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लघुकथा : दिवाली

"बाबू जी, दीये ले लो, बहुत सस्ते हैं, इतना बड़ा त्यौहार है ! "

आठ साल की फटी हुई फ्रॉक ने एक रेशम के कुर्ते को पीछे से खींचते हुए पूछा !

"अच्छा, बड़ा त्यौहार है ! पता भी है क्यों मनाते हैं बड़ा त्यौहार ?"

" हाँ, भगवान रामचन्दर ने बहुत सारे दीये ख़रीदे थे !"

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by Neeles Sharma on October 12, 2014 at 2:39pm — 11 Comments

ममता का मोल

नौ महीने तक सींच रक्त से, जिसको कोख में पाला,

आज उसी बेटे ने माँ को, अपने घर से निकाला।

जर्जर होती देह लिए, माँ ने बेटे को निहारा,

मानो उसके जीने का अब, छूट रहा हो सहारा॥

भूल गया गीली रातें, जब रोता था चिल्लाता था, 

हाथ पैर निष्क्रिय थे तेरे, पड़े-पड़े झल्लाता था।

तब त्याग नींद! तेरी जगह लेट, सूखे में तुझे सुलाती थी,

अपने सीने से लिपटा, बाँहों में तुझे झुलाती थी॥

भूल गया वो सूखे दिन, जब गर्मी से घबराता था,

सन्नाटे की चादर ओढ़े,…

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Added by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 12, 2014 at 2:33pm — 8 Comments

लगन - डॉo विजय शंकर

लगभग पचास वर्ष पूर्व जब मैं बहुत छोटा था , प्रायः दीवारों पर लिखा एक विज्ञापन पढ़ा करता था , " न मच्छर रहेगा , न मलेरिया रहेगा , डी डी टी छिड़किये , मच्छरों को दूर भगाइए " .

पता नहीं क्या हुआ , कुछ समय बाद , दीवारों का विज्ञापन बदल गया , कुछ यूँ हो गया , " मच्छर रहेगा पर मलेरिया नहीं रहेगा " .

कुछ समय और बीता , दीवार के विज्ञापनों की श्रृंखला में , मच्छरों , मलेरिया ग्रस्त रोगी के चित्र , कुनैन जैसी दवाओं के साथ मलेरिया के लक्षण और उपचार कराने और मलेरिया से लड़ने के बड़े-बड़े सचित्र… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 12, 2014 at 12:32pm — 5 Comments

क्षणिकाएँ (राम शिरोमणि पाठक)

१-कहा था मैंने

क़र्ज़ न ले उससे

मुफलिशी बेशर्म है

कपडे उतार लेती है

२-वो फिर से चला ढूँढने

दो रोटी

बजबजाते कूड़े के ढेर में

३-नदी के किनारे वाला पेड़

आज प्यास से मर गया

४-मैं मोम था

शायद इसीलिए

धूप में बैठा गयीं मुझे

५-मैं तुमसे हाँथ जरूर मिलाऊंगा

मेरा कद मुकम्मल हो जाने दो

६-मुझे पाने की अजीब हवस है उन्हें

रेत में गिरा आँसू हूँ

फिर भी ढूँढ़ रही हैं



७-तुझे भी…

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Added by ram shiromani pathak on October 12, 2014 at 11:59am — 6 Comments

अहसास

अहसास

मधुप की ट्रेन खुल चुकी था। छुट्टियों के बाद वह वापस नौकरी पर जा रहा था। माधवी से मोबाइल पर बात होते –होते रह गयी, माधवी का गला जैसे रुँध गया हो। कुछ देर की चुप्पी के बाद वह  ‘ठीक है ....’ ही कह पायी थी।मधुप भी अतीत की स्मृतियों में खोने लगे,   ‘कितना खयाल रखती है माधवी उसका तथा परिवार के सभी लोगों का ? वह तो छोटी –छोटी बातों पर भी चिढ़ जाता है। तब माधवी कितने शांत लहजे में कहती है कि भला ऐसा क्या हो जाता है उन्हें कभी –कभी? बच्चों की तकलीफ जरा भी बर्दाश्त नहीं आपको।…

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Added by Manan Kumar singh on October 12, 2014 at 10:30am — 2 Comments

तलाश एक कथा की

तलाश एक कथा की

 

तलाश,

फिर-फिर तलाश,

हर पल,हर पहर,

तलाशा है तुझे,

इस उम्मीद के साथ कि

तू मिल जायेगी मुझे,

कभी-न-कभी,कहीं-न-कहीं।

सब कुछ तो साथ लिए चलता रहा,

भाव,अभिव्यक्ति,

कामना तेरे मिल जाने की,

उमंगें हसरतें खिल जाने की,

शब्दों के जिंदा रहने के,

दूरस्थता-बोध सहने के,

अहसास अभी जिंदा हैं,

रहेंगे भी तबतक शायद

जबतक तू अवतरित न हो

शब्दों का बन…

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Added by Manan Kumar singh on October 12, 2014 at 10:30am — No Comments


सदस्य कार्यकारिणी
चलो कि ज़िन्दगी को दें हम एक नाम नया -ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

सफर ये राहगुज़र और ये मुकाम नया

हयात देती है अक्सर मुझे यूँ काम नया

 

अगर नसीब से बच पाये तो गनीमत है

यहाँ हर एक कदम पर है एक दाम नया         (दाम=जाल)

 

न जी सके अभी तक चलिये कोई बात नहीं                                               

करें अब के कोई जीने का एहतमाम नया

 

ये ज़िन्दगी हो फ़ना रोज़ और रोज़ शुरू

ग़ुरूबे शम्स हो तो चाँद निकले शाम नया

 

बहुत हुये गमे दौराँ की…

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Added by शिज्जु "शकूर" on October 12, 2014 at 10:22am — 12 Comments

घर मेरे सावन का..............................

आज मौसम   ....बड़ा आशिकाना है

शब्द के मोतियों से  उन्हें सजाना है

 

हर्फ़ में ही सही  तस्वीर बनाई बहुत

कहीं और    जिनका अब ठिकाना है

 

जिसकी खातिर यहाँ रातें बिताई बहुत

उनका इधर से यूँ रोज आना जाना है

 

ख्वाब में डाल पर झूले झूलेंगे हम

घर मेरे सावन का यूँ आना जाना है

 

स्वप्न में आकर फ़िर से लुभाओ प्रिय

जहाँ  न मेरा न तेरा कोई  बहाना है

 

कैसे कह दूँ उन्हें प्यार करता नहीं

पहले दीदार…

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Added by anand murthy on October 11, 2014 at 11:58pm — 3 Comments

कर्मठ (लघुकथा)

कर्मठ

जैसे ही पता चलता है कि नेताजी स्कूल प्रांगण में आ चुके हैं |कर्मवीर जी सक्रिय हो जाते हैं और दिनेश से माईक लेकर स्वागत कि घोषणा करते हैं |फिर कार्यक्रम के समापन तक सभी जगह सभी के साथ कर्मठ कर्मवीर जी कैमरे में कैद हो जाते हैं |मंच से कुछ दूर कुर्सी पर बैठा दिनेश अपनी निष्क्रियता पर गहरी सांस लेता है और कर्मठ कैमरे और कर्मठ कर्मवीर जी के चेहरे पर बार-बार आ रहे फ़्लैश को देखता रहता है |

 C-@-सोमेश कुमार

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by somesh kumar on October 11, 2014 at 7:00pm — 7 Comments

अब तू ही बता !!

ऐ चाँद !

पूजा तुझे वर्षों

हल्दी,कुमकुम,

अक्षत,रोली,पुष्प,

धूप दीप, नैवेद्य,

करती रही अर्पण

आस ये कि तू

अभिसिंचित करेगा

अपनी शीतल रश्मियों से

प्रेम की अनुभूतियों से

दूर कर देगा मेरे

प्रणय की प्रत्येक विसंगतियों से

पर यह क्या किया .....

सब कुछ बदल दिया !

तू उगलता रहा

अपनी चाँदनी में अदृश्य अंगारे

सुलगती रही जीवन की लहरें

झुलसा- झुलसा तन-मन  

अंतरमन का हाहाकार लिए

अब तू ही बता

तुझे कैसे पूजूँ अब…

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Added by Meena Pathak on October 11, 2014 at 1:00pm — 10 Comments

सच, ओर कोई नहीं.....

सच, ओर कोई नहीं.....

तन्हा बरसातों में
हिज़्र की रातों में
सुलगते जज़्बातों में
खामोश बातों में
आंसू की सौगातों में
साँसों की कफ़स में
मेरी नस नस में
चांदनी बन कसमसाती
धड़कनों से बतियाती
सच, ओर कोई नहीं
सिर्फ, तुम ही तुम हो

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 11, 2014 at 12:26pm — 9 Comments

हिन्द-सपूत

मातृभक्ति गुंजित स्वर तेरे, सिंहनाद सा करते हैं,,

तेरा साहस शौर्य देख, तेरे भय से शत्रु मरते हैं । 

वेग तेरी आशा का भारी, है आंधी तूफानों पर,,

तेज तेरे चेहरे का भारी,  बिजली की मुस्कानों पर । 

शक्ति का अंबार छिपा है, तेरे दृढ़ संकल्पों में,,

जीवन का हर गीत लिखा है, तूने प्रेम के पन्नों में । 

संबल तेरा पाकर ही, निर्बल ने है लड़ना सीखा,,

देख अडिग विश्वास तेरा, पाषाणों ने अड़ना सीखा । 

धीर हो तुम! गंभीर हो…

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Added by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 11, 2014 at 11:30am — No Comments

मौत

देखा   असूल    मैंने    अजब   सर जमीन पर

जो    ठोकरें     लगाते   रहे    उम्र    भर    मुझे

शैतानियत ने किस कदर चोला बदल लिया

वे   ही   जनाजे    में    मेरी    कन्धा   लगा  रहे  I

 

चप्पल न  थी   नसीब   छाले   पाँव   में पड़े

मै   जिन्दगी  में   यूँ   ही   दर्दमंद  हो चला

अल्लाह   तूने   मौत   दी   तेरे   बड़े  करम

इक बार  आठ  पाँव   की सवारी तो मिली  I

 

मैंने    हयात   में    न    कभी    हार   थी  मानी

हर  वक्त   …

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 10, 2014 at 6:00pm — 14 Comments

तुम मेरी मोहब्बत का इम्तिहान न लो

तुम मेरी मोहब्बत का इम्तिहान न लो,

बस यूँ ख़ामोश रह कर मेरी जान न लो । 

लोग कोसेंगे तुम्हें, तुमसे करेंगे दिल्लगी,

तुम अपने माथे पर, मेरी उजड़ी हुई पहचान न लो । 

बस्तियां खाली पड़ीं, कई लोग देंगे आसरा,

इक रात बसने के लिए, मेरे दिल का सूना मकान न लो । 

बेजुबां बेदम सा होकर, मैं पड़ा तेरी राह में,

मुँह फेर कर गुजरो मगर, मेरी आँखों की जुबान न लो । 

मैं बड़ा नाजुक हूँ, दिल पर बोझ भारी है बहुत ,

न गिरूँ…

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Added by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 10, 2014 at 11:30am — No Comments

तेरे कूंचे से यूं खामोश गुजरकर मैंने

2122   1122   1122  22

तेरे कूंचे से यूं खामोश निकलकर  मैंने 

तेरे दीदार किये रूप बदलकर मैंने 

इक हिमालय  की तरह तुमसे मिला था लेकिन

 पाँव  अब चूम लिए तेरे पिघलकर मैंने 

 भौरों कलियों कि कभी  बात न मुझसे करना 

उम्र अब तक तो है काटी यूं बहलकर मैंने 

आजमाया है हुनर आज किसी बच्चे का

उनसे दिल मांग लिया उनका मचलकर मैंने  

दिल की चाहत तो है इजहारे मुहब्बत करना 

बात पर तुझसे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2014 at 4:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हो कितनी स्वछन्द ऐ कविता! (नवगीत 'राज')

धरती से नीले अम्बर तक

बिना किसी व्यवधान

इठलाती तितली सी चंचल

भरती रहे  उड़ान 

ना कोई सीमा ना कोई बंद

हो कितनी स्वछन्द

ऐ कविता!

कभी करुण रस से आप्लावित   

भीगे आखर से बोझिल   

कभी डूब शिंगार झील में

आती नख- शिख तक झिलमिल  

कभी गरल तू विरह का  पीती  

कभी नेह  मकरंद

हो कितनी स्वछन्द

ऐ कविता!

कभी परों पर लगा बसंती

रंग अबीर गुलाबी लाल

कहीं बिठाती दीये…

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Added by rajesh kumari on October 9, 2014 at 12:50pm — 16 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : गुब्बारा (गणेश जी बागी)

"वाह वाह !! क्या लिखते हैं साहब, एक बार किताब छपने तो दीजिये, देखिये कैसे लोग हाथो हाथ उठा लेते हैं I"

पाण्डुलिपि पलटते हुए प्रकाशक ने "कवि जी" से कहा । खैर, जीवन भर की कमाई और कुछ मित्रों से उधार लेकर किताब छप गयी। 
प्रकाशक ने पाँच सौ प्रतियां "कवि जी" के पास भिजवा दीं । 
झाड़ू लगाते समय पत्नी का भुनभुनाना अब रोज की बात हो गयी ।
.

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 9, 2014 at 11:00am — 25 Comments

विश्‍वदृष्टि दिवस पर रचना

बचें दृष्टि से दृष्टिदोष फैला हुआ है चहुँ दिश।

निकट या दूर दृष्टि सिंहावलोकन हो चहुँ दिश।

दृष्टि लगे या दृष्टि पड़े जब डिढ्या बने विषैली।

तड़ित सदृश झकझोरे मन जब दृष्टि बने पहेली।

गिद्धदृष्टि से आहत जन-जन वक्र दृष्टि से जनपथ।

जन प्रतिनिधि, सत्‍ताधीशों के कर्म अनीति से लथपथ।

रखें दृष्टिगत हो जन-जाग्रति, जन-निनाद, जन-क्रांति।…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on October 9, 2014 at 9:16am — 3 Comments

वैदेही

एक बार फिर आओ न वैदेही
फिर राम की बनो सनेही
इस बार उसके साथ वन में मत जाओ
उसे ले चलो किसी शहर की ओर
जहाँ अनगिनत रावण तुम्हारे
अपहरण का स्वप्न सजाये बैठे हैं.
रावण द्वारा अपहृत हो जाओ,
इन नए राक्षसों के विनाश का
तुम फिर से कारण बनो.
एक नया संसार बसाओ
इनका अब संहार कराओ.

तनिक फिर भृकुटि बनालो
राम को फिर से बुला लो.

मौलिक व अप्रकाशित
विजय प्रकाश शर्मा

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 8, 2014 at 10:30pm — 18 Comments

चित्त की वृत्ति

चित्त की वृत्ति

चंचल है कदाचित,

यह मचलती

सूर्य के प्रकाश जैसी।



तन विषय विष से भरे

घट को पिए जो

खार के सागर

अहं के ज्वार उगले।



रोक दो वृत्ति

तमस को भेद कर -चित्त में

योग - अनुशासन

तुला पर तोलता है।



वृत्ति की आवृत्ति

निश्छल शून्य जब भी

दिव्य अद्भुत योग से

साक्षात मुक्ति।



आत्मा - परमात्मा

चित्त के उपज जो

एक खोली में रहें जीव जैसे-

काष्ठ में अग्नि,

जल में वाष्प…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 8, 2014 at 9:00pm — 14 Comments

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