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रावण दहन--

पूरे इलाके में हंगामा मचा हुआ था, अब तो पुलिस की गाड़ियां भी आ गयी थीं कि किसी अनहोनी को टाला जा सके| खैर, हुई तो बहुत अनहोनी बात ही थी इस दशहरा पर जिसे हजम कर पाना किसी के लिए सहज नहीं था|

हर साल की तरह इस बार भी रज्जन और उसका परिवार दशहरा के काफी दिन पहले से ही रावण का पुतला बनाने में जुट गया था, आखिर ये न सिर्फ उसका बल्कि उसके पुरखों का भी काम था| लेकिन इस बार वो हवा का रुख नहीं भांप पाया जो बदली हुई थी| और इसी वजह से उसने रामलीला समिति या गांव के सरपंच से पूछा भी नहीं| इधर गांव से…

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Added by विनय कुमार on October 8, 2016 at 3:05pm — 2 Comments

तेरे आने से मेरा घर जगमगाया

तेरे आने से मेरा घर जगमगाया

पूर्णिमा का चंद्र जैसे मुस्कुराया



स्वांग रचकर रचयिता सबको नचाये

इस जगत को मंच इक अद्भुत बनाया



लाज कपड़ो में छुपाती थी कभी वो

आज उरियानी का कैसा दौर आया



आपदा जिसने न झेली जिन्दगी में

हौसलों की भी परख वो कर न पाया



पूछता दिल कटघरे में खुद को पाकर

इश्क ही क्यों हर कदम पे लड़खड़ाया



ज़िन्दगी भी पूछती है क्या बताऊँ

क्या मिला है और क्या मैं छोड़ आया



खोजती है हर नजर बस एक…

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Added by नाथ सोनांचली on October 8, 2016 at 2:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (अगर तुम सा मिले दुश्मन तो हसरत और हो जाती)

नहीं जो चाहते रिश्ते अदावत और हो जाती,

अमन की बात ना करते सियासत और हो जाती,



दिखाकर बुज़दिली पर तुम चुभोते पीठ में खंजर,

अगर तुम बाज़ आ जाते मोहब्बत और हो जाती।



घिनौनी हरकतें करना तुम्हारी तो सदा आदत,

बदल जाती अगर आदत तो फितरत और हो जाती।



जो दहशतगर्द हैं पाले यहाँ दहशत वो फैलाते,

इन्हें बस में जो तुम रखते शराफत और हो जाती।



नहीं कश्मीर तेरा था नहीं होगा कभी आगे,

न जाते पास 'हाकिम' के शिकायत और हो जाती।



नहीं औकात तेरी… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 8, 2016 at 1:04pm — 5 Comments

सकल दुख तरल रूप में आज वर्षित---ग़ज़ल, पंकज मिश्र

122 122 122 122

घनीभूत पीड़ा मनस व्योम क्षोभित

सकल दुख तरल रूप में आज वर्षित



अभीप्सा सुमन पर है मूर्च्छन प्रभावी

है निर्जीव सा तन हृदय ताल बाधित



कहाँ चाँदनी से क्षितिज था चमकना

कहाँ दामिनी ने किया पूर्ण भस्मित



पुनः लेखनी आज मानी न आज्ञा

गजल में किया है तुम्हें फिर सुशोभित



सजल चक्षुओं में कहाँ नींद होगी

निशा एक फिर से हुई तुझको अर्पित



न उद्देश्य किंचित भी चर्चा का लेकिन

तेरे नाम का मन्त्र बांचे… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 8, 2016 at 10:30am — 14 Comments

गजल

( बेवजह भौंकनेवालों को संबोधित)

रमल मुरब्बा सालिम

2122 2122

***

देख ढ़ेर बवाल मत कर

दोहरी अब चाल मत कर।1



रंग देख हँसे जमाना,

गिरगिटों-सा हाल मत कर।2



हैं सियारों-सी अदाएँ,

शेर वाली खाल मत कर।3



जो लड़ाई लड़ रहा उस

शस्त्र को वाचाल मत कर।4



कर रहा कुछ खुद नहीं तू,

भौंक कर अब ढ़ाल मत कर।5



बुझ गयीं कितनी मशालें,

और अब पामाल मत कर।6



श्वान भी सीमा बचाते,

भौंक,पर बेताल मत… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 8, 2016 at 2:30am — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४७

जो है दिल को शिकायत न हो ज़ेरेफुगाँ क्यों

न हो कहने का हक़ कुछ तो देते हो जुबां क्यों  

 

मेरी खानाख़राबी सुबूतेआशिक़ी है

जो हो मजनूं तुम्हारा हो उसका आशियाँ क्यों

 

यूँ कारेआशिक़ी से है आती बू-ए-साज़िश

अदू जो हैं हमारे वो तेरे पासबाँ क्यों

 

मकीनेदिलबिरिश्ता-ओ-दश्तेगमनशीं था

वफ़ातेकैस पे फिर न हो ख़ुश गुलसितां क्यों

 

जो मुझसे निस्बतों की सभी बातें हैं झूठीं

सुनाते हो मुझे तुम तुम्हारी दास्ताँ…

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Added by राज़ नवादवी on October 7, 2016 at 10:09pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आइना ये पत्थरों की मार कैसे सह गया (ग़ज़ल 'राज ')

2122  2122  2122  212

इक मुहब्बत का महल कब चुपके चुपके ढह गया

बिन किये आवाज सब आँखों का काजल कह गया

 

अनमनी सी वो अकेली रह गई किश्ती खड़ी

पाँव के नीचे से ही सारा समन्दर बह  गया

 

वो खुदा भी उस फ़लक से देख कर हैरान है

आइना ये पत्थरों की मार कैसे सह  गया

 

ठोकरों ने ही तराशे वो पशेमाँ पंख फिर

ताकते परवाज़ से पीछे गुज़शता रह गया

 

फूल से भी जो हथेली सुर्ख  होती थीं  कभी

उस हथेली में पिघल कर आज सूरज बह…

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Added by rajesh kumari on October 7, 2016 at 7:41pm — 18 Comments

लघुकविता - "मेहरबानी" - अर्पणा शर्मा

" चूँकि,
मुश्किल थी,
देखभाल,
अंततः वह,
छोड़ ही आया,
वृद्धाश्रम में
माँ को,
वर्षों पहले,
इसी कारण से,
वह ले आई थी,
अनाथाश्रम से,
एक नन्हा बालक,
अपने घर को....!!"

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Arpana Sharma on October 7, 2016 at 3:20pm — 6 Comments

डिज़ाइनर मुखौटे [ लघु कथा .प्रदीप कुमार पांडे ]

“रेहाना’i    बहुत खुश दिख रहा था आनंद   “आज रात के ग़ज़ल की कंसर्ट के दो टिकटों का इंतजाम कर लिया है मैंनेI  बहुत पीछे की सीटें हैं, पर मिल गए ये ही क्या कम है I”

“मुबारक हो”   रेहाना धीरे से बोली I

“अरे इतनी दूर ऑस्ट्रेलिया में अपने इतने जाने माने लोगों के ग़ज़ल ,गाने सुनने को मिलेंगे I  तुम खुश नहीं हो i”   आनंद चिढ कर बोला I

“हाँ नहीं हूँ खुश और मै जाऊंगी भी नहीं “  रेहाना उठने लगी I

“पाकिस्तानी हैं इसलिए ?”  आनंद ने उसका हाथ पकड़ लिया “ तुम इतनी पढ़ी लिखी हो, यहाँ …

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Added by Pradeep kumar pandey on October 7, 2016 at 3:00pm — 2 Comments

ये क्या हुआ?



वह अपने महल के अंदर बैठा हुआ था और अपने साथियों के साथ जश्न मनाने की तैयारी हो रही थी। उसके सैनिकों द्वारा छद्म वेश में जाकर दुश्मन देश के सैनिक अड्डे पर भीषण आक्रमण के परिणाम स्वरूप वहां पर भयंकर तबाही मची हुई थी और उस देश का अगुवा बौखला उठा थां । आज तक उससे कहा जा रहा था िकवह हमारा दोस्त है लेकिन इस तरह से पीठ के उपर छुरा मार कर घायल कर दिया गया था और उसी से वह छटपटा रहा था । उस देश के लगभग 50 सैनिक मौके पर ही मर गये थे। साजो सामान के नुकसान भी करोड़ों के उपर था। उसने अपने अनुचरों को…

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Added by indravidyavachaspatitiwari on October 7, 2016 at 1:29pm — No Comments

प्रेमाभिव्यक्ति ......

प्रेमाभिव्यक्ति ......

प्रेम आस है

प्रेम श्वास है

प्रेम जीवन की अमिट प्यास है

प्रेम आदि है

प्रेम अन्त है

प्रेम जीवन का अमिट बसंत है

प्रेम चुभन है

प्रेम लग्न है

प्रेम जीवन की अमिट अगन है

प्रेम चंदन है

प्रेम बंधन है

प्रेम जीवन की अमिट गुंजन है

प्रेम रीत है

प्रेम जीत है

प्रेम जीवन की अमिट प्रीत है

प्रेम नीर है

प्रेम पीर है

प्रेम जीवन की प्रेम हीर…

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Added by Sushil Sarna on October 7, 2016 at 1:15pm — 2 Comments

केवल एक प्रयास

अपनी मिट्टी से पैदा हुई

कपास की बाती

अपनी मिट्टी

अपने खेतों की

सरसों का तेल

अपने घर में

बिलोया गया

शुद्ध देशी घी

अपने कुम्हार के चाक पर

बना अपनी मिट्टी का

दीपक

जलना चाहिए

अपनी मिट्टी पर

अपने मान पर

अपनी मर्यादा पर

अपने शिखर पर

खासकर

अपने मन पर।

कह दो पडोसियों से

वापस ले जाएं

अपनी चमचमाती चीजें

चिरागों के मौसम में

चमकेंगे हमारे चिराग ही हमेशा

शहीदों की चिताओं पर

आँखें… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 7, 2016 at 10:56am — 2 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212



बिकते रहे ईमान हुकूमत की फेर में ।

मरते गए जवान हिफ़ाज़त की फेर में ।।



नापाक पाक है ये खबर आम हो गई ।

बरबादियाँ तमाम नसीहत की फेर में ।।



कुछ दर्द को बयां वो सरेआम कर गया ।

मिटता रहा ये मुल्क शराफ़त की फेर में ।।



आ जाइए हुजूर ये हिन्दोस्तान है ।

गद्दार बिक रहे हैं रियासत के फेर में ।।



ऐटम की धमकियों का असर कुछ नही हुआ ।

हम भी पड़े हुए हैं हिमाकत की फेर में।।



सुन ले मेरे रकीब जमाना बदल गया… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 7, 2016 at 9:25am — 2 Comments

ज़िन्दगी (कविता)

छोटी छोटी सी खुशियां

भर देती हैं  झोली

हंसी ख़ुशी दिन बीते जब

ज़िन्दगी लगती  हमजोली



जीवन के है रंग निराले

जो  खेले आँख मिचोली

एक आये जब दूजा जाए  

ज़िन्दगी लगती मखमली |



लेकर बहार आती है ज़िन्दगी

प्यार से जब सींचि जाती है

कड़वाहट का ज़हर भी पीती

अपना असर दिखाती है |



अपनों के बीच अपनों के संग

प्यार को पाती है ज़िन्दगी

प्यार गर न मिले तो

सूखे पत्तों की तरह मुरझा जाती है ज़िन्दगी |

मौलिक एवं…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 6, 2016 at 10:30pm — 10 Comments

जब ठहरना न मुनासिब हो तो चलते रहिये(तरही गज़ल)/सतविन्द्र कुमार

बह्र:2122,1122 1122 22



जब ठहरना न मुनासिब हो तो चलते रहिए

साथ चलके भी जमाने को' बदलते रहिए।  



रुत बदलती सी ये तबियत पे ही होती भारी

ठीक होगा यूँ अगर आप भी ढलते रहिये।



आग खामोश करा देती सभी  का जीवन

एक दीपक की' तरह खुद ही तो जलते रहिए।



वक्त आवाज खिलाफत में उठाने का है

जुल्म से दब क्युँ यूँ बस खुद ही में गलते रहिए।



ग़म मिला है तो ख़ुशी भी आ मिलेगी यारो

*हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिये*।



क्या मिला है जो… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 6, 2016 at 8:35pm — 6 Comments

ममता--

फोन की घंटी लगातार बज रही थी, रश्मि दूसरे कमरे में बैठी काँप गयी| किसी तरह फोन बंद हुआ तब तक विवेक भी अंदर आ गया और दूसरे कमरे में आकर बोला "यहीं बैठी हो, फोन क्यों नहीं उठाया?

रश्मि कुछ बोल नहीं पायी, उसके चेहरे पर जैसे सन्नाटा छाया हुआ था| तभी विवेक के मोबाइल पर बेटी का फोन आया "पापा, मम्मी घर में नहीं है क्या, फोन नहीं उठाया उन्होंने"|

"नहीं बेटा, वो घर में ही है, लो बात कर लो", कहते हुए उसने फोन रश्मि को पकड़ा दिया|

"सब ठीक है बेटी, बस ऐसे ही झपकी आ गयी थी इसलिए फोन नहीं उठा…

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Added by विनय कुमार on October 6, 2016 at 6:24pm — No Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मखमली यादों में लिपटी ज़िन्दगानी और है- शिज्जु शकूर

2122 2122 2122 212

मखमली यादों में लिपटी ज़िन्दगानी और है

वो लड़कपन खूब था अब ये  जवानी और है

 

आसमाँ सर पर उठाकर तूने साबित कर दिया

तेरा किस्सा और कुछ था हक़बयानी और है

 

मैं छुपाता हूँ जहाँ से दर्द-ए-दिल ये बोलकर

हिज़्र की तासीर कुछ मेरी कहानी और है

 

वस्ल की बातें वो लमहे भूल भी जाऊँ मगर

मेरे दिल में इक मुहब्बत की निशानी और है

 

आबले हाथों के मुझसे कह रहे हैं फूटकर

कामयाबी और शय है जाँफ़िशानी…

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Added by शिज्जु "शकूर" on October 6, 2016 at 5:54pm — 16 Comments

वादा .....

वादा .....

मेरे ग़मगुसार ने

इक वादा किया था

कि वो हर लम्हा

मेरा ज़िस्म होगा

मेरा हर ग़म

उस पे आशकार होगा

फ़ना की तारीक वादियों में भी

वो मेरे साथ होगा

क्या सच में उसने

इस जहां से

उस जहां तक

साथ निभाने का

वादा किया था

लम्हा दर लम्हा

दूरी का अज़ाब बढ़ता गया

अकेलेपन की शाखाओं पे

यादों का शबाब

बढ़ता गया



साये गुफ़्तगू करने लगे

मेरी अफ़सुर्दा निगाहें

जाने ख़ला में…

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Added by Sushil Sarna on October 6, 2016 at 2:02pm — 10 Comments

ख़ाना ख़राब (लघुकथा) जानकी बिष्ट वाही

दो दिन से भूखा-प्यासा कबीर धूल भरी पगडंडियों में भटक रहा है।अज़ब है उसकी जिंदगी भी,दुनिया वालों के लिए अनाथ और पागल, न उसकी कोई जाति न कोई धर्म,जाने किसने,कब ,कहाँ,उसका नाम कबीर रख दिया। लोगों के रहमों करम से मिल गया तो खा लिया, हिन्दू के घर से रोटी ली तो मुसलमान के घर से सब्जी, स्वाद में कोई फ़र्क नहीं। गाँव दर गाँव नापता।



इधर सरहद पर तनातनी के बाद मरघट सी ख़ामोशी हवाओं में सरसरा रही है।मीलों आदमजात की आमद दरफ्त नहीं हैं।बेज़ार भटकता कबीर उस गाँव में पहुँचा तो लगा मकानों के…

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Added by Janki wahie on October 6, 2016 at 11:30am — 9 Comments

मर्ज

मरीज के
मर्ज का इल्जाम
मरीज पर आ रहा है
आश्चर्य नहीं
इस दौर में
मरीज को
मरीज
खींचे जा रहा है ।
क्या
किसी की
नजर में
बीमार
बीमार है?
मगर
स्वस्थ दिखने वाले
कितने
लाचार हैं ।
जन-जन
कण-कण
समस्त पर्यावरण
कौन
किसको
दवा दे?
क्योंकि
चिकित्सक और दवाखाना
दोनों
बीमार हैं।

सुरेश कुमार ' कल्याण '
मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 6, 2016 at 9:45am — 8 Comments

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