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प्यार का दंश या फर्ज

प्यार का दंश या फर्ज

तुलसीताई के स्वर्गवासी होने की खबर लगते ही,अड़ोसी-पड़ोसी,नाते-रिश्तेदारों का जमघट लग गया,सभी के शोकसंतप्त चेहरे म्रत्युशैय्या पर सोलह श्रंगार किए लाल साड़ी मे लिपटी,चेहरे ढका हुआ था,पास जाकर अंतिम विदाई दे रहे थे.तभी अर्थी को कंधा देने तुलसीताई के पति,गोपीचन्दसेठ का बढ़ा हाथ,उनके बेटों द्वारा रोकने पर सभी हतप्रद रह गए.पंडितजी के आग्रह करने पर भी,अपनी माँ की अंतिम इच्छा का मान रखते हुये, ना तो कंधा लगाने दिया,ना ही दाहसंस्कार में लकड़ी.यहाँ तक कि उनके चेहरे के अंतिम…

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Added by babitagupta on February 26, 2019 at 4:24pm — 3 Comments

-कह मुकरिंयाँ -

1-

उसके कारण तन में प्राण।

वही करे मेरा कल्याण।

खान गुणों की जैसे यक्ष।

क्या सखि साजन? ना सखि वृक्ष।।

2-

वह तो मेरा जीवन दाता।

हर धड़कन से उससे नाता।

है वह ईश्वर के समकक्ष।

क्या सखि साजन? ना सखि वृक्ष।।

3-

उसके कारण ही दिल धड़के।

सर्वाधिक प्रिय लगता तड़के।

जीवन का वह रक्षति रक्ष।

क्या सखि साजन? ना सखि वृक्ष।।

4-

बचपन से वह मेरे संग।

सुंदर है उसका हर अंग।

मनभावन वह लगे अधेड़।

क्या सखि साजन ? ना सखि…

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Added by Hariom Shrivastava on February 25, 2019 at 10:46am — 6 Comments

ग़ज़ल

अब शहादत को न जाया कीजिये ।

आइना उनको दिखाया कीजिये।।

मुल्क में है इन्तकामी हौसला ।

हौसलों को मत दबाया कीजिये ।।

आग उगलेगी सुख़नवर की कलम ।

अब न कोई सच छुपाया कीजिये ।।

ख़ाब जो देखें हमारे कत्ल की ।

हर सितम उनपे ही ढाया कीजिये ।।

उनके हमले से फ़जीहत हो गयी।

दिल यहाँ अपना जलाया कीजिये ।।

तफ़सरा कीजै नये हालात पर ।

आप अपना घर बचाया कीजिये…

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Added by Naveen Mani Tripathi on February 24, 2019 at 8:39pm — 4 Comments

ये दुआ है कि ख़ुशी आपके घर में आये (३२)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

.

ये दुआ है कि ख़ुशी आपके घर में आये

हादिसा पेश न जीवन के सफ़र में आये

**

अश्क आँखों में अगर हों तो ख़ुशी के हों बस  

और सैलाब न अब दीदा-ए-तर में आये 

**

प्यार की राह को आसाँ न समझना कोई

हौसला हो वही इस राह-गुज़र में आये

**

कोशिशें लाख  करे तो भी नहीं है मुमकिन 

ताब-ए-ख़ुर्शीद तो हरगिज़ न क़मर में आये 

**

ग़ैर के ऐब को आसाँ है नज़र में रखना

ऐब ख़ुद का न किसी की भी नज़र में आये

**

अपने…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on February 24, 2019 at 7:00pm — 4 Comments

मुहब्बत अपनी लोगों ने सियासत से है कम कर ली - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२



जमा पूँजी थी  बरसों  की  जरुरत  ने हजम कर ली

मुहब्बत अपनी लोगों ने सियासत से है कम कर ली।१।



जमाना  अब  तो  हँसने  का  हँसेंगे  सब  तबाही पर

किसी दूजे के गम से कब किसी ने आँख नम कर ली।२।



सदा से नाज था जिसके वचन की सादगी पर ढब

उसी ने आज हमसे भी  बड़ी  झूठी कसम कर ली।३।



मुहब्बत रास आती  क्या  जफाएँ हर तरफ उस में

हमीं ने यूँ हर इक रंजिश खुशी से हमकदम कर ली।४।



बिगड़ जाती थी जो छोटी बड़ी हर बात पर हमसे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2019 at 6:36am — 3 Comments

- समान सवैया या सवाई छंद -

1-

हम विश्व शांन्ति के पोषक हैं, यह बात जगत में है जाहिर।

पर पाकिस्तान सदा से ही, आतंकवाद में है माहिर।।

पुलवामा में हमला करके, मारे हैं वीर बिना कारण।

इसलिए शांति अब और नहीं, हम भी कर पाऐंगे धारण।।

2-

हज करने की बातें करता, ये सौ-सौ चूहे भी खाकर।

अनजान बना बैठा रहता, जम्मू घाटी को दहलाकर।।

ये पाकिस्तान हमेशा से, भारत को है अति दुखदायक।

है अमन चैन के पथ में भी,अब बन बैठा ये खलनायक।।

3-

तीसरा नेत्र जब भारत ने, फड़काया भर ही है…

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Added by Hariom Shrivastava on February 22, 2019 at 5:17pm — 6 Comments

अनूठा इजहार [लघु कथा ]

अनूठा इजहार

नितिशा के बाबूजी के अंतिम श्रद्धांजलि दे रहे थे,तभी अंदर से शांत मुद्रा में नितिशा की दादी,सरल चिरनिद्रा में लीन बाबूजी के पार्थवशरीर के समक्ष बैठी,हाथ मे पकड़े नए सफेद रूमाल से मुंह पौछा,फिर कान के पास जाकर जो कहा,सभी उन्हें विस्मयद्रष्टि से देखने लगे,वो सिर पर हाथ फेरते हुये कह रही थी- ‘तुम आराम से रहना,मेरी चिंता मत करना. रामायण की चौपाई सुनाई,फिर बाबूजी का मनपसंद गीत गया,और सूखीआँखें चली गई.पूरे तेरह दिन सरला अपने ही कमरे मे ही रही. गरूढ़पुराण में शामिल होने को कहते तो…

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Added by babitagupta on February 22, 2019 at 3:33pm — 2 Comments

कविता -तुम्हें मेरी फ़िक्र कहाँ है



तुम्हें मेरी फिक्र कहाँ है

साँझ के आगोश में

दिन भर की थकान

राहत ले रही है

विश्वास की लौ धीरे-धीरे टिमटिमा रही है

ऐसे में अब तुम्हारी प्रतीक्षा शेष है

तुम्हें मेरा वादा कहाँ याद है

कह दो आज फिर मैं झूठ नहीं बोलूँगा

तुम्हारे झूठ पर मेरा विश्वास टिका है

शहर के कॉफी हाऊस से

बूढ़ों की टोलियाँ भी घर जा रही है

मस्जिद की मीनार और

मंदिर के कलश पर

दिन भर मंडराने वाले

कबूतरों का झुंड भी चला गया है

ऐसे में मेरे भरोसे की पतवार कहाँ…

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Added by Mohammed Arif on February 21, 2019 at 3:18pm — 1 Comment

कभी सदा-ए-दिल-ए-यार जो सुनी होती (३१)



कभी सदा-ए-दिल-ए-यार जो सुनी होती 

तो दास्ताँ न मेरी दर्द से भरी होती 

**

रक़ीब पर न कभी रहम गर किया होता 

मेरी ये ज़िंदगी सहरा न फिर बनी होती 

**

तुम्हारी ज़िंदगी में ग़म कभी न आते गर 

रिदा-ए-आरज़ू थोड़ी सिकुड़ गई होती 

**

गुहर हयात में तुमको नसीब हो जाते 

ज़रा सी वक़्त से तैराकी सीख ली होती …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on February 21, 2019 at 11:00am — 7 Comments

जल रही दिलों में आग हम बुझाएँ किसलिए (३० )



जल रही दिलों में आग हम बुझाएँ किसलिए 

और सब्र बार बार आजमाएँ किसलिए 

**

तोड़ता सुकून-ओ-चैन की हदें अगर कोई 

लोग हिन्द देश के सितम उठाएँ किसलिए 

**

क़त्ल जो करे यक़ीन का हबीब भी अगर 

फिर यक़ीँ उसी पे आज हम दिखाएँ किसलिए 

**

बार बार हो चुके ग़लत वतन के फ़ैसले 

फिर अदू की चाल में हम आज आएँ…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on February 21, 2019 at 1:30am — 8 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122

जख्म हम अपने छिपाने में लगे है,

खुद को’ हम पत्थर बनाने में लगे है।

पूछ मत हमको हुआ क्या आजकल ये,

दर्द दिल का हम भुलाने में लगे है।

कौन देता है सहारा अब यहां पर,

बोझ अपना खुद उठाने में लगे है।

दिल जगत का बेरहम चट्टान जैसा,

फिर भी’ पत्थर को मनाने में लगे है।

देश हित की बात ‘‘मेठानी’’ करे क्या,

द्रोहियों को हम बचाने में लगे है।

( मौलिक एवं अप्रकाशित)

- दयाराम…

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Added by Dayaram Methani on February 19, 2019 at 10:00pm — 8 Comments

सन्त भूषण रविदास

गुंजित सब धरती गगन, जन-जन में उल्लास l

दिग्दिगन्त झंकृत हुआ, जन्म लिए रविदास ll1

दर्शनविद कवि सन्त को, नमन करूँ कर जोर l

कीर्ति ध्वजा लहरा रही, कण-कण में चहुँ ओर ll2

कर्मनिष्ठ प्रतिभा कुशल, सन्त श्रेष्ठ रविदास l

ज्ञानदीप ज्योतित किये, पूर्ण किये विश्वास ll3

सकल सृष्टि वाहक बने, सन्त शान्ति के दूत l

मुखमण्डल रवि तेज से, मिटा छूत का भूत ll4

दुरित दैन्य अस्पृश्यता, जड़ से किए विनाश l

सत्कर्मों के बल सदा , काटे…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on February 19, 2019 at 5:07pm — 4 Comments

'बेसुरे सुर-ताल' (लघुकथा) :

"न बाबा, तुम भले इसे बस्ता या स्कूल-बैग कह लो; लेकिन मेरी नज़र में यह बालक के कंधे पर समय का बोझ है! समय-चक्र की मार!" सड़क पर स्कूल से घर लौटते एक बालक के बोझिल झुके कंधे देखकर मिर्ज़ा जी ने अपने दोस्त राजवीर मासाब से कहा।

"भाईजान, समय के साथ हमें और विद्यार्थियों को चलना ही पड़ेगा। हमारे, उनके और मुल्क के हालात अपनी जगह और ज़माने के साथ हमारी लय-ताल अपनी जगह!"

"हा हा हा.. लय-ताल! ... या पाठ्यक्रमों का सुनियोजित बवाल! नई आयातित शिक्षण-पद्धतियों के सागर या सुर-ताल। न तैराक…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 18, 2019 at 8:00pm — 4 Comments

जन्नत- लघुकथा

कल से ही खबर आ रही थी कि क्षेत्र में कुछ संदिग्ध लोग देखे गए हैं और रात में चौकसी बढ़ा दी गयी थी. हमेशा की तरह रमेश और रोशन एक साथ ही नाईट ड्यूटी पर थे. जैसे जैसे रात आगे बढ़ रही थी, चारो तरफ अँधेरा कुछ यूँ गहरा रहा था मानो इस रात की सुबह होगी ही नहीं. अचानक एक खटका हुआ और रोशन ने अपनी राइफल आवाज़ की तरफ तान दी. कुछ मिनट तक सन्नाटा रहा और उनको लग गया कि कोई खतरा नहीं है.

"तू तो निरा डरपोक ही है रोशन, जरा सी आहट हुई नहीं कि घबरा जाता है", रमेश ने उसे छेड़ते हुए कहा.

"अच्छा तो पंडित, तू…

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Added by विनय कुमार on February 18, 2019 at 7:20pm — 2 Comments

ग़ज़ल (पुलवामा के शहीदों को श्रद्धांजलि)

ग़ज़ल (पुलवामा के शहीदों को श्रद्धांजलि)

देके सर हम हो गए दुनिया से रुखसत दोस्तो l

तुम को करनी है वतन की अब हिफाज़त दोस्तो l

बाँध कर बैठो कफ़न अपने सरों पर हर घड़ी

सामने ना जाने कब आ जाए आफ़त दोस्तो l

उन दरिंदों का मिटा दें दुनिया से नामो निशां

मुल्क में फैला रहे हैं जो भी दहशत दोस्तो l

उसको मत देना मुआफ़ी मौत देना है उसे

जिसने पुलवामा में की है नीच हरकत दोस्तो l

हम को उनकी ईंट का पत्थर से देना…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 18, 2019 at 7:01pm — 12 Comments

अपबे वतन में बेघर

अपने वतन में बेघर का दर्द क्या जानो

जिन्होने लूटा है खसूटा उनको पहचानो

मेहनत मज़दूरी की तो जी गये बच्चे

संस्कार मिले थे बुजुर्गो से हमें भी अच्छे

लुट गये लेकिन हथियार उठाया ना कभी

वतन पे जान देने का है इरादा अब भी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on February 18, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

सुनो..!

जाने हम किसके  मोहताज़ हैं,

जज्बात वो कल ना रहेंगे, जो आज हैं।

इतने मशरूफ़ भी ना रहो मेरे हमदम,

इस उम्र के बड़े लंबे परवाज़ है।

नजर भर कर देखो, हसरतों की बात है,

एक पल का नहीं, उम्र भर का साथ है।

बेरुखी जहर बन जाएगी आहिस्ता-आहिस्ता,

सुनो सरगोशी से ये बात, राज की बात है।

सम्हलने के लिए इबरत ही काफी है,

अंजाम पर तो माफी तलाफ़ी है।

मर जाती है जब सारी ख्वाहिशें तो,

फिर अहसास की सांस भी ना काफी…

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Added by Rahila on February 18, 2019 at 5:00pm — 4 Comments

वतन का राग

व्यर्थ नहीं जाने देंगे हम ,वीरों की कुर्बानी को

चढ़ सीने पर चूर करेंगे,दुश्मन की मनमानी को

माफ नहीं हरगिज करना है, भीतर के गद्दारों को

बनें विभीषण वैरी हित में,बुलन्द करते नारों को ll

अन्न देश का खाने वाले, दुर्जन के गुण गाते हैं

जिस माटी में पले बढ़े हैं, उस पर बज्र गिराते हैं

छिपे हुए कुलघाती जब ये, मिट्टी में मिल जाएंगे

बचे सुधर्मी सरफरोश सब,राग वतन के गाएंगे ll

देश कुकर्मी हठधर्मी को, कर देना बोटी बोटी

उस भुजंग को कुचल मसल…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on February 18, 2019 at 12:00pm — 2 Comments

उन्हें मालूम नहीं ...

बड़ी खामोशी से वो कर रहें हैं गुफ्तगू

मगर सब सुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

मोहब्बत के खिलें हैं फूल जिनके दर्मियाँ

वो काँटे चुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

यूँ शब भर जागकर सौदाई बन तन्हाई का

गलीचा बुन रहे हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

किये हैं ज़ब्त, वादों में जो रिश्ते प्यार के

वो रिश्ते घुन रहें हैं ये उन्हें मालूम नहीं !!

वो हमसे पूंछते हैं इश्क करने की वज़ह

मोहब्बत बेवज़ह है ये उन्हें मालूम नहीं…

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Added by रक्षिता सिंह on February 18, 2019 at 9:49am — 2 Comments

भारत माता करे पुकार...

मुझको भारत माँ कहते थे , करते थे मेरी जयकार।

पुलवामा में बेटे मेरे , षडयंत्रों का हुए शिकार।

विकल ह्रदय जननी हूँ मैं , पुत्रों मेरी सुनो पुकार।

विकल्प एक ही है, प्रतिशोध, सत्य यही है करो स्वीकार।

कायरता के कृत्य घिघौने , छद्मयुद्ध की माया को।

चिथड़े-चिथड़े  उड़ते  देखा, मैंने पुत्रों की काया को।

इस छद्मयुद्ध के जख्मों में , टीस  भयानक उठती है।

फ़फ़क-फ़फ़क  कर रोते-रोते  ही, रीस भयानक उठती है।

समय नहीं है अब केवल वक्तव्यों  और…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on February 17, 2019 at 9:00pm — 3 Comments

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