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स्त्री (एक शब्द चित्र)

 

सहम कर सिहरने लगता है

धमनियों में दौड़ता रक्त,

काँपने लगती है रूह,

खिंचने लगतीं हैं सब नसें,

मुस्कुराहट कहीं दुबक जाती है,

हर इच्छा कहीं खो जाती है,…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 1, 2017 at 11:30am — 10 Comments

वक्त की बात(व्यंग्य के निमित्त)

रात अपनी जवानी पर थी,चाँद अपने शबाब की ऊँचाई पर।साँसों में असहास कायम था।झक शीतल रोशनी में रात सिहरती,शरमाती।चाँद खिलखिलाता,और खिलखिलाता। यह क्रम ज्यादा देर तक नहीं चला।अरे यह क्या!वक्त की निस्तब्धता भंग होती -सी लगी। कहीं से किसी अज्ञात पक्षी ने पंख फड़फड़ाये।शायद अकस्मात् नींद से जगा हो।कहीं नींद में ही सबेरा न हो जाये,इसलिए आकुल हो शायद। रात अपना काला दुपट्टा समेटने लगी।चाँद को यह नागवार लगा।उसकी चाहत अभी परवान चढ़ी ही कहाँ!सबेरा होने की शुरुआत इतनी जल्दी क्यूँ हो जाती है भला?बिलकुल सुख के… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 1, 2017 at 9:58am — 4 Comments

जिधर देखो उधर मेहनत कशों की - सलीम रज़ा रीवा

1222 1222 1222 1222

-

जिधर देखो उधर मिहनत  कशों की ऐसी हालत है-

ग़रीबों  की  जमा अत पर अमीरों की क़यादत…

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Added by SALIM RAZA REWA on November 1, 2017 at 9:30am — 15 Comments

लघुकथा---शट अप

शट अप
ओफ्फ हो ! क्या माँ आप हरदम ज़ोर-ज़ोर से बोलती हो । ये गाँव नहीं है ,वीआईपी कॉलोनी है । यहाँ सभी वेल एजुकेटेड लोग रहते हैं ,धीमे स्वर में बोलते है । वेल कल्चर हैं यहाँ , वेल कल्चर समझी ।"
" मगर मुझे एक बात समझ में नहीं आई। जब से यहाँ आई हूँ देख रही हूँ कि कोई किसी से बतियाता है न बातचीत करता है । क्या यहाँ की वेल कल्चर है ?"
" शट अप !!"
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on November 1, 2017 at 8:30am — 24 Comments

एक थी एकता (लघुकथा)

"क्यों नवयुवक, तुम किस के लिए दौड़ रहे हो इस भीड़ में? एकता के लिए, अपने लिए, किसी महापुरुष की प्रतिष्ठा के लिए, सरकार के लिए या किसी को श्रद्धांजलि के लिए?"



एक विशेष अवसर पर आयोजित विशाल दौड़ में एक पत्रकार ने पूछा तो वह नवयुवक अपनी विशेष टी-शर्ट सही करते हुए, मोबाइल से सेल्फ़ी लेते हुए बोला - " ये बढ़िया रहा! लोकप्रिय पत्रकार के साथ यादगार फोटो! .... चलिए आप भी दौड़िए मीडिया कवरेज के लिए, ग्लैमर के लिए, पब्लिसिटी के लिए; 'राष्ट्रीय एकता' के इस बैनर तले!"



सब दौड़ रहे थे।… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 1, 2017 at 1:22am — 12 Comments

दोहद के बारे में संक्षिप्त जानकारी

महाकवि  कालिदास ने  ‘मेघदूत ‘ खंड काव्य में  दोहद’  शब्द का प्रयोग किया है - 

रक्‍ताशोकश्‍चलकिसलय: केसरश्‍चात्र कान्‍त:

     प्रत्‍यासन्‍नौ कुरबकवृतेर्माधवीमण्डपस्‍य।

एक: सख्‍यास्‍तव सह मया वामपादाभिलाषी

     काङ्क्षत्‍वन्‍यो वदनमदिरां दोहदच्‍छद्मनास्‍या:।।

[उस क्रीड़ा-शैल में कुबरक…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 31, 2017 at 9:30pm — 5 Comments

मेरा वो घर मुझे मिला उजड़ा मुझे जो घर बसाना था

बह्र 1222/1222/1222/1222



अकेला ही रहा था मैं मेरा छप्पर उठाना था

हजारों लोग तब आये मेरा जब घर गिराना था



वो बोतल फेंक देते है गरम जब हो गया पानी

तड़पकर मर गया देखो जिसे पानी पिलाना था



तड़पकर और रो कर के बताओ क्या मिला तुमको

मोहब्बत थी तुम्हें हमसे नही तुमको छिपाना था



मुझे तो देखना ये था कि मेरे हीर कितने है

ये मैंने कब कहा था की मुझे रिश्ता निभाना था





तुम्हारी ही दुआओं का असर है माँ बुलंदी पर

जहाँ मैं आज पहुचा हूँ… Continue

Added by maharshi tripathi on October 31, 2017 at 4:00pm — 3 Comments

बेहाल जिन्दगी

बेहाल जिन्दगी



बिखरे सूखे पत्तों के बीच

फूस की झोपड़ी में

बेहाल जिन्दगी

अटकी साँसे

दुहाई दे रही थीं

सिर्फ जीने के लिए

दूर स्थित खेत में

कुछ काले श्वान

दूषित मटमैले

चेहरों पर भौंक रहे थे

बार बार गूँजती आवाज

सहमा डरा चेहरा

बहुत निराश

कम्पित भयावहता के बीच

कुछ टूटे फूटे बर्तन

बिखरे पड़े इधर उधर

बहते अश्रुओं के बीच

कोस रहे थे

अपनी बदनसीबी पर

निरीह आँखे निहार रही थी

ऊँचे मुंडेर… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 31, 2017 at 12:23pm — 18 Comments

ग़ज़ल-कभी दुख कभी सुख, दुआ चाहता हूँ (संशोधित )

तरही ग़ज़ल  अल्लामा इकबाल जी का  मिसरा 

“ तेरे इश्क की इम्तिहाँ चाहता हूँ “

काफिया : आ ; रदीफ़ :चाहता हूँ

बहर : १२२  १२२  १२२  १२२

*****************************

कभी दुख कभी सुख, दुआ चाहता हूँ

इनायत तेरी आजमा चाहता हूँ |

'वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ

तेरे इश्क की इम्तिहा चाहता हूँ |

जो’ भी कोशिशे की हुई सब विफल अब

हूँ’ बेघर मैं’ अब आसरा चाहता हूँ |

ज़माना हमेशा छकाया मुझे है

अभी…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on October 31, 2017 at 11:00am — 5 Comments

फूलों की लड़ाई ( कविता)

देखी एक दिन फूलों की लडाई 

रहते थे अब तक जो बन भाई - भाई |

काँटों से निकल कर गुलाब बोला 

सूरज ने जब रात का पट खोला 

मेरी खुशबू से खिलता है बाग़

समाज जाते हैं लोग खिल गया गुलाब

सुन रहे थे यह और भी फूल कई 

नहीं हैं हम भी मिटटी या धूल कोई 

बाग में हो रही थी सबकी बहस 

हो रहा था बाग तहस नहस 

कीचड़ से कमल खिल उठा 

देख सबको वह बोल उठा 

देखो खुद को , सोचो तो…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 30, 2017 at 10:18pm — 7 Comments

कविता...​​ बदले हुये इंसान की बातें -बृजेश कुमार 'ब्रज'

सुबह से लेकर सांझ की बातें

इक खत में कैसे लिख दूँ

सूरज से लेकर चांद की बातें

इक खत में कैसे लिख दूँ



कैसे लिख दूँ मैं भँवरे का

कलियों से हुआ जो प्रेम मिलन

कैसे लिख दूँ कि बेलों ने

पेड़ों को बाँधा था आलिंगन

प्रीत पतिंगा दिए से करे

पगले के बलिदान की बातें

इक खत में कैसे लिख दूँ

जीवन और शमशान की बातें

इक खत में कैसे लिख दूँ



कैसे लिख दूँ की तुम बिन

उदास आँखों का दरपन

रूठी ​​हुई बहारें हैं

उजड़ा हुआ है… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 30, 2017 at 8:39pm — 7 Comments

मुझे संसार में आने दो .....

मुझे संसार में आने दो .....

ठहरो !

पहले मैं अपनी बेनामी को नाम दे दूँ

गर्भ के रिश्ते को

दुनियावी अंजाम दे दूँ

जानती हूँ

जब

तुम मुझे जान जाओगे

बिना समय नष्ट किये

मुझे गर्भ से ही

कहीं दूर ले जाओगे

कूड़ेदान

कंटीली झाड़ियों

या फिर किसी नदी,कुऍं में

या किसी बड़े से पत्थर के नीचे

दूर रेगिस्तान में

फेंक आओगे

जहां से तुम्हें

मेरी चीख भी सुनायी न देगी

इसके बाद

तुम चैन की नींद सो…

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Added by Sushil Sarna on October 30, 2017 at 6:49pm — 6 Comments

जुलाहा ....

जुलाहा ....

मैं
एक जुलाहा बन
साँसों के धागों से
सपनों को बुनता रहा
मगर

मेरी चादर
किसी के स्वप्न की
ओढ़नी न बन सकी
जीवन का कैनवास
अभिशप्त सा  बीत गया
पथ की गर्द में
निज अस्तित्व
विलीन हुआ
श्वासों का सफर
महीन हुआ
मैं जुलाहा
फिर भी
सपनों की चादर
बुनता रहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 30, 2017 at 12:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल - करते हैं चोरी पर चोरी क्या कहने

फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फा
22 22 22 22 22 2
करते हो चोरी पर चोरी क्या कहने।
ऊपर से ये सीनाजोरी क्या कहनै।

बातें तो करते हो बढ़चढ़कर लेकिन,
बातें हैं कोरी की कोरी क्या कहने।

लाँघ न पाई अपने घर की जो देहरी,
दौड़ रही वो गाँव की गोरी क्या कहने।

कार्टून फिल्में क्या आईं टीवी में,
बच्चे भूले माँ की लोरी क्या कहने।

कल जो साधू सन्त दिखाई देते थे,
वे सब निकले आज अघोरी क्या कहने।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Ram Awadh VIshwakarma on October 29, 2017 at 10:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तन पत्थर है मन पत्थर (एक छोटी बह्र की ग़ज़ल 'राज')

२२ २२ २२ २

खुद ही काटे अपने  पर

क्या धरती अब क्या अम्बर

 

कोई खिड़की न कोई दर

कितना उम्दा अपना  घर

 

दुनिया तेरी धरती पर  

अपनी हद बस ये गज भर

 

बंद कफ़स हो चाहे खुला

तुझको अब कैसा है डर

 

सारा आलम  रख ले तू

मेरी अब परवाह  न कर

 

मेरी अपनी मंजिल है

तेरी अपनी राह गुज़र   

 

बेजा  अब हैं तीर तेरे  

तन पत्थर है मन पत्थर 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by rajesh kumari on October 29, 2017 at 8:44pm — 17 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही ग़ज़ल - " पहले ये बतला दो उस ने छुप कर तीर चलाए तो '‘ ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22 22  22 2

वो जितना गिरता है उतना ही कोई गिर जाये तो

उसकी ही भाषा में उसको सच कोई समझाये तो

 

सूरज से कहना, मत निकले या बदली में छिप जाये

जुगनू जल के अर्थ उजाले का सबको समझाये तो

 

मैं मानूँगा ईद, दीवाली, और मना लूँ होली भी   

ग़लती करके यार मेरा इक दिन ख़ुद पे शरमाये तो

 

तेरी ख़ातिर ख़ामोशी की मैं तो क़समें खा लूँ, पर  

कोई सियासी ओछी बातों से मुझको उकसाये तो

 

कहा तुम्हारा मैनें माना,…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 29, 2017 at 6:11pm — 25 Comments

बातों ही बातों में उनसे प्यार हुआ - सलीम रज़ा रीवा

22 22 22 22 22 2 ..

बातों ही बातों में उनसे प्यार  हुआ.

ये मत  पूछो  कैसे कब इक़रार हुआ

.      

जब से आँखें उनसे मेरी चार हुईं.

तब से मेरा जीना भी दुश्वार हुआ

.

वो शरमाएँ जैसे  शरमाएँ…

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Added by SALIM RAZA REWA on October 29, 2017 at 8:30am — 21 Comments

ग़ज़ल -- दूर कर बद-गुमानी मेरी // दिनेश कुमार

212---212---212



दूर कर बदगुमानी मेरी

ख़त्म हो सरगरानी मेरी



मेरे जीवन से तुम क्या गए

खो गई शादमानी मेरी



अब न आएगी ये लौटकर

जा रही है जवानी मेरी



बीती बातों पे ये बारहा

व्यर्थ की नोहा ख़्वानी मेरी



ग़म के दरिया में रक्खा है क्या

भूल जाओ कहानी मेरी



गुल खिलाएगी कोई नया

एक दिन हक़-बयानी मेरी



ऐ मेरे जिस्म ! ऊबा हूँ मैं

अब न कर मेज़बानी मेरी



मौलिक व… Continue

Added by दिनेश कुमार on October 29, 2017 at 7:14am — 11 Comments

कारसाज - लघुकथा

'कारसाज'



           "जनाब, गर आप को ऐतराज न हो तो एक बात कहना चाहता हूँ।" खान साहब के केबिन से बाहर जाते ही उनके एडिटर ने अपना रुख मेरी ओर किया था।

"अनवर मियाँ, आप यहां वर्षों से काम कर रहे है और खान साहब की तरह मैं भी आपको बहुत मान देता हूँ। आप बेहिचक अपनी बात मुझसे कह सकते है।" मैं मुस्करा दिया।

"जनाब बात ही कुछ ऐसी है कि कहने में हिचक हो रही है।" अनवर मियां कुछ पशोपश में थे। "दरअसल अभी हाल ही में जो किस्से-कहानी के मद्देनजर हमारे पब्लिकेशन ने…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on October 28, 2017 at 12:54pm — 1 Comment

कविता- जी एस टी

कविता- जी एस टी
 
मैं सो रही थी मुझे उठाया गया,
नींद में ही गाडी में बैठाया गया !
होश में आती उससे पहले ही बताया गया, 
व्यापारियों का खून चूसने जीएसटी लगाया गया !
 
अधिकारी के दफ़्तर संग लाया गया,
टेक्स का सारा…
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Added by जयति जैन "नूतन" on October 27, 2017 at 11:39pm — 1 Comment

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"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
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Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
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Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
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Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
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जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
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