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आप से इस हृदय का अनुबंध तोड़ा ना गया

2122 2122 2122 212

प्रीत या अनुराग का अनुबंध कब तोड़ा गया।

इस हृदय का आप से सम्बन्ध कब तोड़ा गया।।



तोड़ देता किस तरह से साँस अपनी ही स्वयं।

धड़कनों पर आपका प्रतिबन्ध कब तोड़ा गया।।



तोड़ देता किस तरह से साँस अपनी ही स्वयं।

धड़कनों पर आपका प्रतिबन्ध कब तोडा गया।।



गीत मैं सुर हो तुम्हीं हाँ शब्द मैं सरगम तुम्हीं।।

इस पुरुष का तुझ प्रकृति से बन्ध कब तोड़ा गया।।



राजपथ पर ख़्वाब के हो हमसफ़र बस एक तुम।

तुझसे अरमानों का सब गठबन्ध कब तोड़ा… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 23, 2015 at 8:00pm — 12 Comments

कब आओगे सरहद से ?

तुम और कॉफी दोनों का साथ

कब होगा मेरे साथ ?

तुम्हारे घर का बगीचा

पात-पात शांत

बर्फ की ओढनी ओढ़े

मुकुलित कालिका लजाती

सोखती स्वर्ण-आभा

चोटी पर तिरती सूर्य-किरणें 

खुशबू के गुंफन ने छुआ मुझे

लगा कि तुमने उढ़ाया हो,शॉल गुनगुना सा

आवृत्तियों ने मुझे घेरा

याद आने लगे वो दिन जब तुम

बैठे रहते थे बिल्कुल सामने मेरे

और तुम्हारी मूँगे जैसी आँखों में

छल्क पड़ती थी मैं बार-बार

और…

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Added by kalpna mishra bajpai on September 23, 2015 at 7:30pm — 8 Comments

भाव ( लघुकथा ) // शशि बंसल

" सुनिए , परसों से श्राद्ध शुरू हो रहे हैं । पड़ोस वाली चाची जी कह रही थीं , बहू घर में सुख शांति चाहिए हो तो , सोलह दिन पितरों की खूब सेवा कर । अब मुझे ये नहीं समझ आ रहा कि जो हैं ही नहीं , उनकी सेवा कैसी ?



" शरीर तो ईश्वर का भी नहीं है । फिर कौन सा तुम्हे हाथ पाँव दबाना है या दवा - दारू करनी है । परम्परा अनुसार कुछ स्वादिष्ट पकवान बनाना , हाथ जोड़ना और खाना - खिलाना ,बहुत हुआ तो चार रिश्तेदार भी बुला भेजना । इस बहाने थोड़ी जय - जयकार भी हो जायेगी तुम्हारी । बस हो गया श्राद्ध ।वो तो… Continue

Added by shashi bansal goyal on September 23, 2015 at 7:13pm — 5 Comments

हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है

जाने क्या सोच के उसने ये हिमाक़त की है

हो के दरिया जो समंदर से अदावत की है

खींच लायी हे तेरे दर पे ज़रुरत मुझको

हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है

हमने ख़ारों पे बिछाया हे बिछोना अपना

हमने तलवारों के साये में इबादत  की है

अच्छे हमसाये की तालीम मिली हे हमको

हमने जाँ दे के पडोसी की हिफाज़त की है

आज आमाल ही पस्ती का सबब हैं वरना

हमने हर दौर में दुनिया पे हुकूमत की है

दम मेरा कूच…

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Added by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on September 23, 2015 at 12:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल :: (बह्र-ए-शिकस्ता) -- कभी ये रहा है बेहद, कभी मुख़्तसर रहा है -- मिथिलेश वामनकर

फ़'इ'लात फ़ाइलातुन फ़'इ'लात फ़ाइलातुन 

1121 - 2122 - 1121 – 2122

 

कभी ये रहा है बेहद, कभी मुख़्तसर रहा है

मेरा दर्द तो हमेशा, दिलो-जां जिगर रहा है…

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Added by मिथिलेश वामनकर on September 23, 2015 at 10:00am — 18 Comments

क्षणिकायें - 7 --- डॉo विजय शंकर

1. फूल जानता है
कितनी है जिंदगी ,
फिर भी खिलता है ,
तो मुस्कुराता है ,
हँसता है ,
खुशियाँ बिखेरता है।

2. पेड़ कहीं जाते नहीं
फल पक जाएँ तो
रुक पाते नहीं ..........

3. क्या फितरत है
तुम्हारी
हमें छोड़ गए और
अपना
न जाने क्या क्या
हमारे पास छोड़ गए ……

4. सादगी भी
अजीब चीज़ है
कितने रंगीन
सपने दिखा देती है ………

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 23, 2015 at 9:55am — 10 Comments

पूजेंगे उन्हें हम फिर

कब हुयी थी बात जनता से

कब आए थे तुम हमारे गाँव

कब फांकी थी तुमने गलियारे की धूल

कब तुम्हारी खादी पर जमी थी गर्द की परतें

कब दिया था आख़री भाषण यहाँ पर डूब कर पसीने में

कब किया ब्यालू यहाँ के एक हरिजन संग

और पानी था पिया अकुआगार्ड का जो साथ थे लाये

गाँव को तो याद है वह दिन, भूल जाते हो मगर तुम

देश की संसद बड़ी है, डूब जाते हो वही तुम

देश का दुर्भाग्य है वह नहीं मिल पाता कभी भी

चाह कर तुमसे बड़े बंधन है अजब…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 23, 2015 at 9:30am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - आइनों से पत्थरों के वास्ते ( गिरिराज भंडारी )

 2122        2122        212 

खुशनुमाँ से अवसरों के वास्ते

आसमाँ तो हो परों के वास्ते

 

मै तो आईना लिये फिरता हूँ अब

आइनों से पत्थरों के वास्ते

 

अब तो दीवारें गिरायें यार हम

गिर रहे हैं उन घरों के वास्ते

 

थोड़ी अकड़न भी अता करना ख़ुदा

बे सबब झुकते सरों के वास्ते

 

कुछ बहाने और हैं, ले जाइये

आदतन से कायरों के वास्ते

 

मैं हक़ीकत बाँध के लाया हूँ आज 

कुछ छिपे अंदर डरों के…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 23, 2015 at 6:49am — 15 Comments

गजल

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन



तू भले कुछ भी कहे मैं कामना करता रहूँगा

रूप रस की चाहना- आराधना करता रहूँगा।

जल रहा संसार खुद से आग अपनी ही जलाये

बाँट आया प्यार घर- घर याचना करता रहूँगा।

जो लगाते आग चलते ज्वाल उनको हो मुबारक

मैं चला हूँ मेघ बनकर साधना करता रहूँगा।

दे रही जो दर्द चपला कर सकूँ बे-दर्द उसको

हो धरा मैं सोंख लूँ यह कामना करता रहूँगा।

आदमी हो आदमी का हो गया सब भूलकर भी

आदमी के हित रहूँ मैं प्रार्थना करता…

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Added by Manan Kumar singh on September 22, 2015 at 10:00pm — 8 Comments

इंसानी फ़ितरत – ( लघुकथा ) –

इंसानी फ़ितरत – ( लघुकथा )  –

"हे पवन देव ,कृपया मेरी  सहायता कीजिये"!आम के वॄक्ष ने कराहते हुए कहा

“क्या हुआ  बन्धु, कोई कष्ट है क्या"!

"क्या आप नहीं देख रहे, यह उदंड मानव झुंड, पत्थर मार मार कर मुझे घायल कर रहा हैं"!

"तो इसमें मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं"!

"आप अपने वेग से मुझे झकझोर कर मेरे फ़लों को नीचे गिरा दीजिये ताकि यह  संतुष्ट होकर,  पत्थर प्रहार बंद कर दें"!

"तुम बहुत भोले हो मित्र, ऐसा कुछ भी नहीं होगा,ये इंसान  हैं"!

"आपके इस…

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Added by TEJ VEER SINGH on September 22, 2015 at 8:56pm — 13 Comments

ग़ज़ल : जब कभी तनहाइयों का

2122      2122     2122    212

जब कभी तनहाइयों का आईना मुझको मिला ।

अपने अन्दर आदमी इक दूसरा मुझको मिला ।।

 

हमसुखन वो हमनफ़स वो हमसफ़र हमजाद भी ।

जान लूँ इस चाह में कब आशना मुझको मिला ।।

 

वक्ते रुखसत हाल उसका भी यही था दोस्तों ।

अक्स मेरा चश्मे नम पर कांपता मुझको मिला ।।

 

मंज़िलों से  और बेहतर हसरते मंज़िल लगे ।

लिख सकूं तफसील जिसकी रास्ता मुझको मिला ।।

 

जो बजाते खुद हुआ इल्मो अदब का आफ़ताब…

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Added by Ravi Shukla on September 22, 2015 at 3:20pm — 8 Comments

इंतज़ार (कविता)

डाकखाने का डाक बाबू 

जब अपनी साइकिल पर

चिट्ठियों का थैला लेकर

गाँव की गलियों में आता

तो घर की चौखट पर

अधखुले दरवाजे के पीछे

घूँघट की ओट से दो आँखे

डाक बाबू की राह तकती

आज तो उसके नाम कि भी

जरूर कोई डाक होगी

पुकारेगा डाक बाबू

आज उसका नाम

बलम परदेसी ने …

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Added by Rajni Gosain on September 22, 2015 at 1:30pm — 8 Comments

रेतीला पत्थर

45 
रेतीला पत्थर
========
ए पर्णपूरित लता!
तू  इतनी न इतरा, 
अपने इस रूप पर ,
लावण्य पर, सरलता पर।
मालूम नहीं शायद, 
तू जिसे सरल अवलंबन मानती है,
वह सीधा सूखा ढाक है।
लिपटकर, जिससे आलिंगन कर, 
ऊपर को बढ़कर सुख आभास करती है,
वह तेरा हितैषी तेरा ही काल है।
तेरे रूप के प्रशंसक ये मानव,
कल उन्मत्त होकर,
पलास को पत्तों सहित अग्नि…
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Added by Dr T R Sukul on September 22, 2015 at 10:53am — 2 Comments

फांसी - लघुकथा

जेल की दीवारे चीख चीख कर कह रही थी कि बीती रात रहमत अली ने हाल ही में सजा काटने आये कैदी को मार डाला। लेकिन उसके माथे पर एक भी शिकन नही थी, वो तो अपनी बैरक में खामोश बैठा सोच रहा था।

"अब मिला मुझे सकूं, उसको उसके किये की सजा दे कर मैंने अपनी बीबी को ही इंसाफ नही दिया बल्कि अदालत के झुठे फैसले को भी सच कर दिया है।"

"रहमत अली। अपनी खामोशी तोड़ो और बताओ कल रात क्या हुआ?" थानेदार ने सवाल पूछते हुये उसे लगभग झिंझोड़ दिया।

"अब छोड़िये भी साहब! रात गयी बात गयी।" रहमत अली एक गहरी…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on September 22, 2015 at 10:00am — 11 Comments

लघुकथा - पूंछ

लघुकथा – पूंछ

सीढ़ियाँ गंदी हो रही थी कविता ने सोचा झाड़ू निकल दूँ. यह देखा कर पड़ोसन ने कचरा सीढ़ियों पर सरका दिया.

बस ! फिर क्या था. कविता का पारा सातवे आसमान  पर, “ मैं इस के बाप की नौकर हूँ. नहीं निकाल रही झाड़ू,” बड़बड़ाते हुए कविता ऊपर आई , “ साली अपने को समझती क्या है ? कभी सीढ़ियों पर पानी डाल देगी. कभी लहसन का कचरा. कभी कुछ. मैं इस की नौकर हूँ जो रोजरोज सीढ़ियाँ साफ करती रहू. साली अपने को न जाने क्या समझती है ?

“ क्यों जी. आप बोलते क्यों नहीं.” उस ने पति के हाथ से अख़बार…

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Added by Omprakash Kshatriya on September 22, 2015 at 8:30am — 4 Comments

"चिंगारियां"- (लघु कथा)

"चिंगारियां" - (लघु कथा)



"और ये देखो मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के वो नोट्स जो तुमने मुझे सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी के लिए मुझे दिये थे।इन्हें आज भी मैं संभाल कर रखे हुए हूँ। "- अस्त-व्यस्त से कमरे में वीरेंद्र ने पाँचवीं सिगरेट से एक लम्बा सा कश लेते हुए कहा- " सुमित , तुमने मेरे अंदर भी एक चिंगारी पैदा कर दी थी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए.... और विश्वास करो... वह एक आग में भी तब्दील हो गई थी तुम्हारे नियमित सान्निध्य में। तुम एक सच्चे दोस्त और मार्गदर्शक बने रहे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 22, 2015 at 12:22am — 2 Comments

ग़ज़ल :- मगर वो साज़िशें करता रहेगा

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन

नज़र पे जब तलक पर्दा रहेगा
तुम्हारा अक्स भी धुंदला रहेगा

मैं ज़ख़्मों की तिजारत कर रहा हूँ
बताओ फ़ायदा कितना रहेगा

वो सरगोशी में बातें कर रहा है
जो देखेगा उसे ख़दशा रहेगा

मिलेंगे हम मगर ये शर्त होगी
हमारे दरमियाँ पर्दा रहेगा

वहाँ मेरी ख़मोशी काम देगी
वो अपनी आग में जलता रहेगा

"समर" ,मालूम है अंजाम उसको
मगर वो साज़िशें करता रहेगा

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by Samar kabeer on September 21, 2015 at 11:15pm — 21 Comments

अ से अंधेरा~~~~~मनोज अहसास

बड़े दिनों के बाद में आखिर

उनका बुलावा आ ही गया

सरकारी शिक्षक होने का

मन में कितना हर्ष हुआ

घर से दूर जाना था मुझको

लेकिन सोचा कोई बात नहीं

यही सत्य है इस जग का

कुछ खोकर ही कुछ पाना है

रात से बेहतर होता सवेरा

भले ही बादल वाला हो

पहुँच गया जब शिक्षा मंदिर

देखकर मन बस टूट गया

ऐसा लगा

उन्नत समाज साफ़ सुथरा जीवन

कितना पीछे छूट गया

घोर कालिमा खुरदरी भूमि

श्यामपट्ट से चेहरों तक

मैले कपड़ो में नन्हा भारत

आँखों में… Continue

Added by मनोज अहसास on September 21, 2015 at 9:26pm — 12 Comments

कीचड़ .....

कीचड़ .....

सड़क पर फैले हुए कीचड से

एक कार के गुजरने से

एक भिखारन के बदन पर

सारा कीचड फ़ैल गया

अपनी फटी हुई साड़ी से कीचड़ पौंछते हुए

उसने अपने मन की भंडास निकालते हुए कहा

अमीरजादे गाड़ी से कीचड उछालते हैं

और पलट के भी नहीं देखते

इन्हें भूख से बिलबिलाते हुए

पेट को भरने के लिए रक्खा

भीख का कटोरा नजर नही आता

बस फ़टे कपड़ों से झांकता

बदन नज़र आता है

मेहरबानी पेट पर नहीं

बस बदन पर होती है

वो खुद पर गिरे कीचड़ को

साफ़…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 21, 2015 at 8:00pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पलट के फिर आयेंगी- शिज्जु

12112 12112 12112 12112

पलट के फिर आयेंगी वो महक सबा वो सहर कभी न कभी

उदास न हो कि होगा हर इक दुआ का असर कभी न कभी



ये राह बहुत तवील सही, तू तन्हा ओ बेक़रार सही

मगर तुझे याद आयेगी ये घड़ी ये सफ़र कभी न कभी



यूँ हाथ के आबलों पे न जा, ज़बीं से टपकती बूंदें न देख

दिखेगा ज़रूर दुनिया को भी, तेरा ये हुनर कभी न कभी



पिघलने लगेंगे संगे-महक, तेरे तबो-ताब से किसी दिन

निकाल के लायेंगे यही पत्थरों से नहर कभी न कभी



फ़लक़ ये ज़मीन आबो हवा,… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2015 at 5:22pm — 12 Comments

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