्यों ? : हरि प्रकाश दुबे

दिल में रहने वाले मुझसे नकाब क्यों ?

इतना मुझे बता दे मुझसे हिज़ाब क्यों?

 

साकीं यह सुना तू है मदिरा का सागर

लाखों को तूने तारा मुझको जवाब क्यों?

 

मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना

गैरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?

 

तूने जिसको अपनाया उसको खुदा बनाया

उनका नसीब है अच्छा मेरा खराब क्यों?

 

छोटी सी ये हस्ती में है कुल कमाल तेरा

बेहद का है तू दरीया फिर मैं हुबाब क्यों?

 

© हरि…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 1, 2015 at 2:34pm — 30 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आम गज़ल - अरुण निगम

आम  हूँ  बौरा रहा हूँ

पीर में  मुस्का रहा हूँ

मैं नहीं दिखता बजट में

हर  गज़ट पलटा रहा हूँ  

फल रसीले बाँट कर बस

चोट को सहला रहा हूँ

गुठलियाँ किसने गिनी हैं

रस मधुर बरसा रहा हूँ

होम में जल कर, सभी की

कामना पहुँचा रहा हूँ

द्वार पर तोरण बना मैं

घर में खुशियाँ ला रहा हूँ

कौन पानी सींचता…

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Added by अरुण कुमार निगम on March 1, 2015 at 2:00pm — 14 Comments

एक तरही ग़ज़ल....-महिमा श्री

बहर- 

2122 1212  22

खुशनुमा ये सफ़र है क्या कहिये

साथ मेरे वो गर है क्या कहिये

 

आ गई जान पर है क्या कहिये

चाक मेरा जिगर है क्या कहिये

इश्क में जीत कुछ नहीं होती…

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Added by MAHIMA SHREE on March 1, 2015 at 11:30am — 29 Comments

बहिष्कार (कहानी )

बहिष्कार

“क्यों री आंनद की अम्मा ?अपनी देवरानी को शादी में नहीं बुलाईं क्या ?”निमन्त्रण पत्र पकड़ते हुए भोली की अम्मा यानि मायादेवी ने पूछा

“आपकी भी तो जेठानी लगती हैं |आपहि कौन उन्हें रामायण में बुलाई रहीं !” बिंदियादेवी ने मुँह बनाते हुए कहा

“हमार कौन सगी है,ऊपर से काम ही ऐसा करी हैं कि उन्हें बिरादरी से बहिरिया देना चाहिए |अपनी लड़की ही काबू में नहीं |पता नहीं कहाँ से मुँह काला कर आई |”

“हाँ दीदी ,सुना है चौका बाज़ार में बदरी बनिया के बेटे का काम था |जात-बिरादरी…

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Added by somesh kumar on March 1, 2015 at 11:14am — 10 Comments

हालात आदमी के - डॉo विजय शंकर

कितना होशियार है आदमी ,

हर समय सचेत रहता है ,

बुद्धि को प्रखर करता रहता है,

हर एक के दिमाग को पढ़ता रहता है ,

बस, जब लुटता है तो दिमाग से नहीं,

दिल से लुटता है,पूरे दिल से लुटता है ......



दिमाग उस समय भी

उसका चौकन्ना रहता है,

खूब याद रखता है, कि कब कहाँ ,

कैसे-कैसे , कितना-कितना लुटे ,

स्मृति में सब रहता है ,

बार बार , दोहराता रहता है,

सुनाता है अपने लुटने की कहानी,

दूसरों की भी सुनता है कहानी………



और फिर तैयार होता… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on March 1, 2015 at 11:00am — 21 Comments

ग़ज़ल -- सब कुछ न आज आदमी किस्मत पे छोड़ तू

सब कुछ न आज आदमी किस्मत पे छोड़ तू

दरिया की तेज धार को हिम्मत से मोड़ तू



इस जिन्दगी की राह में दुश्वारियाँ बहुत

रहबर का हाथ छोड़ न रिश्तों को तोड़ तू



मेहनत के दम पे आदमी क्या कुछ नहीं करे

अपने लहू का आखिरी कतरा निचोड़ तू



जो कुछ है तेरे पास वही काम आएगा

बारिश की आस में कभी मटकी न फोड़ तू



मन की खुशी मिलेगी, तू यह नेक काम कर

टूटे हुए दिलों को किसी तर्ह जोड़ तू



दो गज कफन ही अंत में सबका नसीब है

अब छोड़ भी 'दिनेश'…

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Added by दिनेश कुमार on March 1, 2015 at 1:00am — 12 Comments

गीतिका ---शायर

२११--२११/२११--२११/२११ २

मंचों को तज गाँवों में जा अब शायर

धन को मत भज गुर्बत को गा अब शायर

 

दूर गगन पर तूने सपने जा टाँगे   

इस धरती पर ज़न्नत को ला अब शायर

 

जाम बुझायेगें क्या तिसना इस  मन की

गम को पिघला छलका गंगा अब शायर

 

आहों से भी ज्यादा ठंडी हैं रातें

फुटपाथों पर नंगे तन आ अब शायर

 

चाँद सितारों से मत बहला दुनिया को  

इस माटी का कण कण चमका अब शायर

 

अच्छाई को ढाल बुराई की मत…

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Added by khursheed khairadi on March 1, 2015 at 12:30am — 10 Comments

ग़ज़ल-फागुन की मस्ती में

बड़ा चंचल हुवा जाता है मन फागुन की मस्ती में

नज़र आता है जब भीगा बदन फागुन की मस्ती में



लगी है दिल में ये कैसी अगन फागुन की मस्ती में

मज़ा देती है शोलों की तपन फागुन की मस्ती में



चली है झूमती गाती पवन फागुन की मस्ती में

खिला जाता है ये दिल का चमन फागुन की मस्ती में



सखी मन का मयूरा है मगन फागुन की मस्ती में

पिया से जा लगे मोरे नयन फागुन की मस्ती में



ये सोचा है कि इज़हार-ए-मुहब्बत कर ही डालूंगा

अगर हो जाएगा उन से मिलन फागुन की… Continue

Added by Samar kabeer on February 28, 2015 at 10:03pm — 12 Comments

लोग

लोग(समीक्षार्थ गज़ल प्रयास )

मन के कितने छोटे लोग

रहते क्या-क्या ओटे लोग

गंद डालकर चिल्लाते हैं

जितने भी हैं खोटे लोग

मन की नंगाई ना छोड़ें

लड़ते पहन लंगोटे लोग

टोटे वालों को खोटा बोलें

जो हैं मन के खोटे लोग

नाक़ाबिल परवान चढ़ रहे

तब्दीले-सूरत में कोटे लोग

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by somesh kumar on February 28, 2015 at 9:35pm — 9 Comments

फाल्गुनी दोहे

दिवस तीस औ पक्ष दो, छह रितु बारह मास।

होली उत्सव को सभी, बता रहे हैं खास।१।

आता समता को लिए, होली का त्यौहार।

सारे जग को बांटता, नेह भरा उपहार ।२।

खुशियाँ खूब उलीचता, फाल्गुन पूनम रात।

ख़ुशी साल भर ना खले, यही सोच मन…

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Added by Satyanarayan Singh on February 28, 2015 at 8:54pm — 23 Comments

कहानी : ग्लोबल वार्मिंग

(१)

 

"मुई मई जान लेने आ गई"। मनफूला ने पंखा झलते हुए कहा। सुबह के दस बज रहे थे और दस बजे से ही गर्म हवा बहनी शुरू हो गई थी। गर्मी ने इस बार पिछले सत्ताईस वर्षों का रिकार्ड तोड़ दिया था। उनकी बहू राधा आँवले के चूर्ण को छोटी छोटी शीशियों में भर रही थी। उसका ब्लाउज पसीने से पूरी तरह भीग चुका था। उनका बेटा श्रीराम बाहर कुएँ से पानी खींचकर नहाने जा रहा था। घर के आँगन में दीवार से सटकर खड़ी एक पुरानी साइकिल श्रीराम का इंतजार कर…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 28, 2015 at 6:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक तरही ग़ज़ल - मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो ( गिरिराज भंडारी )

221     1222     221      1222

 

चिलमन को ज़रा ऊपर , नज़रों से उठा दूँ तो

पर्दों की हक़ीक़त क्या , दुनिया को बता दूँ तो

 

ख़्वाबों में ख़यालों में , जीने का मज़ा क्या है

कुछ रंग हक़ीकत के , आज उसपे चढ़ा दूँ तो

 

ये उखड़ी हुई सांसे , लगतीं हैं बुलातीं सी

उन सांसों में मै अपनीं , सांसें भी मिला दूँ तो

 

नज़रों ने कही थी जो , नज़रों से कभी मेरी

वो बात सरे महफिल , मैं आज बता दूँ तो

 

राहे वफा में…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 28, 2015 at 3:44pm — 27 Comments

सवैये में होली

मदिरा सवैय्या (7 भगण +गुरु )  कुल वर्ण 22

 

चेतन-जंगम के उर में  अविराम  सुधा सरसावत है

रंग भरे प्रति जीवन में हिय आकुल  पीर बढ़ावत है

बालक वृद्ध युवा सबके  यह अंतस हूक जगावत है

पावन है मन-भावन है रुत फागुन की मधु आवत है

 

सुमुखी सवैय्या (7 जगण +लघु+गुरु )   कुल वर्ण 23

 

मरोर उठी  वपु में  जब से यह लक्षण  भेद बताय गयी

सयान सबै  सनकारि उठे तब भावज भी  समुझाय गयी

हुयी अब  बावरि  वात अनंग अनीक अली नियराय गयी

मथै…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 28, 2015 at 1:00pm — 27 Comments

फागुन लालित्य पर ... सार ललित छंद

छन्न पकैया, छन्न पकैया, बाबा देवर लागें

फागुन रुप  धरे मतवाला,भाव सुहाने जागे ॥

छन्न पकैया, छन्न पकैया, राधा है शरमीली

अस्सी गज का लहँगा पहने,चोली रंग रँगीली ॥

छन्न पकैया, छन्न पकैया, आम्र सुनहरे बौरे

केसर के नव पल्लव उगते, घूमें लोलुप भौरे ॥

छन्न पकैया, छन्न पकैया,पिक बयनी हरषाए

कुहू-कुहू करती रहती वो, सबके मन को भाए ॥

छन्न पकैया, छन्न पकैया, गेंदा चम्पा महके

शीतल मंद सुगंध हवा में, प्रेमी जोड़ा बहके…

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Added by kalpna mishra bajpai on February 28, 2015 at 10:30am — 14 Comments

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी ! विश्वास ह्रदय का मेरा है ||

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी! विश्वास ह्रदय का मेरा है | 

तुमको सब कुछ सौंप दिया , जो मेरा है सो तेरा है ||

मुक्त हुआ , कुछ फिक्र नहीं | 

तू सच है, केवल जिक्र नहीं | 

मैं चाहे जहाँ रहूँ लेकिन, तेरे नयन ह्रदय का डेरा है | 

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी! विश्वास ह्रदय का मेरा है ||

मैं सोता, तू जगती है | 

धीरज रोज , परखती है | 

है बन्द आँख में ख्वाब तेरा, भले नींद ने घेरा है | 

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी! विश्वास ह्रदय का मेरा है…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on February 28, 2015 at 9:00am — 8 Comments


मुख्य प्रबंधक
तरही ग़ज़ल : तू रात की रानी है (गणेश जी बागी)

          221-1222-221-1222

पत्थर से तेरे दिल को मैं मोम बना दूँ तो 

चिंगारी दबी है जो फिर उसको हवा दूँ तो.



इस शहर में चर्चे हैं तेरे रूप के जादू के

मैं अपनी मुहब्बत का इक तीर चला दूँ तो.



क्या नाज़ से बैठी हो फागुन के महीने में

मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो.



तुम कहते हो होली में इस बार न बहकूँगा

गुझिया व पुओं में मैं कुछ भंग मिला दूँ तो.…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 27, 2015 at 11:00pm — 28 Comments

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