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ठंडी थाली (लघुकथा) - मिथिलेश वामनकर

पति-पत्नी डाइनिंग टेबल पर लंच के लिए बैठे ही थे कि डोरबेल बजी। 

पति ने दरवाज़ा खोला तो सामने ड्राइवर बल्लू था। उसने गाड़ी की साफ़-सफाई के लिए चाबी मांगी तो उसे देखकर पति भुनभुनाये :

“आ गए लौट के गाँव से ... जाते समय पेमेंट मांगकर कह गए थे कि साहब, गाँव में बीबी बच्चों का इन्तजाम करके, दो दिन में लौट आऊंगा और दस दिन लगा दिए…”

 

क्रोधित मालिक के आगे निष्काम और निर्विकार भाव से, स्तब्ध खड़ा ड्रायवर, बस सुनता रहा-

 

“अब फिर बहाने…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 7, 2015 at 2:54am — 40 Comments

ग़ज़ल----उमेश कटारा

1222   1222   1222   1222



डसेगी मुझको तनहाई ,कटेगा ये सफ़र कैसे

तेरा घर है मेरे दिल में, जलाऊँगा वो घर कैसे



किसी को भूल जाना भी नहीं होता क़भी आसां

तू कहता है भुलादूँ मैं ,बता तू ही मगर कैसै



मेरी इन सुर्ख आँखों में लहू ये क्यों उतर आया

मुहब्बत में लगा दिख़ने बगाव़त का असर कैसे



चला है बेव़फा होकर बसाने घर रक़ीबों का

किसी दिन लौट भी आया ,मिलायेगा नज़र कैसे



बहाता हूँ दो आँसू मैं,मेरी तनहाई के संग संग

मज़ा-ए- इश्क़…

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Added by umesh katara on January 6, 2015 at 11:00pm — 9 Comments

गीत- जिन्दगी ये मेरी गम का जंजाल है

२१२ २१२ २१२ २१२



जिन्दगी ये मेरी गम का जंजाल है!

साल दर साल दिल का यही हाल है!!

मुझको तो इससे कुछ फर्क पडना नहीं!

ये गया साल है या नया साल है!!



स्याही किस्मत के उस पेज पर जा गिरी!

जिस पे तस्वीर थी मेरे दिलदार की!

या खुदा तुझसे ये क्या खता हो गयी!

मेरी किस्मत से वो अब जुदा हो गयी!

अब मुकद्दर मेरा दोस्त कंगाल है!

जिन्दगी ये मेरी गम का जंजाल है......



नाम ही है सुना मैनें देखी नहीं!

शक्ल से तो कभी क्या बला है खुशी!

है… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on January 6, 2015 at 10:30pm — 11 Comments

ये किसकी हया को .... (एक रचना)

ये किसकी हया को .... (एक रचना)

ये किसकी हया को  छूकर  आज बादे सबा आयी है

दिल की हसीन  वादियों में ये किसकी सदा आयी है

होने लगी है सिहरन क्यूँ अचानक से इस जिस्म में

किसकी पलक ने अल-सुबह ही आज ली अंगड़ाई है

छोड़ा था इक ख़तूत जो  कभी हमने उस दहलीज़ पे

छू के उसकी आग़ोश  को ये सुर्ख़ हवा आज आयी है

बिन पिये ही मयख़ानों से  क्यूँ रिन्द सब जाने लगे

किसने अपने  रुख़्सार  से  चिलमन आज हटायी है

हमारी  तरह  बेताबियाँ…

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Added by Sushil Sarna on January 6, 2015 at 8:28pm — 10 Comments

तू देव-रूप है मेरे लिए

तू देव रूप है मेरे लिए ---

मुझे तराशा  है तेरे प्यार ने

मुझपे ऐतबार कर

तू देव रूप है मेरे लिए,मेरी

पूजा स्वीकर कर

मैं तो दलदल था,कमल पुष्प

खिलाए तुमने मुझमें

मृत था मेरा ये उर

एहसास पुनः जगाए तमने मुझमें

उठ,खड़ी हो,मजबूत बन

अपनी कोशिश ना निराधार कर

तू देव रूप है मेरे लिए -----------

जब सारे ज़माने ने

मुझ से मुँह फेर लिया

जब सघन तिमिर ने

मुझ को घेर लिया

तुम आई मेरी ज़िन्दगी…

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Added by somesh kumar on January 6, 2015 at 11:00am — 8 Comments

मेरे गृह भी आये दिनकर(नवगीत)

नभ के हाँथ गुलाल हो गया

मुख प्राची का लाल हो गया

मेरे गृह भी आये दिनकर



प्रथम किरण के साथ साथ ही

तम को जैसे जेल हो गया

रवि आते हैं तम जाता है

लुका छिपी का खेल हो गया

बदली के पीछे से देखो

ताँक झाँक करते रह रहकर

मेरे गृह भी आये दिनकर



मादक सी अँगड़ाई लेती

कलियों की मुस्कान देख लो

कोयल गाती है किस धुन में

उसकी प्यारी गान देख लो

ताली बजा रहें है पत्ते

झूम झूमकर नाचे तरुअर

मेरे गृह भी आये दिनकर



इन्द्र… Continue

Added by ram shiromani pathak on January 6, 2015 at 10:55am — 6 Comments

दो नन्हें फूल

दो नन्हें फूल,मेरे आँगन के

खिलते महकते,खुशियाँ जीवन के

लड़ते झगड़ते, कभी रुठ भी जाते

पल भर में फिर भूल भी जाते

भोली हँसी कोमल इनका मन है

इनकी बातो में झरते सुमन हैं

दुख का साया, इनके पास न आए

निर्मल धारा ये, बस बहते ही जाए

‘काशवी’ जीवन है तो,’दैविक’ वर है

इनसे ही तो बना ,मेरा घर , घर है

          ***********

काशवी’-प्रकाशवान

दैविक- ईश्वर का दिया वरदान

       …

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Added by Maheshwari Kaneri on January 5, 2015 at 8:30pm — 7 Comments

मोहब्बत इस ज़माने में गुनाह हो गया

हम तुम्हारे थे पर तुम क्यूँ समझी नही

बेवजह सबकी बातों में उलझी रही

संदेहात्मक परिस्थिति भी सुलझी नही

तुम से जुड़ना ही मेरा गुनाह हो गया

मोहब्बत इस ज़माने में गुनाह हो गया |

तुम से मिलकर फ़कीर दिल भी राजा हुआ

मन का मुरझाया फूल भी ताजा हुआ

मेरे हर दुःख-दर्द का भी जनाजा हुआ

तुम्हारा पास आना भी गुनाह हो गया

मोहब्बत इस ज़माने में गुनाह हो गया |

तुमने दिए जो जख्म अब वो भरते नही

मेरी सांसे भी रुकने से अब तो डरते नही

मर चुके जो…

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Added by maharshi tripathi on January 5, 2015 at 6:53pm — 8 Comments

'मुखौटा'

''माँ भैया का अंतरजातीय विवाह तो आपने आसानी से स्वीकार कर लिया था फिर मेरे अंतरजातीय विवाह के लिए इंकार क्यों कर रही हो.'' छोटे बेटे ने माँ से बहस करते हुए कहा.

माँ ने कहा, "उसने तो हमसे उच्च वर्ग की लड़की पसंद की थी पर तुम्हारी पसंद तो हम से नीची जाति की है. नीची जाति की लड़की हम कैसे स्वीकार कर सकते हैं."

-श्रद्धा थवाईत

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Shraddha Thawait on January 5, 2015 at 4:24pm — 8 Comments

कहीँ तो हो खुदा कोई ~ गज़ल

1222 1222

कहीँ तो हो खुदा कोई ।
सुने दिल की रज़ा कोई ।

झुका है दिल उठे हैँ हाथ ,
करे पूरी दुआ कोई ।

जफा पायी जमाने से ,
निभा जाये वफा कोई ।

किसी से क्योँ खता होती ,
क्यूँ पाता है सजा कोई ।

जो दिल की बेबसी समझे ,
नहीँ ऐसा मिला कोई ।

किसी की याद फिर आयी ,
अश्क बन फिर बहा कोई ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज मिश्रा

Added by Neeraj Nishchal on January 5, 2015 at 4:00pm — 11 Comments

मरुस्थलीय मृगतृष्णा

मरुस्थलीय मृगतृष्णा

*****************

तुम कहती हो

प्रतिभाशाली बनो

पर मैं असक्त

प्रतिभाओं का बोझ

उठा नहीं सकता

मरुस्थलीय मृगतृष्णा के

पीछे भाग नहीं सकता

जिस शून्यता की अवस्था में

जी रहा हूँ , क्या उसमे

तुमको पा नहीं सकता ?

मुझ शुन्य को अब

तुम्हारा ही सहारा है

तुमसे जुड़कर ही मेरा

कोई आधार बनेगा

यह गतिहीन जीवन

कुछ आगे बढेगा

मेरे हृदय के पवित्र भावों…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 5, 2015 at 12:30pm — 19 Comments

दोहा गीत (सुबह -सुबह)

देखो फिर से हो गया
मुख प्राची का लाल।

रविकर के आते हुआ सुन्दर सुखद प्रभात।
तरुअर देखो झूमते नाच रहें हैं पात।
किरणों ने कुछ यूँ मला इनके गाल गुलाल।

मंद मंद यूँ चल रही शीतल मलय बयार।
प्रकृति सुंदरी कर रही अपना भी शृंगार।।
फ़ैल गया चारो तरफ किरणों का जब जाल।

जन जीवन सुखमय हुआ,समय हुआ अनुकूल।
कोयल भी अब गा रही,खिले खिले हैं फूल।।
ठिठुरे तन को घूप ज्यों शुक को मिले रसाल।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 5, 2015 at 10:30am — 19 Comments

दृष्टिकोण (लघुकथा)

चौराहे पर आकर एक लम्बी कार रुकी तो एक भिखारिन अपने बच्चे को गोद में उठा कर उस के पास जाकर भीख मागने लगी तभी उसकी नजर उस कार की पिछली सीट पर रखी एक फोटो पर गई जिस में एक गरीब औरत पुराने चिथड़ों से अपने शरीर को ढकते हुए अपने बच्चे को अपने आँचल में छुपाते हुए डरी सहमी बैठी थी यह वही फोटो थी जो पिछले दिनों लाखो रुपयों में बिकी थी, इतनी ही देर में कार के अंदर से आवाज आई, "चल चल आगे चलो…

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Added by harikishan ojha on January 5, 2015 at 10:00am — 9 Comments

ग़ज़ल- छुट्टियों के दिन

मस्कुराते हैं छुट्टियों के दिन

कम ही आते हैं छुट्टियों के दिन

कंपकंपाते हैं छुट्टियों के दिन  

थरथराते हैं छुट्टियों के दिन 

देखो सचमुच में थक गये हैं हम,

ये बताते हैं छुट्टियों के दिन



सैंकडों काम छोड कर बाकी

भाग जाते हैं छुट्टियों के दिन



सपनों के बोझ में दबे बच्चे

खेल पाते हैं छुट्टियों के दिन



चार दिन घर में रह नहीं पाये,

अब थकाते हैं छुट्टियों के दिन

आदतें और थकान,आलस…

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Added by सूबे सिंह सुजान on January 4, 2015 at 11:00pm — 16 Comments

बस तुम्ही पे आस है ( कविता)

उठ सम्भल ओ नौजवान

यही है तेरे नाम पैगाम

लिंग जाती धर्म भेद

आग में जलाए चल

एक थे हम एक हैं

अलख तू लगाए चल

दम तेरे पास है

बस तुम्हीं पे आस है

 

बाधा कोई रोक ले

चूलें तू उसकी ठोक दे

हर दीबार को गिराए चल

हक पाने के लिए

जन जन को जगाए चल

बस तुम्हीं में श्वास है

बस तुम्हीं पे आस है

 

पुण्य आज डूब रहा

पाप फल फूल रहा

सत्ता भ्रष्ट हो रही

जनता त्रस्त रो…

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Added by कंवर करतार on January 4, 2015 at 10:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल - प्यार दिल का योग है जी !

2 1 2 2 -2 1 2 2



प्यार दिल का योग है जी  !

ये भी* तो इक रोग है जी  !!



आज जिसको प्यार कहते !

जिस्म का बस भोग है जी  !!



जुर्म माना इश्क को कब ! 

ये सदा इक जोग है जी !!



कुंडली* को तुम देख लेना !

उसमे* भी धनयोग है जी  !!



साथ सच्चा मिल गया हो !

तो बड़ा संयोग है जी !!



दर्द सबका ले लिया तो !

ये सही उपयोग है जी !!



जान का जब साथ हो तो  !

तो यही संजोग है जी !!



काम में गर साथ दे हम…

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Added by Alok Mittal on January 4, 2015 at 8:00pm — 13 Comments

कविता के ब्याज से

कमल-नैन या कंज-लोचन है वह  

कहते है शोक-विमोचन है वह  

पद्म -पांखुरी जैसे है अधर

रक्त-नलिन से कपोल है सुघर

 

नील-नीरज सा मोहक वदन

वपुष नीलोत्पल सुषमा-सदन

है दीर्घ बाहे अम्बुज की नाल

पाद-पुष्ट मानो है पंकज मृणाल

 

हाथ की हथेली है राजीव-दल

विकसित है कर में श्याम-शतदल

चरण-सरोज की है महिमा अनूप

सांवले सरोरुह सा खिला-खिला रूप…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 4, 2015 at 7:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल : आजमाते पंख के फैलाव को.

2122,2122,212

सह सके ना फूल के टकराव को.

हैं मुकाबिल झेलने सैलाव को.

थामना पतवार सीखा है नहीं.

हैं चले खेने बिफरती नाव को.

हौसला उनका झुकाता आसमां.

आजमाते पंख के फैलाव को.

हर सफलता चूमती उनके कदम,

आजमाते वक़्त पर जो दाव को.

भाव उनके भी गिरेंगे एक दिन,

भूल जाते हैं सरे सद्भाव को.

.

हरिवल्लभ शर्मा दि. 04.01.2015

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by harivallabh sharma on January 4, 2015 at 6:30pm — 15 Comments

नव जीवन--

"बाबू, बाबू" , बाबा के मुंह अस्पष्ट सी आवाजें निकल रही थीं | वो अब धीरे धीरे अपनी ऑंखें खोलने का प्रयास कर रहे थे | खून अभी भी उनकी कलाईयों में चढ़ रहा था और मैं उनके सिरहाने बैठा उनको सहला रहा था |

मुझे सुबह का घटनाक्रम याद आ गया जिसके चलते उनको चोट लगी थी | मैं उनका लाडला पोता था और मुझे वो हमेशा बाबू ही बुलाते थे | मैं कल ही गांव आया था और आज मुझसे मिलने गांव के कई लोग आ गए | उसी बीच एक दलित लड़का आ कर दरवाजे पर पड़ी खाट पर बैठ गया | बाबा ने कभी भी दलितों को बराबर नहीं समझा था , शायद यह…

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Added by विनय कुमार on January 4, 2015 at 1:34pm — 8 Comments

एक-एक शून्य(लघुकथा)

"देखिये श्रीमान आपका बेटा फिर से हर विषय में फेल हो गया है, किसी में 5, किसी में 6, किसी में 7 नंबर, इसीलिए आपको बुलाना पड़ा I लीजिये आप खुद ही इसकी सारी कॉपी देख लीजिये I" "

"अरे गुरूजी ये लीजिये, अब लिफाफा पकड भी लीजिये, आपका ही बच्चा है ,बस एक-एक शून्य लगा दीजिये I"

.

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Hari Prakash Dubey on January 4, 2015 at 1:30pm — 12 Comments

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