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गज़ल - दिगंबर नासवा -२

इस नज़र से उस नज़र की बात लम्बी हो गई

मेज़ पे रक्खी हुई ये चाय ठंडी हो गई

 

आसमानी शाल ने जब उड़ के सूरज को ढका

गर्मियों की दो-पहर भी कुछ उनींदी हो गई

 

कुछ अधूरे लफ्ज़ टूटे और भटके राह में     

अधलिखे ख़त की कहानी और गहरी हो गई

 

रात के तूफ़ान से हम डर गए थे इस कदर

दिन सलीके से उगा दिल को तसल्ली हो गई

 

माह दो हफ्ते निरंतर, हाज़री देता रहा

पन्द्रहवें दिन आसमाँ से यूँ ही कुट्टी हो…

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Added by दिगंबर नासवा on February 8, 2019 at 1:30pm — 8 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

22 22 22 22 22 22 22 2

हर लम्हा इक चोट नई थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

मेरी हस्ती टूट रही थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

मेरे पाँव में इक कांटे से तुझको कितना दर्द हुआ

जब तू शोलों से गुजरी थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

जिन सपनों को हमने मालिक के हाथों में सौंपा था

उन सपनों में आग लगी थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

सारे रस्ते आकर के जिस रस्ते पर मिल जाते हैं

उस रस्ते पर पीर घनी थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

छोड़…

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Added by मनोज अहसास on February 8, 2019 at 12:26pm — 6 Comments

अल्फाज़

अल्फाज़ रूठें हैं -
छोटे बच्चों की तरह,  

मेरी शायरी पर -
अपने पैर पटक रहे हैं,

बहुत अरसे के बाद -
आया हूँ मिलने इनसे,

यकीनन इसलिए-
रूठे हैं मुझसे कट रहे हैं !!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by रक्षिता सिंह on February 8, 2019 at 10:25am — 4 Comments

सुन! जो उनसे हो मुलाकात जाये तो क्या होगा

बह्र-

2122-2122-1221-222

सुन! जो उनसे हो मुलाकात जाये तो क्या होगा ।।

दरमियाँ फिर हो वही बात जाये तो क्या होगा।।

पर कहीं वो रूठ कर नजरें अपनी घुमा ली तो ।

बेबजह यूँ इश्क जजबात जाये तो क्या होगा।।

छोड़ उसको फिर न ये दर्द उलफत का देना अब।

रो के गर उसकी भी ये रात जाये तो क्या होगा।।

जानते हो ,वो यूँ मीलों सफर के जैसा है।

दो कदम चल के मुलाकात जाये तो क्या होगा ।।

मुझसे वो अच्छे से मिलना नहीं चाहती…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on February 7, 2019 at 6:37pm — 4 Comments

मन तिरता आकाश - गीत

 

मन तिरता आकाश

 

नैनों में सपने तिरते हैं,

मन तिरता आकाश

देखूं जब भी तेरा मुखड़ा,

लगता खिला पलाश

 

मधुरिम गीत लिख रही मेंहदी,

पायल गाती है

माथे पर कुमकुम…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on February 7, 2019 at 5:15pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल (हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया)

हिलता है तो लगता ज़िंदा है साया

लेकिन चुप है, शायद गूँगा है साया

कहने में तो है अच्छा हमराही पर

सिर्फ़ उजालों में सँग होता है साया

सूरज सर पर हो तो बिछता पाँवों में

आड़ में मेरी धूप से बचता है साया

असमंजस में हूँ मैं तुमसे ये सुनकर

अँधियारे में तुमने देखा…

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Added by अजय गुप्ता 'अजेय on February 7, 2019 at 12:38pm — 3 Comments

रोशनी के सामने ये तीरगी क्या चीज़ है ( २३ )

रोशनी के सामने ये तीरगी क्या चीज़ है 

वक़्त की आंधी के आगे आदमी क्या चीज़ है 

***

जब थपेड़े ग़म के खाता है जहाँ में आदमी

तब उसे मालूम होता है ख़ुशी क्या चीज़ है 

***

एक बच्चे की कोई भी आरज़ू पूरी हो जब 

ग़ौर से फिर देखिये चेहरा हँसी क्या चीज़ है 

***

ग़ुरबतों से लड़ के जिसने ख़ुद बनाया हो मक़ाम 

बस वही तो जानता है…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on February 7, 2019 at 10:30am — 4 Comments

कुछ दोहे - क्रोध पर

बड़े लोग कहते रहे, जीतो काम व क्रोध.

पर ये तो आते रहे, जीवन के अवरोध.  

माफी मांगो त्वरित ही, हो जाए अहसास.

होगे छोटे तुम नहीं, बिगड़े ना कुछ ख़ास.

क्रोध अगर आ जाय तो, चुप बैठो क्षण आप.

पल दो पल में हो असर, मिट जाएगा ताप .

रोकर देखो ही कभी, मन को मिलता चैन.

बीती बातें भूल जा, त्वरित सुधारो बैन  .

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by JAWAHAR LAL SINGH on February 6, 2019 at 10:50pm — 6 Comments

अंतिम साँझ .......

अंतिम साँझ .......

लिख लेने दो
एक अंतिम साँझ
मुझे
साँझ के पन्नों पर
अभिलाषाओं की वेदी पर
साँसों की देहरी पर
व्योम के क्षितिज़ पर
स्मृति के बिम्बों पर
मौन की गुहा में
स्पर्शों की गंध पर
श्वासों के आलिंगन में
अन्तस् के दर्पण पर
बिंदु के अस्तित्व में
लिख लेने दो
मुझे
प्राणों में लीन प्राणों की
अंतिम
साआआआं ... झ


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on February 6, 2019 at 7:24pm — 4 Comments

कुछ अनमोल रिश्ते   ( कहानी )

बचपन में  हमने  अपने दादा दादी और नाना नानी को तो नहीं देखा था ,पर हमारे पड़ोस में एक बुजुर्ग महिला जो अपने परिवार के साथ रहा करती थी । उन्ही से हमें बहुत प्यार मिला करता  उनका अकसर  हमारे घर में बिना नागा  जाना जाना  हुआ करता था ।हम उन्हें आमा यानी नानी कहा करते थे ।

वे जब भी हमारे घर आती थी,माँ उन्हें बड़े प्यार से बिठा कर चाय नाश्ता दिया करती थी । वे चाय नाश्ते के चुस्कियो के साथ-साथ अपनी हर छोटी-छोटी बातें ,हर दर्द हर दुख सुख माँ के साथ बाँटा करती थी। माँ भी उनकी हर बात बहुत…

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Added by Maheshwari Kaneri on February 6, 2019 at 4:00pm — 4 Comments

पुरखे हमारे  एक  हैं  मजहब  से तोल मत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल )

२२१/२१२१/२२२/१२१२



क्या कीजिएगा आप यूँ पत्थर उछाल कर

आये हैं भेड़िये तो  सब  गैंडे सी खाल कर।१।



कितने  जहीन  आज-कल  नेता  हमारे  हैं

मिलके चला रहे हैं सब सन्सद बवाल कर।२।



वो चुप थे बम के दौर में ये चुप हैं गाय के

जीता न कोई  देश  का  यारो खयाल कर।३।



पुरखे हमारे  एक  हैं  मजहब  से तोल मत

तहजीब जैसी कर रहे उस पर मलाल कर ।४।



माना की मिल गयी तुझे संगत वजीर की

प्यादा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 5, 2019 at 5:31am — 10 Comments

इसी वजह से- लघुकथा

आज बचवा चाचा बहुत उदास दरवाजे पर बैठे थे. वैसे तो उदास उनका पूरा गांव ही हो गया था, अधिकांश नौजवान शहरों के बिजबिजाते भीड़ का हिस्सा बनने चले गए थे. कुछ जो बचे थे वह गांव में अक्सर रात को ही आते थे, दिन में तो उनका समय देसी शराब के ठेके या सिनेमा हाल पर ही बीतता था. हर घर में इक्का दुक्का बुजुर्ग ही बचे थे जो दिन को किसी तरह काट रहे थे. जितना होता एक दूसरे से बात करते या अपने अपने रोग को लेकर खटिया पर पड़े रहते.

गांव था तो गांव के अपने सुख दुःख भी थे. सबसे ज्यादा झगड़ा तो खेतों को लेकर ही…

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Added by विनय कुमार on February 4, 2019 at 7:03pm — 6 Comments

एक सच ...

एक सच ...

एक सच
व्यथित रहा
अंतस के अनंत में
एक सच
लीन रहा
मिलन के बसंत में
एक सच
ठहर गया
दृष्टि के दिगंत में
एक सच
प्रकम्पित हुआ
आभासी कंत में
एक सच
बंदी बना
अभिलाषी कंज में
एक सच
शकुंत बना
अवसान के अंत में
एक सच
अदृश्य रहा
जीवन के प्रपंच में
एक सच
शून्य बना
अंत के अनंत में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित



Added by Sushil Sarna on February 4, 2019 at 5:44pm — 6 Comments

भले नीम जां मेरा जिस्म हो , अभी रूह इसमें सवार है (२२ )

भले नीम जां मेरा जिस्म हो  अभी रूह इसमें सवार है 

अभी जा क़ज़ा किसी और दर मेरी साँस में भी क़रार  है 

***

है जवाब देती लगे नज़र अभी है ख़याल की रोशनी 

रहे ज़ीस्त मेरी रवाँ दवाँ  ये तुम्हीं पे दार-ओ-मदार है 

***

जो पिलाई तूने थी चश्म से कभी मय जो बन के थी साक़िया

न उतर सका न उतार पर  चढ़ा अब तलक वो ख़ुमार है …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on February 4, 2019 at 5:30pm — 7 Comments

चारण हूँ मद्दाह नहीं मैं सच लिक्खूंगा-बोलूँगा - बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

S S S S S S S S S S S S S S S

.

देश के दुश्मन सबके दुश्मन इनसे यारी ठीक नहीं|

इनसे हाथ मिलाने वालों यह गद्दारी ठीक नहीं|

मंदिर-मस्ज़िद-धर्मों-मज़हब रक्षित औ महफूज़ हैं फिर

इनकी खातिर गोलीबारी -तेग-कटारी ठीक नहीं

माँ की अस्मत ख़तरे में औ मुल्क में हो गर त्राहिमाम

तब तो लोग कहेंगे दिल्ली की सरदारी ठीक नही।

आरक्षण की ख़ातिर ही अंधे-बहरे कुर्सी पर हैं

इस हालत से देश की होगी कुई बीमारी ठीक नहीं|

चारण हूँ मद्दाह नहीं मैं सच…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on February 4, 2019 at 2:00pm — 4 Comments

"मरघट के कपोत"

मनुज पशु पक्षी और जंतु,

एक ही सबका जीवन दाता,

धनी हो या फिर निर्धन कोई,

मरघट अंतिम ही सुख् दाता ।

भोर से लेकर सांझ तलक शव,

मरघट में आते रह्ते हैं,

चंद्न लकडी घी पावक मिल,

भस्म उसे करते रहते हैं ।

मूषक पिपिलिका कपोत उपाकर,

व्रीही खाकर जीवीत रहते हैं,

दूषित समझ मनुज जो छोडे,

वो जल पी जीवीत रहते हैं ।

उचित अनुचित तो ये भी जाने,

मनुज के मन को भी पहचाने,

पाप पुण्य का ज्ञान…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on February 4, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

नफरत को लोग शान से सर पर बिठा रहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२/१२१२

जब से वफा जहाँन में मेरी छली गयी

आँखों में डूबने की वो आदत चली गयी।१।

नफरत को लोग शान से सर पर बिठा रहे

हर बार मुँह पे प्यार के कालिख मली गयी।२।

अब है चमन ये  राख  तो करते मलाल क्यों

जब हम कहा करे थे तो सुध क्यों न ली गयी।३।

रातों  के  दीप  भोर  को  देते  सभी  बुझा

देखी जो गत भलाई की आदत भली गयी।४।

माली को सिर्फ  शूल  से  सुनते दुलार ढब

जिससे चमन से रुठ के हर एक कली…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2019 at 12:05pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९३

२२१ २१२१ १२२१ २१२



अपनी गरज़ से आप भी मिलते रहे मुझे

ग़म है कि फिर भी आशना कहते रहे मुझे //१ 



दिल की किताब आपने सच में पढ़ी कहाँ

पन्नों की तर्ह सिर्फ़ पलटते रहे मुझे //२ 



मिस्ले ग़ुबारे दूदे तमन्ना मैं मिट गया

बुझती हुई शमा' सा वो तकते रहे मुझे //३ 



सौते ग़ज़ल से मेरी निकलती थी यूँ फ़ुगाँ

महफ़िल में सब ख़मोशी से सुनते रहे मुझे…

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Added by राज़ नवादवी on February 4, 2019 at 10:13am — 6 Comments

ग़ज़ल-किनारा हूँ तेरा तू इक नदी है

अरकान-1222  1222  122

किनारा हूँ तेरा तू इक नदी है

बसी तुझ में ही मेरी ज़िंदगी है।।

हमारे गाँव की यह बानगी है

पड़ोसी मुर्तुज़ा का राम जी है।।

ख़यालों का अजब है हाल यारो

गमों के साथ ही रहती ख़ुशी है।।

घटा गम की डराए तो न डरना

अँधेरे में ही दिखती चाँदनी है।।

मुकम्मल कौन है दुनिया में यारो

यहाँ हर शख़्स में कोई कमी है।।

बनाता है महल वो दूसरों का

मगर खुद की टपकती झोपड़ी…

Continue

Added by नाथ सोनांचली on February 4, 2019 at 7:00am — 9 Comments

'तेरे-मेरे मन की बातें' (लघुकथा)

"तुम भी सिर्फ़ एक क़िताबी कीड़े ही हो! कभी तुमने अपनी सूरत आइने में देखी है? कभी किसी ने तुम्हारी सूरत पर कोई अच्छी सी टिप्पणी की है?"

"क्या मतलब?"

"मतलब यह कि न तो तुम्हारी सूरत देखकर मुझे ख़ुशी मिलती है, न ही तुम्हारी बातें सुनकर! तुम्हारे दिलो-दिमाग़ की सीमाएं नापी जा सकती हैं! तुम ज्ञानी ज़रूर हो, लेकिन तुम भी मेरे किसी काम के नहीं?"

"काम का कैसे नहीं हूं? बताओ क्या सुनना है मुझसे? कहानी, लघुकथा, कविता, इतिहास, नीति-शास्त्र, राजनीति या धर्म संबंधी?"

"वह सब तू…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 4, 2019 at 12:00am — 3 Comments

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