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लिप्सा के परित्याग से खिलता आत्म प्रसून

दोहा/ ग़ज़ल

चाहत के तूफान में, उजड़े चैन सुकून

चिंता में जल कर हुआ, भस्म खुदी का खून

गीता में लिक्खा गया, राहत का मजमून

लिप्सा के परित्याग से, खिलता आत्म-प्रसून

संग्रह का जो रोग है, बढ़ता प्रतिपल दून

लोभ अग्नि में हे! मनुज, यूँ खुद को मत भून

सुख का एक उपाय बस, इच्छा करिए न्यून

बाकी मर्ज़ी आपकी, खटिए चारो जून

मनस वेदना के लिए, यह बढ़िया माजून

सो पंकज नें कर लिया, लेखन एक जुनून

मौलिक…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 16, 2018 at 11:23am — 11 Comments

ग़ज़ल नूर की--ये अजब क़िस्सा रहा है ज़िन्दगी में

२१२२/ २१२२/२१२२ 

.

ये अजब क़िस्सा रहा है ज़िन्दगी में

याद आता है मुझे वो बेख़ुदी में.

.

काश उन के लब मेरे होंठों को चूमें

मूँद कर आँखें.. पडा हूँ चाँदनी में.

.

जब रिहाई की कोई सूरत नहीं है

लुत्फ़ लेना सीख ही लूँ बेबसी में.

.

एक जुगनू जो लड़ा था तीरगी से    

याद कर लेना उसे भी रौशनी में.

.

याद कर के अपने माज़ी के पलों को

बहते हैं आँखों से आँसू हर ख़ुशी में.

.

आपका अहसान मुझ पर यह बहुत है

आप ने है दर्द घोला…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on January 15, 2018 at 9:00pm — 16 Comments

पुआल बनती ज़िन्दगी(कहानी )

पुआल बनती ज़िन्दगी

 

जब मैं गाँव से निकला तो वह पुआल जला रही थी | ठीक उसी तरह जिस तरह वह पहले दिन जला रही थी,जब मैंने उसे इस बार,पहली बार देखा था | ना तो मैं उससे तब मिला था ना आज जाते हुए | पर मैं संतुष्ट था |मेरी अभिलाषा काफ़ी हद तक तृप्त थी |मेरे पास एक उद्देश्य था और एक जीवित कहानी थी |

 पहली बार जब मैं स्टेशन के लिए निकला तभी पत्नी ने फोन करके कहा की गाड़ी का समय आगे बढ़ गया है और जैसे ही मैं गाँव में लौटा मैंने खुशी मैं शोर मचाया और वह भी चिड़ियों की…

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Added by somesh kumar on January 15, 2018 at 8:29pm — No Comments

ख़्वाब के साथ ...

ख़्वाब के साथ ...

न जाने कब
मैं किसी
अजनबी गंध में
समाहित हो गयी

न जाने कब
कोई अजनबी
इक गंध सा
मुझ में समाहित हो गया

न जाने
कितनी कबाओं को उतार
मैं + तू = हम
के पैरहन में
गुम हो गए


और गुम हो गए
सारे
अजनबी मोड़
हकीकत की चुभन को भूल
ख़्वाबों की धुंध में
कभी अलग न होने के
ख़्वाब के साथ

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on January 15, 2018 at 6:00pm — 6 Comments

कुंडलियां

कुण्डलियाँ



१.

मिलना-जुलना जान लो,है रिश्तों को खाद

स्नेह-मिलन होता रहे,चखें नेह का स्वाद

चखें नेह का स्वाद,बात औरों की जानें

करकें बातें चार,स्वयं को अच्छा मानें

'सतविंदर' इस स्नेह,की न हो सकती तुलना

पनपें एक्य विचार,रहे यदि मिलना-जुलना।।



२.

समरथ हैं बस देवता,सच्चे रचनाकार

गीत गजल संगीत के,हैं अच्छे फ़नकार

हैं अच्छे फ़नकार,रचें नित न्यारी माया

इनका हर सद्कर्म, ज़माने को है भाया

'सतविंदर' कविराय,करो न प्रयास… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2018 at 9:31am — 8 Comments

बे-आवाज़ सिक्के /लघुकथा

‘अगर मैंने पाँच का यह सिक्का पाखाने में ख़र्च कर दिया और मुझे आज भी काम नहीं मिला तो फिर मैं क्या करूँगा?’ सार्वजनिक शौचालय के बाहर खड़ा जमाल अपनी हथेली पर रखे उस पाँच के सिक्के को देखकर सोच रहा था। तभी उसके पेट में फिर से दर्द उभरा। वह चीख उठा, ‘‘उफ! अल्लाह ने पाखाने और भूख का सिस्टम बनाया ही क्यों?’’



जिस उम्र में जवानी शुरु होती है उस उम्र में उसके चेहरे पर बुढ़ापा था। लेबर चैराहे के कुछ अन्य मजदूरों की तरह पिछले कई दिनों से जमाल को भी कोई काम नहीं मिला था। घर भेजने के बाद जो…

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Added by Mahendra Kumar on January 14, 2018 at 1:00pm — 12 Comments

विमोचन(लघु कथा)



-धन्यवाद, पैसे खाते में आ गये।प्रयाग में विमोचन हो जाये?

-‎अच्छा रहेगा।

-‎हॉल वगैरह बुक कर दिया है।बस कुछ लोगों की व्यवस्था आप करा लीजिये।

-‎आपके प्रकाशन की और पुस्तकें भी हैं न?

-‎थीं,पर अब उनका विमोचन शायद अलग से हो।

-‎क्यूँ?

-‎लेखकों की भागीदारी पूरी नहीं हो रही है।

-‎फिर?

-‎यह कार्यक्रम आपका ही होगा।सम्मानित भी हो जायेंगे आप।

-‎बात तो समूह में पुस्तकों के विमोचन की थी।

-‎सम्भव नहीं है।

-‎फिर अलग से देखेंगे।मेरे पैसे में कितनी प्रतियाँ…

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Added by Manan Kumar singh on January 14, 2018 at 12:40pm — 15 Comments

मकर संक्रान्ति (दोहा छंन्द)

मकर राशि मे सूर्य का, ज्यों होता आगाज

बच्चे बूढ़े या युवा, बदलें सभी मिजाज।1।

भिन्न भिन्न हैं बोलियाँ, भिन्न भिन्न है प्रान्त

पर्व बिहू पोंगल कहीं, कहीं यहीं संक्रांत।2।

कहीं पर्व यह लोहड़ी, मने आग के पास

वैर भाव सब जल मिटे, झिलमिल दिखे उजास।3।

नदियों में डुबकी लगे, सब करें मकर स्नान

घर मे पूजा पाठ हो, सन्त लगाएं ध्यान।4।

उत्तरायणी पर्व पर, दान धर्म का योग

काले तिल में गुड़ मिले, लगे उसी का…

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Added by नाथ सोनांचली on January 14, 2018 at 11:47am — 4 Comments

कटाक्षिकाएँ



(1) राष्ट्रीय पर्व पर

मिला किसी को

पद्म भूषण , पद्म विभूषण

तो किसी को मिला पद्म श्री

लेकिन जो थे सच्चे हक़दार

नहीं मिला उन्हें यह सम्मान

क्योंकि उनकी नहीं थी कोई

राजनैतिक पहचान । 

 

(2) जिन बच्चों को माँ-बाप ने

चलना -फिरना , उठना-बैठना

आदि का सलीका सिखाया

उन्हीं बच्चों ने बड़ा होकर

बुढ़ापे में वृद्धाश्रम पहुँचाया ।

 

(3) दुर्घटना और बीमारियाँ

बहुत सस्ती हो गईं हैं

इसीलिए तो-

बीमा किश्त महँगी…

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Added by Mohammed Arif on January 14, 2018 at 7:00am — 12 Comments

तू अगर बा - वफ़ा नहीं होता - सलीम रज़ा रीवा

 2122 1212 22 

तू अगर बा - वफ़ा नहीं होता

दिल ये तुझपे फ़िदा नहीं होता   

-

इश्क़ तुमसे किया नहीं होता 

ज़िन्दगी में मज़ा नहीं होता

-

ज़िन्दगी तो  संवर गयी  होती 

ग़र वो मुझसे जुदा नहीं होता

-

उसकी चाहत ने कर दिया पागल 

प्यार  इतना  किया  नहीं  होता 

-

सबको दुनिया बुरा बनाती है

कोई इंसाँ बुरा नही होता

-

चोट खाएँ भी मुस्कुराएँ भी

अब रज़ा हौसला नहीं होता. …

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Added by SALIM RAZA REWA on January 13, 2018 at 10:30pm — 21 Comments

दूर कहीं सुख है मेरा (कविता)

दूर कहीं सुख है मेरा 

हैं यहाँ दुखो का डेरा 

करता हूँ जिससे शिकायत

बस उसने तुरंत मुँह फेरा 

हर तरफ़ है तू-तू, मैं-मैं 

हर जगह बस मेरा-तेरा 

हम एक हैं ,ख्वाब बन गया 

समय ने ही है यह खेल खेला 

कंक्रीट  के मकान बन रहे 

भीड़ का है बस रेला-पेला |

देखकर,सब को मैंने सोचा

चला लिया खूब दुखों का ठेला 

स्वच्छ मन से हँसने लगा मैं 

खिल उठा अंतर-मन…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 13, 2018 at 9:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया : आद ; रदीफ़ :नहीं

बहर : २१२२  २१२२  २१२२  २२(११२)

हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं

बादशाही सैनिकों से कोई’ फ़रियाद नहीं |

“देशवासी की तरक्की हो” पुराना नारा

है नई बोतल, सुरा में तो ईजाद नहीं |

भक्त था वह, मूर्ति पूजा की लगन से उसने

द्रौण से सीखा सही वह, द्रौण उस्ताद नहीं |

देश है आज़ाद, हैं आज़ाद भारतवासी

किन्तु दकियानूसी’ धार्मिक सोच आज़ाद नहीं |

लूटने का मामला…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on January 13, 2018 at 9:41am — 8 Comments

गज़ल

1222 1222 122



सुकूँ के साथ कुछ दिन जी लिया क्या ।

वो अच्छा दिन तुम्हें हासिल हुआ क्या ।।

बहुत दिन से हूँ सुनता मर रहे हो ।

गरल मजबूरियों का पी लिया क्या ।।

इलक्शन में बहुत नफ़रत पढाया।

तुम्हें इनआम कोई मिल गया क्या ।।

लुटी है आज फिर बेटी की इज़्ज़त ।

जुबाँ को आपने अब सी लिया क्या ।।

सजा फिर हो गयी चारा में उसको ।

खजाना भी कोई वापस हुआ क्या ।।

नही थाली में है रोटी तुम्हारी ।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 13, 2018 at 2:00am — 3 Comments

ग़ज़ल- मिला कुछ नहीं जाँच पड़ताल में।

बह्र- फऊलुन फऊलुन फऊलुन फउल

मग़रमच्छ घड़ियाल को जाल में।

फँसा कर रहेंगे वो हरहाल में।

खुदा जाने होंगी वो किस हाल में।

मेरी बेटियाँ अपनी ससुराल में।

निकालो नहीं बाल की खाल को,

नहीं कुछ रखा बाल की खाल में।

नतीजा सिफर का सिफर ही रहा,

मिला कुछ नहीं जाँच पड़ताल में।

मिनिस्टर का फरमान जारी हुआ,

गधे बाँधे जायेंगे घुड़साल में।

हुई हेकड़ी सारी गुम उसकी तब,

तमाचा पड़ा वक्त का गाल में।

कभी…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on January 12, 2018 at 10:05pm — 12 Comments

कंधों का तनाव(कहानी )

कंधों का तनाव

जो आज हुआ वो अप्रत्याशित था |साढ़े नौ बजे जब में उतरा तो यकीन था कि भोजन आ रहा होगा |बाइक लॉक करके और टी.वी. चलाकर मैं भोजन का इंतजार करने लगा |जिस निशिचिंत्ता से पिताजी सोए थे मुझे यकीन था कि वो खा चुके होंगे |माताजी चूँकि नीचे बैठीं थी इसलिए ये विश्वास था कि या तो वो खा चुकी होंगी या खा रही होंगी |इसी बीच पिताजी ने करवट ली और टी.वी. देखने लगे |मैं निश्चिन्त था कि पिताजी खा चुके होंगे |घड़ी सवा दस बजा चुकी थी और मैं उहापोह में था |सुबह और दोपहर का…

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Added by somesh kumar on January 12, 2018 at 9:48pm — 5 Comments

मुआफ़ी- लघुकथा

धीरे धीरे सभी जुटने लगे थे, नजदीक के रिश्तेदार भी लगभग आ गए थे| उनके मोबाइल पर लगातार बेटे का फोन आ रहा था कि बस पहुँच रहे हैं माँ के अंतिम दर्शन करने के लिए| आंगन में विभा का शरीर सफ़ेद कपड़े में लपेट कर रखा हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे वह हमेशा से ऐसी ही शांति में जी रही थी| उन्होंने एक बार फिर समय देखा और पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ चुपचाप बैठ गए|

बाहर गाड़ियों की आवाज़ आयी और फिर थोड़ी देर में रोने धोने की आवाज़ भी आने लगी| बेटा परिवार सहित अंदर आया और फिर उनका विलाप शुरू हो गया| उनको…

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Added by विनय कुमार on January 12, 2018 at 8:39pm — 10 Comments

सुख

सुख

सुख! सुख! लोगों के जीवन में सुख है कहाँ

जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी दुखी हैं यहाँ

सुख हमारे जिंदगी में मृग तृष्णा जैसी है यहाँ

सदा हमसे दूर ही देखने में नजर आती यहाँ

अपने नेताओं को दौलत की खुशबू आती जहां

सभी अपने ईमान को बेचकर टूट पड़ते वहाँ

सभी लोग सुख खरीदने की कोशिस करते जहाँ

माँ बाप भाई बहन पैसे के आगे सब झूठे यहाँ

अपनों से लोग झूठ फरेब धोखा सब करते यहाँ

थोड़ी सुख के लिए लोग अंगारों पर चलते यहाँ

ज़िंदगी की नाव में परिवार…

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Added by Ram Ashery on January 12, 2018 at 8:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल "ऐसे भी माहौल बनाया जाता है"

22 22 22 22 22 2



रिश्ता जो इक बार बनाया जाता है।

वो फिर सारी उम्र निभाया जाता है।।

ऐसे भी माहौल बनाया जाता है।

कुछ होता कुछ और दिखाया जाता है।।

ऐसा देखा यार सियासत में अक्सर।

इक दूजे को चोर बताया जाता है।।

सच हो पाए जो न किसी भी सूरत में।

क्यों अक्सर वो ख़्वाब दिखाया जाता है।।

 रंग बदलते गिरगिट सा कुछ लोग यहाँ।

मतलब हो तो प्यार जताया जाता है।।

ये सच्चाई तो जग जाहिर है यारो।

जो…

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Added by surender insan on January 12, 2018 at 2:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल - तेरी आँखों में अभी तक है अदावत बाकी

2122 1122 1122 22



तेरी आँखों में अभी तक है अदावत बाकी ।

है तेरे पास बहुत आज भी तूुहमत बाकी ।।

इस तरह घूर के देखो न मुझे आप यहाँ ।

आपकी दिल पे अभी तक है हुकूमत बाकी ।।

तोड़ सकता हूँ मुहब्बत की ये दीवार मगर।

मेरे किरदार में शायद है शराफत बाकी ।।

ऐ मुहब्बत तेरे इल्जाम पे क्या क्या न सहा ।

बच गई कितनी अभी और फ़ज़ीहत बाकी ।।

मुस्कुरा कर वो गले…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 12, 2018 at 10:00am — 7 Comments

बुलाऊँ नींद, तेरा आना अब ज़रूरी है-ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

तुम्हारे दीद की ख़ाहिश अभी अधूरी है

इसीलिए तो निगाहें खुली ही छोड़ी है

तमाम ख़ाब हैं आँखों में तेरी ही ख़ातिर

बुलाऊँ नींद, तेरा आना अब ज़रूरी है

किसी अज़ीज़ नें आख़िर मुझे सिखाया तो

यूँ रोज़ रोज़ ग़ज़ल लिखना बेवकूफ़ी है

जहाँ के लोगों के दुःख दर्द का गरल अपने

उतारा सीने में तब ही कलम ये पकड़ी है

बताऊँ कैसे उन्हें शायरी जुनून हुई

नसों में दौड़ती पंकज के, ये बीमारी है

मौलिक…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 11, 2018 at 5:41pm — 7 Comments

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