For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

January 2016 Blog Posts (140)


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ दोहे .....( प्राची )

नहीं इतर इससे कभी, ना कम ना अतिरिक्त

जीवन प्रभु की प्रीत से, रहे सदा संसिक्त



मन के कञ्चन भाव सब, आँके ना निर्मोल

सौदागर की लो प्रथम, नीयत ज़रा टटोल



पंछी उड़ उन्मुक्त अब, अपने पंख पसार

खींच लकीरें आज नव, अम्बर के उस पार



दृढ़ इच्छित पग थाप पर, पर्वत देंगे राह

मूर्त ढले हर कामना, प्रबल रहे जो चाह



बन जाओ दिनमान के, स्वतः एक पर्याय

उज्वल स्वर्णिम तेजमय, लिख दो हर अध्याय



सरल सहज व्यक्तित्व हो, बातें सब हों गूढ़

मन अंतर… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on January 31, 2016 at 2:46pm — 9 Comments

ग़ज़ल ( पत्थर निकला)

ग़ज़ल (पत्थर निकला ) -------------------------

- 2122 ---1122 ---1122 --22

मेरि बर्बाद मुहब्बत का  ये   मंज़र    निकला  /

 जिसको उल्फत का ख़ुदा समझा वो पत्थर निकला /

दिल को तस्कीन तो हासिल हुई हमदर्दी   से

पर निगाहों  से नहीं  ग़म का समुन्दर  निकला /

ज़ुल्म ने जब भी ज़माने में उठाया है सर

लेके ख़ुद्दार क़लम अपना सुख़नवर   निकला /

नीम शब मिलने की तदबीर भी बेकार गयी

सुबह होते ही गली कूचे में महशर  निकला…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2016 at 12:56pm — 21 Comments

मोहब्बत का रंग

रंगों की दुनिया में असुरक्षा का माहौल बनता देख लाल ,पीले और नीले रंग के मंत्रियों ने सफ़ेद रंग के सरदार से आपात मीटिंग बुलाने को कहा /हर तरह के रंगों को आमंत्रित किया गया /.... मीटिंग शुरू हुई --मुद्दा था ऐसा क्या करें कि हर वर्ग हमें प्यार से देखे /..... लाल और पीले रंग बोल उठे ,हमारे रंग को हिन्दुओं ने पसंद कर लिया ,मुसलमान हमारी तरफ अजीब नज़रों से देखते हैं /.... नीले और पीले एक साथ  कहने लगे हम दोनों से बने हरे रंग को मुसलमानों ने अपना लिया , हिन्दू हमें नफरत की नज़र से देखते हैं /.....…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2016 at 10:00am — 7 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122 212

दोष उनको दे रहे क्यूँ आप कुछ तो बोलिये

मौन यह कबतक चलेगाआज मुँह तो खोलिये।1



सिर रहे धुन क्या मिला आगे मिलेगा और क्या

याद करनाआप क्यूँ ऐसे किसीके हो लिये।2

पर्व था जनतंत्र का चलते जरा आगे कहीं

मिल गये नाले समझ नद आपने मुँह धो लिये।3

हाथ में डोरी पड़ी थी हाँकते रथ और भी

घिर गयी क्षणभर घटा ढीले पड़े फिर सो लिये।4

आपके वरदान से राजा बने कितने सभी

मिल गया थोड़ा कहीं फिर तो बहुत कुछ खो…

Continue

Added by Manan Kumar singh on January 31, 2016 at 8:30am — 14 Comments

दर्द भरी गहरी पुकार

दर्द भरी गहरी पुकार

हमारा रिश्ता

एक ढहा हुआ मकान ...

तुम बदले

तुम्हारे इमान बदले

मेरे सवाल, और

तुम्हारे उन सवालों के जवाब बदले

सुना है

इमान का अपना

अनोखा चेहरा होता है

सूर्य की किरणों-सा अरुणित

बर्फ़ीली दिशाओं को पिघलाता

आसमान को भी पास ले आता है

उसी अरुणता को

अपने  "आसमान "  को  

तुम्हारे इमान को 

मैं तुम्हारी आँखों में देखती…

Continue

Added by vijay nikore on January 31, 2016 at 7:11am — 12 Comments

पोजीटिव टाइम (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

खिड़की से झांकते हुए बाहर का दृश्य आज पति-पत्नी दोनों को कुछ संतुष्टि दे रहा था। आज दोनों बच्चे स्वेच्छा से कुछ कर पा रहे थे।



" देखो, हम दोनों टीचर होते हुए भी बच्चों को कभी सकारात्मक समय नहीं देते ! उनको प्रकृति के समीप रहने दो, डांटना- फटकारना नहीं!"



"हां, सही कह रहे हैं आप! आज यहाँ पर उन्हें जानने दो कि कैसे पानी सींचते हैं? कैसे पलाश , गेंदे के फूल खिलकर यूँ झर जाते हैं! सूखे पत्तों का क्या हश्र होता है!"



"बांस कैसे पैदा होता है, ताड़ का पेड़ क्या होता है,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 30, 2016 at 2:23pm — 5 Comments

क्यूं ये` तक़दीर मेरी उलझती रही। (ग़ज़ल )

मापनी - 212 212 212 212
========================================
 
क्यूं ये` तक़दीर मेरी उलझती रही।
ज़िन्दगी रात दिन खूब जलती रही।
 
रास्ते गुम हुए…
Continue

Added by Alok Mittal on January 30, 2016 at 12:39pm — 7 Comments

मोहब्बत की जो दिल में बहार रखते हैं

सुकून रखते है हर पल क़रार रखते हैं

मोहब्बत की जो दिल में बहार रखते हैं।।



वो आयेगा तो बहारें भी साथ लायेगा

उसी के आने का हम इन्तज़ार रखते हैं।।



कहाँ-कहाँ से मिले ज़िन्दगी की राहों में

हम अपने ज़ख्मों का खुद ही शुमार रखते हैं।।



कफ़न भी बांध के हमराह अपने सारे जवाँ

जो सरहदों पे हैं आँखें भी चार रखते हैं।।



यही है फितरते इन्सां तो इसको क्या कहिये

सब अपने-अपने लहू से ही प्यार रखते हैं।।



तालुक़ात कहाँ तक निभायें हम उनसे

जो… Continue

Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on January 30, 2016 at 11:38am — 7 Comments

सहारा

रात की ओलावृष्टि के बाद गांव में मातम का माहौल था । हरिया खेत की मेड पर सर पकडे बैठा था कभी गिरी हुई फसल तो कभी पास में खेलते अपने बच्चों को देख रहा था । मन ही मन सोच रहा था... हे भगवान कैसे पालूंगा बिना मां के इन दोनों बच्चों को अगर किसानी छोड कर मजदूरी भी शुरू कर दूं तो मजदूरी मिलेगी कहां सारा गांव तो छोटे किसानों का ही है जिनके पास बमुश्किल चार पांच बिघे खेत हैं । शहर भी तो नहीं जा सकता इन बच्चों के साथ न रहने का ठौर न काम का ठिकाना । 

रह रहकर उ…

Continue

Added by kumar gourav on January 29, 2016 at 11:28pm — 3 Comments

ज़िंदगी और मौत के बीच फासला कितना,

ज़िंदगी और मौत के बीच फासला कितना,

पता नहीं किसी को कब आ जाए फरिस्ता ।

मौत के सौदागर उगाते हैं घृणा की फसल

समाज में खड़ी करते हैं नफरत की दीवार ।

बुझाते सभी के सामने जलता हुआ चिराग

सोचो सच और झूठ में अंतर है कितना ॥

एक बंदा भरी में कुछ आंशू बहा के कहता

विश्वास करो मुझपर हूँ भरी सभा में कहता ।

आज हमारे समाज से मिट रही साहिस्णुंता

आज घोल रहे विष देश में कुछ हमारे नेता ॥

मैं तुम्हारे दुख की घड़ी में बेहद गम जुदा हूँ

कोई…

Continue

Added by Ram Ashery on January 29, 2016 at 10:00pm — 3 Comments

उम्र का सफर ....

उम्र का सफर ....

हम उम्र के साथी

शायद मेरी तरह

बूढ़े होने लगे हैं

केशों में चमकती चांदी

चेहरे की झुर्रियां

जीवन का सफर का

बेबाक आईना हैं

हाँ, सच

ये तो मेरी ही तरह बूढ़े हो चुके हैं

इनके हाथ काम्पने लगे हैं

मुंह की लार बस में नहीं है

ज़िंदगी को

बिना किसी सहारे के जीने वाले

बूढ़ी थकी लाठी पर

अपनी देह का बोझ लादे

डगमगाते पाँव लिए

जीवन का शेष सफर

तय करते नज़र आते हैं

क्या ! जीवन के सूरज का…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 29, 2016 at 8:53pm — 8 Comments

रंग बदलती दुनिया (लघुकथा) ['रंग' संदर्भित- 2] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

जितने मुँह उतनी बातें । ख़ुशख़बरी सुनकर जिन लोगों ने असीम बधाइयां और शुभकामनाएँ व्यक्त कीं थीं, अब उनकी अभिव्यक्तियां रंग बदलने लगी थीं।



कुछ ईर्ष्या के, तो कुछ शंकाओं के, और कुछ हीन भावनाओं के , तो कुछ भविष्य की योजनाओं या 'जुगाड़' जैसे लोभ के रंगों से रंगे बोल सुनायी दे रहे थे। जिन्होंने मीठा मुँह कराया था, अब वे कुछ मीठे सपने देखने लगे थे।



मामला यह था कि एक मामूली रिक्शे वाले की चौथी संतान, इकलौता बेटा आइ. ए. एस. अफ़सर बन गया था।

वह माँ-बाप, बहिनों, दोस्तों,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 29, 2016 at 7:25pm — 2 Comments


प्रधान संपादक
नीला, पीला, हरा (लघुकथा)

बृहस्पति और राहू के टकराव से सभी बहुत व्यथित थेI जब भी बृहस्पति के शुभ कार्य प्रारंभ होते तो राहू शरारत करने से कोई अवसर न चूकताI और जब कभी बृहस्पति पाप कर्म पर अंकुश लगाने की कोशिश करते तो राहू कुपित हो जाताI न तो राहू अपनी क्रूरता व अहंकार त्यागने को तैयार था न ही बृहस्पति अपनी नेकी व सौम्यताI बृहस्पति के साधु स्वाभाव तथा राहू की क्रूरता व दंभ के मध्य प्रतिदिन होने वाले टकराव से पृथ्वी त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही थीI धर्म-कर्म के ह्रास से और बढते हुए पाप से त्रस्त देवगण ब्रह्मदेव के समक्ष…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on January 29, 2016 at 3:30pm — 14 Comments

सागर की लहरें

सागर की उठती गिरती लहरें, पथ पर चलना सिखा रही ।  

ढूंढती पल पल किनारा, मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं  ।  

सारी व्यथा अपने मन की आपस में एक दूसरे से कहती ।

सागर की गहरी शांति के विरुद्ध रौद्र रूप भरकर बहती ।

ख़तरों से आगाह कराती मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं   ।

हर काल परिस्थिति में हमको जीवन लक्ष्य बता देती ।

घायल, व्यथित खतरों से खेल, किनारों से दांस्ता कहती ।

संदेशा मानव को देकर कुछ खट्टे मीठे अनुभव कहती ।

आदि से लेकर अंत तक का लेखा…

Continue

Added by Ram Ashery on January 29, 2016 at 3:00pm — 6 Comments

पढ़ सके तू जो अगर - ग़ज़ल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

2122    1122    1122    22



खूब परहेज भी करता है दिखाने के लिए

है जरूरत भी मगर प्यार जमाने के लिए /1



सोच मत सिर्फ  बहाना है बहाने के लिए

वक्त है पास कहाँ तुझको मनाने के लिए /2



शौक पाला जो सितम हमने उठाने के लिए

आ गई  धूप  भी  राहों  में सताने के लिए /3



देख हालात को खुद ही तू  जगा ले अब तो

कौन  आएगा  तुझे  और  जगाने  के लिए /4



पढ़ सके तू जो अगर रोज किताबों सा पढ़

है नहीं  बात कोई  मुझ में छुपाने के लिए /5



कैसी किस्मत थी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2016 at 10:55am — 12 Comments

सज़ा इश्क़ की बेवफ़ाई न दे (ग़ज़ल)

122 122 122 12



सज़ा इश्क़ की बेवफाई न दे

भले मौत दे पर जुदाई न दे



है मंज़ूर रहना हमें क़ैद में

वो आँखों से जबतक रिहाई न दे



ये इंसाफ़ कैसा है तेरा ख़ुदा

तू जाड़ा तो दे पर रजाई न दे



कहेगा जो सच तो कटेगी जुबां

छुपा बेगुनाही, सफाई न दे



मचा शोर कैसा शहर में, सदा

किसी को किसी की सुनाई न दे



बहुत दूर है मेरी मंज़िल अभी

सफ़र देख मेरा, बधाई न दे

===================



जयनित कुमार मेहता

(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 28, 2016 at 8:58pm — 15 Comments

मन्नत - ( लघुकथा ) –

गोपाल की बीवी राधा सुबह से रट लगाये थी ,” शाम को  जल्दी दुकान बंद कर के आ जाना!संकट मोचन चलेंगे!आपको जब पीलिया हुआ था तब मैंने मन्नत बोली थी कि आपके स्वस्थ होने पर सात कन्याओं को जिमाऊंगी, पर अभी हाथ थोडा तंग है,बीमारी में ज़्यादा खर्चा हो गया, फ़िर कभी देखेंगे! अभी तो एक सौ एक रुपये का प्रसाद चढाकर काम चला लेते हैं”!

गोपाल के आते ही दौनों स्कूटर पर मंदिर पहुंच गये!

दर्शन कर बाहर निकले तो राधा की नयी चप्पल गायब और गोपाल की ज़ेब से पर्स  नदारद ! गनीमत थी कि राधा के पर्स में हज़ार दो…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on January 28, 2016 at 6:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल- तमन्नाएँ

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

.

कभी बदनाम गलियों में भटकती हैं तमन्नाएँ,

कभी खुद की निगाहों में खटकती हैं तमन्नाएँ.

.

हवस की मकड़ियाँ बुनती है दिल में जाल हसरत के,

जहाँ मौका मिला, आकर, अटकती है तमन्नाएँ.

.

तमन्नाओं का अंधड़ रोक पाना है बहुत मुश्किल,

मगर दिल में बसा हो रब, ठिठकती हैं तमन्नाएँ.

.

कोई इंसान जब अपनी ख़ुदी को जीत लेता है,

तो फिर क़दमों में उस के, सर पटकती हैं तमन्नाएँ.

.

सफ़र जब जिस्म से बाहर का करने रूह चलती है,

चिता की…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on January 28, 2016 at 6:00pm — 16 Comments

मेरे घर के बगल कौन है ?

मेरे घर के बगल कौन है ?

सन्त महाजन या आतंकी

मंथन आओ कर लें प्यारे

भूख है हम को कितनी धन की ,,,

-------------------------------------

प्रेम क्रोध या घृणा ईर्ष्या

जांचो परखो क्या कुछ  देते

मारो-काटो ले लो बदला ??

जीवन क्षण भंगुर कर देते ..

-----------------------------------

मानव योनि है दुष्कर पाए

संस्कार भारत भू आये

अच्छा -अच्छाई आ चुन लें

घर आँगन से नीव ये रख लें…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on January 28, 2016 at 1:30pm — 5 Comments

जब तक मै रहूंगा ‘आदम’ और तुम ‘ईव’

प्रिये,

सच तो ये है

जब तक मै रहूंगा ‘आदम’

और तुम ‘ईव’

तब तक हम खाते रहेंगे ‘सेब’

भोगते रहेंगे 'नर्क'

इससे तो बेहतर है

'मै' बन जाउं 'जंगल'

घना ओर बियाबान

तुम बहो उसमे

'नदी' सा हौले - हौले

या फिर मै

टंग जाउं आसमान मे

चॉद सा

और तुम बनो

मीठे पानी की झील

सांझ होते ही मै

उतर आउं जिसमे

चुपके से,

हिलूं। तैरूँ। इतराऊँ

सुबह होते ही फिर

टंग जाऊँ आसमान मे

या तो,

ऐसा करते हैं

मै बन जाता हूं…

Continue

Added by MUKESH SRIVASTAVA on January 28, 2016 at 11:48am — 7 Comments

Monthly Archives

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"सुधीजनों को आयोजन में भागीदारी निभाने के लिए हार्दिक धन्यवाद. "
1 hour ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय़ सतविन्दर जी, आपकी भागीदारी से कुछ और अपेक्षा थी. बहरहाल आपकी भागीदारी के लिए हृदयतल से…"
1 hour ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह १  भाई शिज्जू शकूर जी का प्रयास मोहित और मुग्ध कर रहा है.  शुभातिशुभ"
1 hour ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"बहुत खूब आदरणीय "
1 hour ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अजय जी, आपके प्रयास और आपकी भागीदारी के लिए साधुवाद. बेहतर प्रयास के लिए…"
1 hour ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अजय गुप्ता जी  कुकुभ छंद पर आधारित प्रदत्त चित्र के अनुकूल सुन्दर रचना हार्दिक बधाई…"
1 hour ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"जय जय ..  भागीदारी के लिए हार्दिक धन्यवाद और शुभकामनाएँ आदरणीय दंड पाणी जी."
1 hour ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय दंडपानी नाहक जी कुंडलिया छंद पर सुन्दर एवं सार्थक प्रयास हेतु हार्दिक बधाई "
1 hour ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
1 hour ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सादर           प्र्दत्त्त चित्रानुकुल सुन्दर…"
1 hour ago
Satyanarayan Singh replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय सतीश मापतपुरीजी प्रदत्त चित्रानुकुल सुंदर कुंडलिया छंद हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें. "
1 hour ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 87 in the group चित्र से काव्य तक
"जी ! सुन्दर संशोधित.सादर."
1 hour ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service