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पावन भाव(कुण्डलिया)

पावन ही यदि भाव हो,तो पावन त्यौहार
सूत्र रक्षार्थ बाँधती, भाई को हर नार
भाई को हर नार,चाह रक्षा की रखती
हर भाई में नेक,मनुष वह हर पल लखती
सतविन्दर कविराय,विचारों का हो धावन
पूजित हो हर नार,रहे सबका दिल पावन।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 18, 2016 at 11:00am — 6 Comments

ग़ज़ल: अंदाज कातिलों के बेहतरीन बहुत हैं

अंदाज कातिलों के बेहतरीन बहुत हैं ।

कुछ शख्स इस शहर में नामचीन बहुत हैं ।।



वो खैर मांगते रहे बुरहान की सदा।

उसकी दुआ में पेश हाज़रीन बहुत हैं ।।



आज़ाद मीडिया है अदावत का तर्जुमा ।

गुमराह हर खबर पे नाज़रीन बहुत हैं ।।



जब भी जला वतन तो जश्ने रात आ गयी ।

दैरो हरम के पास मजहबीन बहुत हैं ।।



मिटते हैं वही मुल्क बड़े जोर- शोर से ।

बैठे जहाँ घरों में फिदाईन बहुत हैं ।।



मेरी बलूच आसुओं पे जब नज़र गई ।

वो हुक्मरान देखिए…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 18, 2016 at 11:00am — 6 Comments

स्वाभिमानी पत्थर-रामबली गुप्ता

मानव उवाच(कुकुभ छंद)



सुनो कथा पत्थर की भैया,

पत्थर क्या-क्या सहते हैं?

कथा व्यथा है इनकी सच मे,

डरे-डरे-से रहते हैं।।

जिसका भी जी चाहे इनको,

दीवारों में चुनवा दे ।

और हथौड़े की चोटों से,

टुकड़ों मे भी तुड़वा दे।।



पत्थर उवाच(ताटंक छंद)



चोटों की परवाह नही है,

चोटों पर दिल वारा है।

मानवता के काम आ सकें,

ये सौभाग्य हमारा है।।

महल-अटारी-मंदिर-मस्जिद,

नगर-डगर गुरुद्वारा है।

जग में गिरि से लघु कंकड़… Continue

Added by रामबली गुप्ता on August 18, 2016 at 6:34am — 4 Comments

रक्षा का बंधन ( लेख ) - डॉo विजय शंकर

रक्षा बंधन बहन-भाई के पारस्परिक स्नेह , प्रेम , एक दूसरे के प्रति जीवन-पर्यन्त चलने वाले दायित्व बोध का एक अत्यंत खुशनुमा पर्व। शायद इसी का एक रूप विकसित हुआ है ," फ्रेंडशिप बैंड " . राखियों का विशाल बाजार , हीरे और अन्य रत्नों से जड़ी लाख लाख रुपये की राखियां, दिल्ली जैसे महानगर में रक्षा बंधन के दिन ट्रैफिक का भर-पूर रश , डी टी सी द्वारा प्रायः बहनों के लिए रक्षा - बंधन को फ्री-सर्विस। कितना सुन्दर लगता है , सब कुछ। एक दिन भाई के लिए , बहन के लिए , वैसे ही जैसे सारी दुनियाँ में एक साथ " मदर्स… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 17, 2016 at 8:31pm — 2 Comments

बिलखते हैं बच्चे , सिसकती हैं माएँ मनाएं भला जश्न कैसे बता दो------------ग़ज़ल

122 122 122 122 122 122 122 122

अभी जाने कितने घरों में न चूल्हा

न जाने ही कितनों के घर, ये तो जानो।

बहुत कीमती फोन हाथों में लेकर

वो नेता बताता दिखा मीडिया को।।1।।



सफेदी थी झक्कास गाड़ी गज़ब की

सफ़ारी थी शायद औ मॉडल नया था।

गरीबी पे व्याख्यान देकरके जिसमें

मसीहा गरीबों का चढ़कर गया, वो।।2।।



परिस्थिति पे घड़ियाली आँसू बहाकर

तसल्ली बहुत दे गया था जो नेता।

मदद को बुलाया था आवास पर ही

मिटाये कहाँ दाग मन पर दिया ,… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 17, 2016 at 3:30pm — 4 Comments

अपराधबोध--

"मैं जा रही हूँ घर छोड़कर, मुझे रोकना मत", फोन पर रितू को ये कहते सुनकर सलिल चौंक गया|

"क्या हुआ, मैंने तो सब कुछ भुला दिया है, तुम भी क्यूँ नहीं भूल जाती सब कुछ", उसने तुरंत पूछा|

"वही तो नहीं कर पा रही हूँ, मैं इंसान हूँ, तुम्हारी तरह देवता नहीं", बोलते बोलते वो सुबकने लगी|

"मैं आ रहा हूँ, एक बार मिलने के बाद बेशक चली जाना, मैं रोकूंगा नहीं", कहते हुए उसने फोन रख दिया और ऑफिस से निकल कर घर चल पड़ा| घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला हुआ ही था, वो अंदर कमरे में पहुँचा, रितू अपना…

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Added by विनय कुमार on August 17, 2016 at 1:30pm — 8 Comments

गजल(मनन)

(रमल मुसद्दस सालिम)
2122 2122 2122
हो फटा दामन भले पर मत लजाओ
फेंकते पत्थर जरा उनकी गिनाओ।1

टाँकते फिरते वसन अबतक रहे तुम
अब जरा उनकी हकीकत भी बताओ।2

घाटियों को घर समझने हैं लगे सब
जेब में कौड़ी पड़ी अपनी बताओ।3

दोस्ती कुर्बान अबतक सरहदों पर
पार से आवाज आती कर बढ़ाओ।4

हार जाता जो हमेशा वार कर के
चाहता दुश्मन चलो भी आजमाओ।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on August 17, 2016 at 9:30am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - इक अक़ीदा चल के बुतखाना हुआ -( गिरिराज भंडारी )

2122    2122    212 -

की मुहब्बत पर न जल जाना हुआ

जल उठूँ, ऐसा न मस्ताना हुआ

 

इक अक़ीदत बढ के मस्ज़िद हो गई   *---  श्रद्धा

इक अक़ीदा चल के बुतखाना हुआ  ----    विश्वास ,

वो न आयें, तो रहीं मजबूरियाँ 

हम न पहुँचे तो ये तरसाना हुआ

बात उनकी सच बयानी हो गई

हम हक़ीक़त जब कहे , ताना हुआ

 

आपने कैसी खुशी बाँटी हुज़ूर

चेह्रा चेह्रा आज ग़मख़ाना हुआ

 

चाहते…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 17, 2016 at 9:30am — 14 Comments

ताटंक छंद

ताटंक छंद

---

1

बुरे समय का खेला चलता, गुण की कीमत जाती है

लोग बुरे आगे बढ़ते हैं,अच्छों की मत जाती है

मक्कारी के घर भरते हैं,सच्चाई घबराई है

जनता देखो भूखी मरती,कुत्ता खात मलाई है।

2.

बहा पसीना खेत कमाता, पोषण सबका होता है

खुद का बच्चा तड़प तड़प कर, भूखा घर में सोता है

कुदरत ने तो मारा उसको,करता तंत्र पिसाई है

जनता देखो भूखी मरती,कुत्ता खात मलाई है।



3

जो करते हैं काम अनेकों ,नाम कभी क्या होता है,

काट लफंगे खा जाते… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 16, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

आ मेरे ख़यालों में हाज़िरी लगा दीजै (ग़ज़ल)

बह्र : २१२ १२२२ २१२ १२२२

 

आ मेरे ख़यालों में हाज़िरी लगा दीजै

मन की पाठशाला में मेरा जी लगा दीजै

 

फिर रही हैं आवारा ये इधर उधर सब पर

आप इन निगाहों की नौकरी लगा दीजै

 

दिल की कोठरी में जब आप घुस ही आये हैं

द्वार बंद कर फौरन सिटकिनी लगा दीजै

 

स्वाद भी जरूरी है अन्न हज़्म करने को

प्यार की चपाती में कुछ तो घी लगा दीजै

 

आग प्यार की बुझने लग गई हो गर ‘सज्जन’

फिर पुरानी यादों की धौंकनी लगा…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 16, 2016 at 9:00pm — 16 Comments

कि जब तुम लौट कर आओगे::एक स्मृति

हौसला टूट चुका है, अब यकीन कहीं जख्मी बेजान मिलेगा,

कि जब तुम लौट कर आओगे तो सब वीरान मिलेगा ll



वो बरगद का पेड़ जहां दोनों छुपकर मिला करते थे,

वो बाग जहां सब फूल तेरी हंसी से खिला करते थे,

वो खिड़की जहां से छुपकर तुम मुझे अक्सर देखा करती थी,

वो गलियां जो हम दोनों की ऐसी शोख दिली पर मरती थीं,

वो बरगद,वो गलियां, वो बाग बियाबान मिलेगा,

कि जब तुम लौट कर आओगे……………l



खेत-खलिहान तक तुमको बंजर मिलेगा,

मेरी दुनिया का बर्बाद मंजर…

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Added by Er Anand Sagar Pandey on August 16, 2016 at 6:30pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

२२१ २१२१ १२२१ २१२



पगडंडियों के भाग्य में कोई नगर कहाँ ?

मैदान गाँव खेत सफ़र किन्तु घर कहाँ ? 

 

होठों पे राह और सदा मंज़िलों की बात

पर इन लरजते पाँव से होगा सफ़र कहाँ ? 

 

हम रोज़ मर रहे हैं यहाँ, आ कभी तो देख..

किस कोठरी में दफ़्न हैं शम्सो-क़मर कहाँ ? 

 

सबके लिए दरख़्त ये साया लिये खड़ा

कब सोचता है धूप से मुहलत मगर कहाँ !

 

जो कृष्ण अब नही तो कहाँ द्रौपदी कहीं ?

सो, मित्रता की ताब में कोई असर कहाँ ? 

 

क़ातिल…

Continue

Added by Saurabh Pandey on August 16, 2016 at 4:00pm — 27 Comments

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

इन्सां के लिए ... (क्षणिकाएं)

1 .

एक पत्थर उठा

शैतां के लिए

एक पत्थर उठा

जहां के लिए

एक पत्थर उठा

मकां के लिए

देवता बन

जी उठा

एक पत्थर

इन्सां के लिए

...... ..... ..... .....

२.

मैं आज तक

वो रिक्तता

नहीं नाप सका

जिसमें

कोई माँ

अपने जन्मे को

तन्हा छोड़

ब्रह्मलीन हो जाती है

मन को शून्यता की

क़बा दे जाती है

..... ..... ..... ..... .....

३.

हमने

प्रवाहित कर दी थी…

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Added by Sushil Sarna on August 16, 2016 at 2:19pm — 10 Comments

अब भी कुछ संभावनाएँ शेष हैं (ग़ज़ल)

2122 2122 212



जानता हूँ आपदाएँ शेष हैं।

क्यों डरूँ?जब तक दुआएँ शेष हैं।



जन्म लेते ही रहेंगे राम-कृष्ण,

जब तलक धरती पे माँएँ शेष हैं।



कोशिशें तो आप सारी कर चुके,

अब तो केवल प्रार्थनाएँ शेष हैं।



सूर्य ढलने को अभी कुछ वक़्त है,

अब भी कुछ संभावनाएँ शेष हैं।



बोलिये! इस दौर में कैसे जिये?

जिसके दिल में भावनाएँ शेष हैं।



मंदिरों से देवता ग़ायब हुए,

मूर्तियों में आस्थाएँ शेष हैं।



बस्तियाँ तो बाढ़ में… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on August 16, 2016 at 1:16pm — 11 Comments

लालसा की चोरी /लघुकथा

मैदान के किनारे सड़क के पार टपरी के बाहर वह माथे पर शिकन लिये बेचैन -सा बैठा है।अंदर बच्चा पिछले कई घंटों से रोये जा रहा था। पिछले कई दिनों से उसे बुखार है। सरकारी दवाई बेअसर थी। सामने पूरे मैदान में शामियाना लगा हुआ है। बैंड-बाजे की आवाज शोर बनकर कान को फाड़ने पर तुली हुई थी।

उसके घर में आज समस्त फसाद की जड़ ये बैंड-बाजा ही थी। पकवानों की सुगंध अमीर -गरीब का घर कहाँ देखती , बिना पूछे सीधे अंदर घुस आई।

पकवानों की सुगंध से मचलता खाने को तरसता बीमार बच्चा ,अब उसे कैसे…

Continue

Added by kanta roy on August 16, 2016 at 10:57am — 6 Comments

ताटक छ्न्द-सतविन्द्र

ताटंक छ्न्द



पास खड़ी है सजधज कर वह,दुल्हन सबसे प्यारी है

सबको वही पसन्द बहुत है,देखो सबसे न्यारी है

वरण किया जो लेकर आए,उसको वे मतवाले थे

आजादी की दुल्हन खातिर,खुद मिट जाने वाले थे।



देकर अपनी आहुति जो भी,आजादी को लाए थे

राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे

कुछ तो तोड़ गये थे बेड़ी, जो गैरों ने डाली थी

अबतक भी है घोर गुलामी,जो अपनों ने पाली थी।



भूख बनी आदत जिसकी है,खाने को कब दाना है

तन सर्दी से ठिठुर रहा है,नहीं वस्त्र का… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 15, 2016 at 11:04pm — 6 Comments

बाल मज़दूरी ( लघुकथा)

मुझे पढ़ना है

"बाल मज़दूर ! यह क्या होता है अंकल । यह आप किसके लिये बोल रहे थे ।"

" ओह ! कल्लू तो तुमने हमारी बातें सुन ली । बच्चे मज़दूर माने मेहनत करने वाला । बाल मज़दूर माने बच्चा जो दिन भर मेहनत करके रोटी कमाये । "

" अच्छा ! पर मेरी अम्मी तो मुझे राजा बेटा बुलाती है और बाबा मुझे कहते है पैसे की खान । पर यह होता क्या है ? खान माने !! "

"अरे तुम्हारे बाबा भी है क्या ? वो क्या करते है ? "

" है न मेरे बाबा , वे तो घर में ही रहते हैं । अम्मी कहती हैं वो जुवारि हैं । कुछ काम… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 15, 2016 at 6:22pm — 1 Comment

ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )

ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )

---------------------------

शिकवे गिले भुलाकर उल्फत को हम बढ़ाएं ।

मिल जुल के आओ जश्ने आज़ादी हम मनाएं ।

तोड़ें न मंदिरों को मस्जिद नहीं गिराएं ।

माहौल एकता का हम देश में बनायें ।

क़ुर्बानियों से जिनकी आज़ाद हम हुए हैं

हम उनके हक़ में आओ दस्ते दुआ उठायें ।

उल्फत से हम रहेंगे झगड़ा नहीं करेंगे

क़ौमी निशाँ के नीचे आओ क़सम ये खाएं।

गैरों ने जिस अदा से अपने वतन को लूटा

अपनों को भा गयी हैं शायद वही अदाएं ।

बस…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on August 15, 2016 at 1:47pm — 12 Comments

आजादी के पावन पर्व पर....

आजादी के पावन पर्व पर.....

आजादी के पावन पर्व पर

तिरंगा हम फहराते हैं

मर मिटने को देश…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 15, 2016 at 11:31am — 8 Comments

‘बेच रहा है आज तिरंगा’

 

चौराहे नाके पर बालक

बेच रहा है आज तिरंगा

 

झंडे लेकर उससे इक दो

कुछ पैसे उसको दे डालो

फिर गाडी में उन्हें लगा कर

आज़ादी की रस्म निभा लो

 

खाली हाथों घर जो लौटा

बाप करेगा पी कर पंगा

 

शनि लेकर कल घूम रहा था

सरसों तेल व जलती बाती

भूखे बच्चे चौराहे पर

कब बीतेगी साढ़े साती

 

रोजी उसकी ही खा जाता 

खादी  जाली का हर दंगा

 

बीते न बस रस्मी…

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Added by pratibha pande on August 15, 2016 at 11:18am — 4 Comments

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