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तुम्हारी सोच में फिरका -ग़ज़ल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर "

1222    1222    1222    1222

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सदा सम्मान  इकतरफा  कहाँ तक  फूल  को दोगे

तिरस्कारों  की हर गठरी  कहाँ  तक शूल को दोगे /1



उठेगी  तो करेगी  सिर से  पाँवों तक बहुत गँदला

अगर तुम प्यार का कुछ जल नहीं पगधूल को दोगे /2



नदी  आवारगी  में  नित  उजाड़े  खेत  औ  बस्ती

कहाँ तक दोष इसका  भी कहो  तुम कूल को दोगे /3



तुम्हारी  सोच  में  फिरके  उन्हें ही पोसते हो नित

सजा  तसलीमा  रूश्दी को  दुआ मकबूल…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 9, 2016 at 11:00am — 12 Comments

लेन-देन की परम्परा [ अतुकांत कविता] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

लेन-देन की परम्परा

नीचे से ऊपर तक

छोटों से बड़ों तक



ऊपरवाला भी अब करता

व्यवसाय सी प्रक्रिया

कभी देता, कभी लेता

हिसाब बराबर सब करता

संकेतों को कौन समझता?



इन्सान ही तो कर्ता-धर्ता

दूर-तंत्र से नचता

विकास संग विनाश का मेला

रंगीन, संगीन, ग़मगीन

कोई बदनाम, कोई नामचीन



गति, प्रगति, मति या अति में

यति करती स्वत: प्रकृति

सृष्टि की अजब नियति

अवसरवादिता की प्रखर

मानव जैसी चतुर

लेन-देन की… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 9, 2016 at 9:18am — 8 Comments

नब्ज :लघुकथा: हरि प्रकाश दुबे

“वह दौड़ कर अपने बड़े भाई के गले से लग गया और बोला, भईया कितने दिनों बाद मिल रहा हूँ आपसे, बता नहीं सकता कितनी ख़ुशी हो रही है मुझे, बस इस महानगर में अपना ही घर खोजने में जरा सी दिक्कत हुई..हा हा ।“

“हाँ –हाँ ठीक है छोटे, और बताओ कैसे आना हुआ, सब ठीक तो है ना, और माँ-पिताजी कैसे हैं, एक-आध दिन तो रुकोगे ना?”

भाई की नीरसता को देखकर वह कुछ देर के लिए उलझन में पड़ गया पर मुस्कराते हुए बोला नहीं भईया आज ही निकल जाऊँगा, शाम की गाड़ी है, मैं तो बस आपको चाचा की लड़की की शादी का…

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Added by Hari Prakash Dubey on February 9, 2016 at 8:30am — 11 Comments

थाप पे तबले की ....



थाप पे तबले की ....

थाप पे  तबले  की  घुंघरू बजने लगे

किसने  पहचानी  इनकी  परेशानियां

दाम लगने लगे ज़िस्म थिरकने लगे

आई नज़र में नज़र तो बस हैवानियाँ

थाप पे तबले की ......

सब  खरीददार  थे  कोई  अपना न था

सूनी  आँखों  में  कोई भी सपना न था

चीर डाला  हर  एक  हाथ ने जिस्म को

बज़्म में चश्म से दर्द छलकना  न  था

शोर साँसों  की सिसकी का हर ओर था

हर  सिम्त  थी  बस नादान नादानियां

पाँव  घुंघरू  बंधे  महफ़िल में बजते रहे

किसने  …

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Added by Sushil Sarna on February 8, 2016 at 9:58pm — 8 Comments

ग़ज़ल :- हज़रत-ए-'मीर' की ज़मीन में

फाइलातुन मफाइलुन फेलुन / फइलुन / फेलान



चैन इस दिल को कब नहीं आता

बाम पर चाँद जब नहीं आता



ख़ुश मिज़ाजी हमारा शैवा है

हमको गैज़-ओ-ग़ज़ब नहीं आता



सब हैं सैराब आपके दर से

एक भी तिश्ना लब नहीं आता



नामा उनका लिये हुए क़ासिद

पहले आता था अब नहीं आता



तल्ख़ लहजा मिरा मुआफ़ करें

बे अदब हूँ अदब नहीं आता



'मीर' साहिब,ग़ज़ल कही लेकिन

शैर कहने का ढब नहीं आता



ज़िक्र तेरा "समर" करेंगें वो

नाम भी ज़ेर-ए-लब नहीं… Continue

Added by Samar kabeer on February 8, 2016 at 3:00pm — 30 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
सिर्फ तुम्हारी ......अतुकांत // डॉ. प्राची

मेरा,

तुम्हारी होने का बोध-

घुला है संदल सा

मेरी चेतना में,

कि विस्तारित होती ही जाती है

प्रेम सुगंधि

चहुँदिश.....

ये बोध-

स्पंदन स्पंदन सा

अंकित है

संवेदी कोषों की स्मृतियों में,

कि आईना भी अब मुझमें

सिर्फ तुम्ही को तो पाता है.....

गूँजती हैं

सिर्फ तुम्हारी स्वर लहरियाँ

अस्तित्व की अतल गहराइयों में,

जब ख़ामोशी की चादर ओढ़

डूबने लगती हूँ मैं अक्सर अकेली.....

प्रेमअगन में तप-तप,

यों गेरुआ हुई जाती है… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 8, 2016 at 12:30pm — 7 Comments

चूक( लघुकथा )राहिला

दरबार खत्म हुये काफ़ी वक्त हो चुका था। लेकिन बादशाह सलामत अभी तक ज़ेहनीतौर पर जैसे वहां से लौटे ही नहीं थे।

"क्या बात है जहांपनाह!आप इतने खामोश?लगता है आज दरबार में कोई खास बात हो गई।"बादशाह को काफ़ी देर से गुमसुम देख बेग़म बोली।

"हम्म..सही कह रही है आप!अभी तक बहुत मुकदमे देखे बेगम!लेकिन आज के जैसा नहीं देखा।

"अच्छा!!ऐसा क्या खास था इस मुकदमे में।"हैरानी से बेगम ने पूछा ।

"एक बूढ़े लाचार बाप ने अपने निहायती बदतमीज,निकम्मे और अय्याश बेटे के खिलाफ मुकदमा दायर ।किया था । उसका… Continue

Added by Rahila on February 7, 2016 at 10:36pm — 27 Comments

ग़ज़ल- निलेश "नूर"

ग़ज़ल 

गा गा लगा लगा/ लल/ गा गा लगा लगा

.

झीलों में ऐसे..... चाँद डिबोता हूँ आज भी,

आँखों में रख के आप को रोता हूँ आज भी.  

.

अब तक दरख्त जितने उगाए, बबूल हैं,

दिल में मगर मैं यादों को बोता हूँ आज भी.

.

आदत में था शुमार तेरे साथ जागना,

तेरे बगैर देर से सोता हूँ आज भी.

.

नमकीन पानियों से जो रंगत निखरती है,

रुख़सार आँसुओं से मैं धोता हूँ आज भी.

.

काँधे पे इक सलीब उठाए फिरा करूँ,

नाकामियों का बोझ मैं ढ़ोता हूँ आज…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on February 7, 2016 at 9:30pm — 16 Comments

आप कैसे देखते है?

आप कैसे देखते है?
उसे कैसे स्वीकारते है
दुलार्ते हैं या नकारते हैं
यह आप पर निर्भर है.
आपके समाज पर निर्भर है.
कैकेई भी, कौशल्या भी,
देवकी और यशोदा भी
वाचाल मंथरा भी.
पुरुष की जननी भी
माता और भगिनी भी.
ज्वाला की अग्नि भी.
आप कैसे देखते है?
आधुनिकसमाज सुधारकों के अनुसार
दलित, शोषित, पीड़ित,उपेक्षित
वंचित, कुचलित भी वही है.
आप कैसे देखते है?

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on February 7, 2016 at 4:03pm — 6 Comments

सोये हो तो जागो - डॉo विजय शंकर

क्या कापुरुषत्व अब

सधे पौरुष का पर्याय बन गया है।

विवेक-शून्य होकर

हाँ में हाँ मिलाना ही

विवेक-शील होने का

एकमात्र प्रमाण बन गया है।



समय के साथ चलिए ,

हमारे साथ आगे बढ़िये ,

भले ही हमारा एहसास

सत्रहवीं शताब्दी का हो ।

समवेत-स्वर में गाइये,

सप्तम-स्वर में गाइये ,

स्तुति, वंदना , प्रशस्ति-गान ,

हमारे लिए , आज़ादी है ,

कहाँ मिलेगी ऐसी आज़ादी।

बाकी आवाज उठाना,

समझदार हैं आप ,

समय की बर्बादी है ,

अपनी ही… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 7, 2016 at 12:23pm — 6 Comments

बचपन (लघुकथा)~शीतांशु

1 ||बचपन||



मैं मध्य अवकाश के बाद हमेशा स्कूल से छूमंतर हो जाता । दीदी, अक्सर बैग उठाकर लाती । और घर पर मुँह बंद रखने के बदले मुझसे चॉकलेट जरूर लेती थी। किन्तु मैं बेफिक्र होकर कभी फूलों के लिए 'चम्पा की बॉडी', बेर के लिए नरसिंग टेकड़ी, तो कभी पिकनिक मनाने 'भेडलेश्वर-बड़दख्खन' के बाग में , नदी किनारे चले जाते था। और ठीक स्कूल छूट्टी के समय पर घर लौट आने का क्रम चलता रहा। मैडम की शिकायत भी दीदी संभाल लेती। दोस्तों के साथ नीम, इमली,आम के कई नन्हें पौधें गोबर के ढ़ेर व रुखड़े पर से निकाल कर… Continue

Added by Vijay Joshi on February 7, 2016 at 3:15am — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल प्रयास 1....//डॉ. प्राची

2122 2122 2122 2122



बत्तियाँ सारी बुझा कर द्वार पर साँकल चढ़ा कर

मस्त वो अपनी ही धुन में मुझको मुझसे ही चुरा कर



साँस हर मदहोश करती हाथ में खुशबू बची बस

फूल सब मुरझा चुके हैं राह में काँटे बिछा कर



क्या उसे एहसास भी है उस सुलगती सी तपिश का

जिस सुलगती राख में वो चल दिया मुझको दबा कर



सींच कर अपने लहू से ख्वाब की मिट्टी पे मिलजुल

जो लिखी थी दास्तां वो क्यों गया उसको मिटा कर



मेरी पलकों पर सजाए उसने ही सपने सुनहरे

जब कहा…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 6, 2016 at 8:00pm — 13 Comments

संध्या के बाद पूर्व ऊषा तक जो निशि भाग चुना मैंने I उस  शब्द-हीन सन्नाटे में  ईश्वर का राग सुना मैंने II                                                   पुच्छल  तारे की थी वीणा शशि-कर के तार सजीले …

संध्या के बाद पूर्व ऊषा तक जो निशि भाग चुना मैंने I

उस  शब्द-हीन सन्नाटे में  ईश्वर का राग सुना मैंने II

                                                 

पुच्छल  तारे की थी वीणा

शशि-कर के तार सजीले थे

उँगलियाँ चलाता था मारुत

रजनीले  लोचन  गीले थे

सरगम संगीत प्रवाहित था अपना प्रतिभाग गुना मैंने I

संध्या के बाद पूर्व ऊषा  ---------------------------------

 

मुखरित होता है मौन कभी

नीरवता  में  भी रव होता

धरती…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 6, 2016 at 2:54pm — 8 Comments

ठंडा डब्बा कांच जड़ा [लघु कथा ]

उस गाँव के छोटे से स्टेशन में कोई गाड़ी नहीं रूकती थी , एक दो  पैसेंजर गाड़ियों को छोड़कर I वो और जस्सी ,धड धड करके  मुहँ चिढ़ाकर निकलती गाड़ियों को खुले  मुहँ  और फैली आँखों से  देर तक देखते रहते थे I उन गाड़ियों के ठन्डे डब्बे जो कांच से एकदम बंद होते थे ,जस्सी को बहुत लुभाते थे I उन दोनों सात आठ  साल के बच्चों की आँखों में एक ही सपना हुआ करता था कि  ठंडे   डब्बे वाली गाड़ी में बैठना है एक दिनI

 स्टेशन की बैंच  में बैठा वो इन्हीं पुरानी यादों में खोया था I आज स्टेशन का नज़ारा कुछ और…

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Added by pratibha pande on February 6, 2016 at 2:40pm — 21 Comments

ग़ज़ल.....इस्लाह के लिए...मनोज अहसास

2122 2122 2122 212

फिर करीने से सजा लूँ मैं तेरी सौगात को

वेदना को कल्पना को इश्क़ को जज़्बात को



इसमें युग युग की विवशता है या कोई शाप है

छूने को साहित्य आतुर सत्ता वाली लात को



अपनी ही करनी का फल है ज़िन्दगी में हर सजा

उनको आँखों में बसाकर जागते हैं रात को



खुद के जैसा रह न पाये और जिन्दा भी रहे

इससे ज्यादा चोट क्या है आदमी की जात को



दूजे पलड़े में सजेगी फलसफा ए ज़िन्दगी

एक पलड़े में चढ़ा दो इश्क़ की शह मात को…

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Added by मनोज अहसास on February 5, 2016 at 11:00pm — 5 Comments

अच्छे दिन !

१-   अच्छे दिन !

सुबह-शाम !

घर-चौबारे आशंकित

प्रतीक्षारत सहेजते हैं...

दीप-बाती और तेल

आक्रोशित तम व्यग्रतावश बिखेर देता

असंख्य नक्षत्र....

भद्रा से प्रभावित

आर्द्रा-रोहिणी

व्यथित कृष्ण-ध्रुव की राह तकती

चांद, बादलों के घात से दु:खी

हवायें दृश्य बदल देतीं

बसंत के इशारों पर पतझड़

होलिका दहन कर बिखेरते

रोशनी,  

चांदनी में लम्बी-लम्बी छाया...

ठूंठ वृक्ष,

नंगी टहनियां सब…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 5, 2016 at 10:05pm — 27 Comments

निर्भया का गुनाहगार बाइज़्ज़त बरी

आज फिर भीष्म शर्मसार है

बंद मुठियां भींचती है…

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Added by amita tiwari on February 5, 2016 at 9:30pm — 3 Comments

मुरलिया का मन पहचाना नहीं ......

वंशी बजाते जीता किये जग



मुरलिया का मन पहचाना नहीं ......



कह के गए थे लौटंगे लौटेंगे ...



कहना हमारा तो माना नहीं ......



जिनके पैरों में बादल छिपे हों



उनका तो कोई ठिकाना नहीं .......



जोड़ा कभी दिल ले तोडा कभी



बातों में तेरी अब आना नहीं .........



सौगंध का क्या ले…
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Added by amita tiwari on February 5, 2016 at 9:30pm — 4 Comments

समा गया तुम में

कभी कभी ऐसा भी होता है एहसास
की सचमुच है सचमुच के आस पास
ऐसे ही जैसे स्वास निःस्वास
हवा पानी ये समूचा आकाश
हालाँकि मालूम है
की ये खाली एहसास है
 …
Continue

Added by amita tiwari on February 5, 2016 at 9:00pm — 5 Comments

बासन्ती गन्ध

बासन्ती  गन्ध

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सोचा था,

उस पार ,

शान्त निर्विघ्न क्षणों में,

पहुंच,

तुम्हारी मधुरस्मृति को सतत करूंगा।।



अलसाये ललचाये मन की तृप्ति हेतु,

नवकल्पित स्वरूप में,

खुद को व्यथित करूंगा।।



पर हाय! निठुर इस विपुल पवन के

तीक्ष्ण शूल,

ले आये,

 बासन्ती  गन्धयुक्त मधु झरित फूल।।



रह गया भ्रमित इस पार,

प्रिये!

उस पार.…

तुम्हारी याद रही.…

अब बतलाओ ,

मैं,

मधुर तुम्हारे…

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Added by Dr T R Sukul on February 5, 2016 at 3:00pm — 15 Comments

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