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जी तोड़ काम

वातानुकूलित कक्ष में बैठकर

तुम करते हो

देश के लिए

देश की जनता के लिये  

अच्छे दिन लाने के लिये

जी –तोड़ काम

पर काम किसे कहते है

तुम नहीं जानते

और यदि जानते हो

तो आ जाओ साथ

हो जांए आपस में दो-दो हाथ

मैं एक ओर 

चलाता हूँ कुदाल

दूसरा छोर

मेरे भाई तू संभाल

देखते है किसका

है पसीना लहू बनता

देश मेरे दोस्त

लफ्फाजी से नहीं चलता

कोई खेत सोना

यूँ ही नहीं…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 1, 2015 at 5:30pm — 1 Comment

मैं तड़प जाता हूँ मुझको न सताओ ऐसे -आशुतोष

२१२२  ११२२  ११२२  २२

मैं तो दीवाना हूँ मुझको न जलाओ ऐसे

मेरे ख़त आज हवा में न उड़ाओ ऐसे

चांदनी रात में ऐ चाँद यूं छत पे आकर

मेरे सोये हुए अरमाँ न जगाओ ऐसे

रेत पे जैसे निशाँ क़दमों के बैसे ही सही

दिल से धुंधली मेरी यादें न मिटाओ ऐसे

अब्र-ए- जुल्फ में खुद को यूं छुपा लेते हो

मैं तड़प जाता हूँ मुझको न सताओ ऐसे

तुम समंदर ए गुहर हो ये सभी को है पता

पर न आँखों के गुहर अपने लुटाओ ऐसे

बिन…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on August 1, 2015 at 2:30pm — 11 Comments

किस तरह नादानियों में हम मुहब्बत कर गए

2122 2122 2122 212



किस तरह नादानियों में हम मुहब्बत कर गए,

दी सजा दुनियां ने हमको सारे अरमां मर गए |



कब तलक खारिज ये होगी हक परस्तों की ज़मीं,

महके गुलशन तो समझना कातिलों के सर गए |



बंदिशें अब बेटियों पर, आसमां को छू रहीं,

किस तरह बदला ज़माना, बरसों पीछे घर गए |



प्यार की, हर पाँव से, अब बेड़ियाँ कटने लगीं,

नफरतों में, जुल्फों से, अब फूल सारे झर गए |



लुट रही अस्मत चमन की, कागज़ी घोड़े यहाँ,…

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Added by Harash Mahajan on August 1, 2015 at 1:00pm — 13 Comments

देशद्रोह (लघुकथा)

खुद को देशभक्त समझने वाले राम ने रहीम से कहा, “तुमने देशद्रोह किया है।”

रहीम ने पूछा, “देशद्रोह का मतलब?”

राम ने शब्दकोश खोला, देशद्रोह का अर्थ देखा और बोला, “देश या देशवासियों को क्षति पहुँचाने वाला कोई भी कार्य।”

बोलने के साथ ही राम के चेहरे का आक्रोश गायब हो गया और उसके चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे किसी ने उसे बहुत बड़ा धोखा दिया हो। न चाहते हुए भी उसके मुँह से निकल गया, “हे भगवान! इसके अनुसार तो हम सब....।”

रहीम के होंठों पर मुस्कान तैर…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 1, 2015 at 12:30pm — 35 Comments

कुछ प्रश्न कचोटते हैं

पूरा घर सम्हालती बेटियाँ क्यों ससुराल आते ही

ऐसी लापरवाह हो जाती हैं कि चूनर आग पकड़ लेती है

खिलखिलाती बेटियाँ क्यों इतनी अवसन्न हो जाती हैं

कि ज़हर खा लेती हैं या पंखे से झूल जाती हैं

जिनके लिये आँसू बस रूठने का सबब हुआ करते थे

अब वे बेटियाँ हँसते हुए भी क्यों रो देती हैं

धर्म कर्म  रीति नीति की बातें बहुत होती हैं

हर मंदिर में सुबह सवेरे देवी पूजित होती है

फिर क्यों उन्हीं बंद द्वारों के पीछे

लालच की वेदी पर निर्दोष हवि होती…

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Added by Tanuja Upreti on August 1, 2015 at 11:30am — 9 Comments

गजल

गजल
2212 2212
हर बार मजहब मत उठा,
नाचीज अब भौं मत चढा।
जो हो न कुछ, तो मत बजा,
आका, कभी कुछ मत बना।
रोटी पकी, अब चुप रहो,
जनता जली,जन मत जला।
झंडे उठा तू था गया,
दे कर उसे, तूने छला।
मजहब भला करता कि वह
हरदम रहा मरता चला?
ढोते रहे बस भार-से,
ईमान तो उनकी बला।
बोले कि मानेंगे सभी
मजहब,कभी बातें भला?
उसने कहा आगे न जा,
तेरी धता,फिर भी चला।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on August 1, 2015 at 9:38am — 2 Comments

गजल

यक्षोवाच-

गजल

2122 2122 212

मेघ खबरें अब न ले जाते वहाँ?

बरसते भी अब न,वे आते वहाँ?

भाव मेरे नाम तेरे ले गये,

क्या पता क्या गीत वे गाते वहाँ।

झाँक लेना तू कभी जब मेघ हो,

बाँच लेना तू फुहारें हे वहाँ।

कामिनी तू, काम मैं,ले कामना

मचलता हूँ,बात पहुँचाते वहाँ?

पवन को दी है उसाँसें,उड़ चला,

देख लेना,श्वास उर भाते वहाँ?

दिल धड़का जब,खबर होगी वहाँ,

देख अब ये कब पहुँचाते वहाँ।

सूखकर काँटा हुईं अब पुतलियाँ,

बरस जातीं जो सजल… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 1, 2015 at 8:30am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बिगड़ता है किसी का क्या?---(मिथिलेश वामनकर)

1222--1222—1222--1222

 

लगे बोली सियासत में, भला आम-आदमी का क्या?

निजाम-ए-मुल्क जो कह दे मगर इस अबतरी का क्या?                                 

 

अगर दो वक़्त की…

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Added by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 5:00am — 26 Comments

सरसी मिलिन्दपाद छन्द (ओबीओ मंच को समर्पित)

सरसी मिलिन्दपाद छन्द ।
१६,११ पदान्त में (२१ गुरु,लघु)अनिवार्य
आज गुरुपूर्णिमा पर आदरणीय ओबीओ मंच को समर्पित ।
.
हे जीवन पथ के निर्माता,तुम पे है अभिमान।
तुम ही मात-पिता हो मेरे,तुम ही हो भगवान।
तुम ने दीप ज्ञान का देकर,किया बडा आभार ।
जन्मों जनम तक भी न उतरे,तेरा ये उपकार।
ब्रह्मा,विष्णु,महेश,मुरारी,गुरु चरणों में राम।
तन,मन,धन,सब कुछ अर्पण कर,करूं गुरुवर प्रणाम ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on July 31, 2015 at 10:30pm — 8 Comments

बुनियाद (लघुकथा)

''सुनो बंटी के पापा , काहे इतना विलाप करते हो। ''

''बंटी की माँ .... तुम्हें क्या पता ,पिता के जाने से मेरे जीवन का एक अध्याय ही समाप्त हो गया। ''

'' मैं आपके दुःख को समझ सकती हूँ। मुझे भी पिता जी के जाने का बहुत दुःख है लेकिन धीरज तो रखना पड़ेगा। आप यूँ ही विलाप करते रहेंगे तो उनकी आत्मा को चैन कहाँ मिलेगा। '' धर्मपत्नी ने ढाढस देते हुए कहा।

''वो तो ठीक है बंटी की माँ … लेकिन आज पिता के गुजर जाने से न केवल मेरे सिर से वटवृक्ष की छाया चली गयी बल्कि ऐसा लगता है मेरा जीवन की…

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Added by Sushil Sarna on July 31, 2015 at 8:00pm — 6 Comments

''आग पर आप भी इक दिन चलेंगे''

२१२      २१२२         २१२२

आग पर आप भी इक दिन चलेंगे

मेरे अहसास जब तुम में उगेंगे

.

 

फूल सा तन महकने ये लगेगा

याद में रातदिन जब दिल जलेंगें

.

 

चाँद सा  रूप निखरेगा सुनहरा

इश्क की धूप में गर जो तपेंगें

.

आइना बातें भी करने लगेगा

यूँ घड़ी दो घड़ी पे गर सजेंगे

.

 

रातभर रतजगे आँखें करेंगी

सुबहों-शाम आप भी रस्ता…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 31, 2015 at 7:48pm — 6 Comments

लघुकथा - मज़हब –

लघुकथा - मज़हब –

"मेरी राय में ,हमें  उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने  से पहले पुनः विचार करना चाहिए"!

"यार तू बार बार ऐसी शंका ले कर क्यों बैठ जाता है"!

"देख भाई , वो लोग पांच बडे शहरों में पांच ज़गह बम्ब रखवाना चाहते हैं, और वो ज़गह हैं , स्कूल,अस्पताल,रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सिनेमा घर"!

"और बदले में हमें दैंगे दस करोड, हम पांचों को दो दो करोड मिलेंगे,समझा"!

"पर यार इन सब ज़गहों पर अपने मज़हब के लोग भी तो होते हैं"!

"अरे यार ये क्या मज़हब की रट लगा रखी…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 31, 2015 at 1:00pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
साजन का होने को है दीदार लिखो (सावन ऋतु पर एक हिंदी ग़ज़ल 'राज')

 

धरती का नूतन नखशिख सिंगार लिखो

सावन लाया है  मोती के  हार लिखो

 

दादुर मोर मयूरी का आभार लिखो

नदियों नालों में जल का विस्तार लिखो

 

पत्ता पत्ता डाली डाली झूम रही

बूँदे बूँदे चूम रही हैं प्यार लिखो

 

प्यास बुझाती कुदरत कितने प्यासों की

तिनके तिनके पर उसका उपकार लिखो

 

खेतों खेतों  धान उगाते हैं हाली

भेज रहे बादल जल का उपहार लिखो 

 

सागर नदिया लहरों की रफ़्तार…

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Added by rajesh kumari on July 31, 2015 at 10:10am — 9 Comments

सूर्य नमस्कार (लघुकथा)

पांच दिनों की लगातार बारिश के बाद कल शाम से आसमान साफ़ है और आज सुबह से सूरज खिला है 

जॉगर्स पार्क में आज रौनक है I पार्क का योगा हॉल ' हा हा  हो हो ' से गूँज रहा है , एक तरफ खुल कर हंसने की  और दूसरी तरफ सूर्य नमस्कार की कवायद  जारी हैI

बुधवा ने अपनी झुग्गी से बाहर निकल कर आसमान की तरफ देखाऔर चिल्लाया 

"अरे अम्मा i  सूरज देवता आय गए हैं , परेसान मत हो  , आज तो दिहाड़ी मिल ही जाएगी , रासन भी ले आऊँगा और तेरी दवाई भी "

उसका मन किया झुग्गी  के बाहर भरे पानी…

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Added by pratibha pande on July 31, 2015 at 10:00am — 4 Comments

गजल

गजल
2212 2212
हर बार मजहब मत उठा,
नाचीज यह गजब मत ढा।
जो हो न कुछ,खबर न सजा,
आका, कभी रहवर न बना।
रोटी पकी, अब चुप रहो,
जनता जली,जन को न जला।
झंडे उठा तू था गया,
दे कर उसे, तूने छला।
मजहब भला करता कि वह
हरदम रहा मरता चला?
ढोते रहे बस भार-से,
ईमान तो उनकी बला।
सुना कि मानेंगे सभी
मजहब,कभी बातें भला?
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on July 31, 2015 at 12:03am — 2 Comments

अख़बारों में (सुझाव के निमित्त प्रस्तुत)

बिक जाता है चन्द रूपये की खातिर अख़बारों में।

बहुत तलाशा मिला नहीं पर सच आख़िर अख़बारों में।।



बेंच रहे हैं ज़हर मिलाकर भोजन में बाज़ारों में।

विज्ञापन की बाढ़ आ गयी पैसे से अख़बारों में।।



पेड़ बचाओ करो सफाई ऐसे कैसे संभव है।

भौतिकता का नशा बेंचते रोज़ रोज़ अख़बारों में।।



चोरी और अपराध रुकेगा किस तरहा से कहिये ना।

महंगी वाली कार-मोबाइल दिखते जब अख़बारों में।।



लोभ-मोह का त्याग सिखाते गुरुकुल सारे गायब हैं।

मैकाले की नीति बाँचते विद्यालय…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 30, 2015 at 10:00pm — 4 Comments

दलदली जमीं पर ख्वाबों की बुनियाद

दलदली जमीं पर ख्वाबों की बुनियाद

 

यामिनी हर दिन अपनी बेटी को लोरी सुनती थी ,जो आम लोरी से कुछ हट के होता था .

“मैं कम पढ़ी लिखी ,मजबूर और अकेली थी “.

तुम तन्हा नहीं ,मैं हूँ ना

“मेरे पास धन नहीं सिर्फ तन की दौलत थी “

तुम इतनी कंगाल नहीं होगी कि तुम्हे अपनी दुर्लभ तन बेचनी पड़े .

“संसार में कोई काम छोटा नहीं होता ,मैं भी हमदोनों की पेट की खातिर ही इसे काम समझ करती हूँ .”

तुम इतना सक्षम होगी कि छोटे काम तुम्हे करने ही नहीं…

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Added by Rita Gupta on July 30, 2015 at 9:50pm — 8 Comments

कलाम - तुझ को मेरा सलाम (कविता)

किसी के अब्दुल थे

किसी के तुम कलाम

दृढ़ थे संकल्प तेरे

वहुआयामी कलाम I

माँ भारती के लाल

तुझ को मेरा सलाम I

 

होते हुए भी अर्श पर

भूले न जो थे फ़र्श पर

व्याधि वाधा सांझा कर

दी सदा उन्हें संघर्ष पर

लगाओ पंख अग्नि को

न होंगे कभी तुम नाकाम I

जियो मरो देश के लिए

न होंगे कभी तुम गुलाम I

माँ भारती के लाल

तुझ को मेरा सलाम I

 

विपत्तियों से न डरो

बीच धारा से…

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Added by कंवर करतार on July 30, 2015 at 9:30pm — 2 Comments

दरकते रिश्तों की हक़ीक़त(कहानी)

‘पूजा, कितनी बार कहा है तुम्हें कि अपने काम और पढ़ाई-लिखाई से मतलब रखा करो, लड़कों से ज्यादा घुला-मिला, ज्यादा हँसी-मज़ाक मत किया करो, ये सही नहीं है, तुम मेरी बात सुनती क्यों नहीं हो?’

‘मैं कहाँ किसी लड़के से ज्यादा हँसी-मज़ाक करती हूँ या घुलती-मिलती हूँ?’

‘मुझे सब दिखता है, अंधी नहीं हूँ मैं. एक सप्ताह से तुम्हारी पढाई-लिखाई बंद है, खाना-पीना तक ठीक से नहीं कर रही हो. 10 दिनों के लिए प्रवीण आया है हमारे घर और तुम अपना सारा…

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Added by Prashant Priyadarshi on July 30, 2015 at 3:48pm — 4 Comments

बजता हूँ बन के साज तेरे मंदिरों में अब (इस्लाही गजल )

2212 2212 2212 22

बजता हूँ बन के साज तेरे मंदिरों में अब,

देता तुझे आवाज  तेरे मंदिरों में अब |



मांगी थी मैंने उम्र की संजीदगी लेकिन, 

क्यों इस तरह  मुहताज तेरे मंदिरों में अब |



मन जिसका देखूं दुश्मनी की नीव पे काबिज़, 

कैसे करूँ परवाज़ तेरे मंदिरों में अब | 



बस रौशनी की खोज में भटका तमाम उम्र

पगला गया, नेवाज तेरे मंदिरों में अब |



ले चल मुझे शमशान, कोई गम जहाँ ना हो, 

मेरा गया हमराज, तेरे मंदिरों में अब |…

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Added by Harash Mahajan on July 30, 2015 at 11:02am — 37 Comments

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