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कभी न होगी यहाँ नाभिकीय वार की बात (ग़ज़ल)

बह्र 1212 1122 1212 1121/112



अगर सभी के दिलो में हो सिर्फ प्यार की बात

नही कठिन है मिटाना जहाँ से खार की बात



हिरोशिमा से सबक लें सभी जो मुल्क अगर

कभी न होगी यहाँ नाभिकीय वार की बात



जुबाँ कभी मेरी खाली न जाये इसलिए तो

कभी किसी से न की भूलकर उधार की बात



हुआ चलन जो मो'बाइल का हर जगह गोया

कि अब नही यहाँ होंगी किसी से तार की बात



दिखा न आँख हमे इस कदर समझ बुजदिल

हैं शेर हम नही करते कभी सियार की बात



दिखा रही है… Continue

Added by नाथ सोनांचली on March 4, 2017 at 3:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल-नूर की -क्या है ज़िन्दगी,

२१२२,२१२२, २१२२, २१२ 

.

सोचने लगता हूँ अक्सर मैं कि क्या है ज़िन्दगी,

आग पानी आसमां धरती हवा है ज़िन्दगी.

.

मौत जो मंज़िल है उसका रास्ता है ज़िन्दगी,

या कि अपने ही गुनाहों की सज़ा है ज़िन्दगी.

.

बिन तुम्हारे इक मुसलसल हादसा है ज़िन्दगी,

सच कहूँ! ज़िन्दा हूँ लेकिन बेमज़ा है ज़िन्दगी.

.

ज़िन्दगी की हर अलामत यूँ तो आती है नज़र,

शोर है शहरों में फिर भी लापता है ज़िन्दगी.

.…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 4, 2017 at 2:37pm — 10 Comments

दिल्ली दूर है(लघुकथा)राहिला

एक बेहद पिछड़े ,सुविधाओं से कोसो दूर गाँव में अचानक कुपोषण से हुयी बच्चों की अकाल मृत्यु ने प्रशासन को गहरी नींद से जगा दिया। और इस दिशा में चल रही तमाम योजनाओं की जैसे कलई खुल गयी।आननफानन में शहर से चिकित्सकों का दल नाक मूँदे वहां पंहुचा । कई नये चिकित्सकों का तो ऐसे गाँव से ये पहला परिचय था।सब चौपाल पर इकठ्ठे हो चुके थे।

"देखिये!आप सबसे पहले ये जान लें कि कुपोषण की मुख्य वजह क्या हैं?जिसके चलते यह दुखद घटना हुयी है।"एक नई महिला चिकित्सक धारा प्रवाह बोलते हुए ,टंगे बड़े से पोस्टर पर लिखी… Continue

Added by Rahila on March 4, 2017 at 11:38am — 9 Comments

अपूर्ण रह जाती है मेरी हर रचना -आशुतोष

अपनी जाई

गोद में खिलाई

लाडली सी बिटिया

जो कभी फूल

तो कभी चाँद नजर आती है/

जिसके लिए पिता का पितृत्व

और माँ की ममता

पलकें बिछाते हैं;

किन्तु उसी लाडली के

यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही,

उसके सुखी जीवन की कामना में जब

उसके हमसफ़र की तलाश की जाती है/

तब उसके चाल चलन

उसकी बोली , उसकी शिक्षा

रंग रूप , कद काठी

सब कुछ जांची परखी जाती है .....

किसी की नजर तलाशती है

उसमे काम की क्षमता

कोई ढूंढता है… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on March 4, 2017 at 11:33am — 9 Comments

छोटे पेट वाले (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

बेटे के ही नहीं, बिटिया के भी अरमान पूरे करने थे। बच्चों की ज़िद पर गांव से अपना अनचाहा, लेकिन बच्चों व पत्नी का मनचाहा पलायन कर तो लिया था, लेकिन शहर की न तो आबो-हवा रास आ रही थी, न ही शहर वालों के आचरण और कटाक्ष वगैरह! किसी तरह किराए के कमरे में बच्चों के साथ ठहरे हुए थे। सुबह चार बजे उन्हें पढ़ने के लिए जगाकर आज साइकल उठायी और चल पड़े लाखन बाबू किसी मन चाही तलाश में। कुछ किलोमीटर दूर जाकर एक लम्बी सी साँस लेकर बड़बड़ाने लगे "हे भगवान, आज साँस लेना अच्छा लग रहा है इस हरियाली में! अच्छा हुआ कि… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 3, 2017 at 7:50pm — 9 Comments

दर्द के निशाँ ....

दर्द के निशाँ ....

दर

खुला रहा

तमाम शब

किसी के

इंतज़ार में

पलकें

खुली रहीं

तमाम शब्

किसी के

इंतज़ार में

कान

बैचैन रहे

तमाम शब्

तारीकियों में ग़ुम

किसी की

आहटों के

इंतज़ार में

शब्

करती रही

इंतज़ार

तमाम शब्

वस्ले-सहर का

मगर

वाह रे ऊपर वाले

वस्ल से पहले ही

तू

ज़ीस्त को

इंतज़ार का हासिल

बता देता है

मंज़िल से पहले…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 3, 2017 at 1:39pm — 6 Comments

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है

2122 2122 2122 212



पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।

बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।



मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।



उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।

बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।



वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।

खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।



जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।

"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने…

Continue

Added by आशीष यादव on March 3, 2017 at 12:00pm — 18 Comments

मैंने तन्हाई को भी पाला है। गजल

बह्र:- 2122-1212-22

जिसके तलवे में निकला छाला है।।
घर उसी हौसले ने पाला है।।।

पहले टूटा तिरा वही रिश्ता।
नौ महीने जिसे सभाला है।।

बाद मुद्दत के आज लौटी हो।
मौत कितना तुम्हे खंगाला है।।

मुश्क!.. ये ऐतबार देती है।
दिल नही जी जेहन भीआला है।।

साथ मेरे ही लौट आती है।
मैंने तन्हाई को भी पाला है।।

अप्रकाशित/ मौलिक
आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 3, 2017 at 9:30am — 8 Comments

फागुनी हाइकु

1.

आया फागुन
भँवरों की गुंँजार
छाई बहार ।

.
2.

मन मयूर
पलाश हुआ मस्त
भँवरें व्यस्त ।

.
3.

रंगों की छटा
मस्ती भरी उमंग
थिरके अंग ।


4.

आम बौराए
उड़ा गुलाबी रंग
है हुड़दंग ।


5.

दिशा बेहाल
फूलों उड़ी सुगंध
बने संबंध ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 1, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल नूर की : इश्क़ हुआ है क्या?

22. 22. 22. 22. 22. 22. 2



तन्हा शाम बिताते हो
तुम, इश्क़ हुआ है क्या?

मंज़र में खो जाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?

.

बारिश से पहले बादल पर अपनी आँखों से,

कोई अक्स बनाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?



ज़िक्र किसी का आये तो फूलों से खिलते हो,

शर्माते सकुचाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?

.

होटों पर मुस्कान बिना कारण आ जाती है,

बेकारण झुँझलाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?-…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 1, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

अनबहा समंदर ....

अनबहा समंदर ....

थी

गीली

तुम्हारी भी

आंखें



थी

गीली

हमारी भी

आंखें



बस

फ़र्क ये रहा

कि तुमने कह दी

अपने दिल की बात

हम पर गिरा के

जज़्बातों से लबरेज़

लावे सा गर्म

एक आंसू

और

हमें

न मिल सका

वक़्ते रुख़सत से

एक लम्हा

अपने जज़्बात

चश्म से

बयाँ करने का

चल दिए

अफ़सुर्दा सी आँखों में समेटे

जज़्बातों का

अनबहा

समंदर

सुशील सरना…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 1, 2017 at 1:05pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
चुगलियाँ कर बैठी आँखें और हैरानी मेरी (ग़ज़ल 'राज'

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

कितने रिश्ते तोड़ आई तल्ख़ मनमानी मेरी

क्यूँ गवारा हो किसी को अब परेशानी मेरी

 

शमअ के पहलू में रख कर जान  परवाना  कहे

इक कहानी खुद लिखेगी अब ये कुर्बानी मेरी

 

रूबरू आये तो धोका दे गया मेरा नकाब

चुगलियाँ कर बैठी आँखें और हैरानी मेरी  

 

टांक दो दिलकश सितारे कहकशाँ से तोड़कर

बोलती है अब्र से देखो चुनर धानी मेरी

 

शह्र भर में कू ब कू तक हो गई रुस्वाइयाँ

कर गई बर्बाद मुझको…

Continue

Added by rajesh kumari on March 1, 2017 at 11:30am — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जो अपने ख्वाब के लिए जाँ से गुज़र गए

221 2121 1221 212

.

जो अपने ख्वाब के लिए जाँ से गुज़र गए

खुद ख़्वाब बनके सबके दिलों में उतर गए

 

थोड़ा असर था वक्त का थोड़ी मेरी शिकस्त

जो ज़ीस्त से जु़ड़े थे वो अहसास मर गए

 

रिश्तों पे चढ़ गया है मुलम्मा फ़रेब का

अब जाने रंग कुदरती सारे किधर गए

 

ये सोच ही रहा था कि मैं क्या नया लिखूँ

फिर से वही चराग़ वरक़ पर उभर गए

 

बिखरे हुए थे दर्द तुम्हारी किताब में

दिल से गुज़र के वो मेरी आँखों…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2017 at 10:30am — 8 Comments

अस्तित्व को ....

अस्तित्व को ....

जगाते हैं 
सारी सारी रात 
तेरे प्रेम में भीगे 
वो शब्द 
जो तेरे उँगलियों ने 
अपने स्पर्श से 
मेरे ज़िस्म पर 
छोड़े थे 
ढूंढती हूँ 
तब से आज तक 
तेरे बाहुपाश में 
विलीन हुए 
अपने 
अस्तित्व को

सुशील सरना 
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on February 28, 2017 at 5:50pm — 6 Comments

सूंदर है हर रचना

सुंदर है हर रचना

रवि! बड़े परेशान लग रहे हो -क्या बात है"-रवि के जिगरी दोस्त अनिल ने बड़े ही सहज भाव से पूछा। "कुछ नहीं- बस यूँ ही" प्रत्यूतर में रवि ने कहा।"अरे!कुछ तो होगा ....तभी तो..."अनिल ने रवि ने वास्तविक कारण जानने के उद्देश्य से दुबारा पूंछा।"भाई जी-बस यूँ ही-अपनी नयी रचनाओं को लेकर परेशान था,अथक प्रयास के बाद भी रचनाओ में वो सुंदरता नहीं दिख पा रही है, जो सुंदरता के मानदंडों पर खरी उतर सके"अनिल को अपनी परेशानी से अवगत कराते हुए रवि न जवाब दिया।कुछ देर गंभीरता के साथ सोचने के बाद… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on February 28, 2017 at 11:40am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -है बोलने का मुझे इख़्तियार, कह दूँ क्या - ( गिरिराज )

1212   1122   1212    22 /122

सुनें वो गर नहीं,तो बार बार कह दूँ क्या

है बोलने का मुझे इख़्तियार, कह दूँ क्या

 

शज़र उदास है , पत्ते हैं ज़र्द रू , सूखे

निजाम ए बाग़ है पूछे , बहार कह दूँ क्या

 

कहाँ तलाश करूँ रूह के मरासिम मैं

लिपट रहे हैं महज़ जिस्म, प्यार कह दूँ क्या

 

यूँ तो मैं जीत गया मामला अदालत में

शिकश्ता घर मुझे पूछे है, हार कह दूँ क्या

 

यूँ मुश्तहर तो हुआ पैरहन ज़माने में

हुआ है ज़िस्म का…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on February 27, 2017 at 7:30am — 25 Comments

समझ

समझता था ख़ुद को ज़र्रे से भी कमतर मगर

मिला वज़ूद से तो सैलाब निकला...



ज़ेहन में पड़े हैं अब भी बहुत से किर्च मगर

बहुतों के हिसाब से आफ़ताब निकला...



ढूंढा चाँद को सबने फ़क़त मगर

आँखवाला नहीं कोई भी जनाब निकला...



जाते हैं रस्ते से सब ही इसी तरह

कुछ के पैरों से रस्ता बेहिसाब निकला...



निकला न करो छुप कर हमसे मेरे नसीब

तुमसे भी कभी मेरा इख़्तियार निकला...



फ़ुरसत के पल न ढूंढा करो मिलने के

जब जब रहा ज़ेहन में तेरा दीदार…

Continue

Added by ASHUTOSH JHA on February 27, 2017 at 12:00am — 4 Comments

ग़ज़ल...आँसू तभी छलक पड़े बेबस किसान के

221 2121 1221 212
.
ये बेरुखी ये ज़ुल्म सितम आसमान के
आँसू तभी छलक पड़े बेबस किसान के

दिल में छुपा लिये थे सभी गम जहान के
रुख पे नुमायाँ हो गए लम्हे थकान के

वीरां है मुददतों से मगर टूटता नहीं
ये हौंसले तो देखिये जर्जर मकान के

है मजहबी अलाव, सुलगते सभी बशर
बदहाल गाँव घर हुए भारत महान के

वो अनमनी सबा, हुआ रंजूर ये चमन
निकली लवों से आह किसी बेजुबान के
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 26, 2017 at 9:00pm — 9 Comments

खबर--

बीस साल बाद आज जोखन लौटा था गाँव, कितनी बार घरवालों ने बुलाया, कितने प्रयोजन पड़े, लेकिन जोखन ने कभी भी गाँव की तरफ जाने का नाम नहीं लिया था| कितनी बार लोगों ने पूछा, लेकिन कभी उसने वजह नहीं बताया| आज गाँव में आकर उसे सब कुछ बदला बदला लग रहा था, कुछ भी पहचाना नहीं लग रहा था| पिताजी से हाल चाल करके वह गाँव में घूमने निकला और कुछ ही देर में गाँव के बाहर खेतों में खड़ा था| खेत भी अब खेत कम, प्लाट ज्यादा लग रहे थे| खेतों को पार करता हुआ वह बगल के गाँव के रास्ते पर चल पड़ा| कभी पगडण्डी जैसा रास्ता…

Continue

Added by विनय कुमार on February 26, 2017 at 9:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल

बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आखिर
२१२/२१२/२१२/२

रहनुमाई की बरसात है क्या।
फिर चुनाओं के हालात हैं क्या।

झुठ भी बोलो अगर तो सही है,
ये सियासत के शहरात है क्या।

शह्र मे आग है फिर पुरानी ,
दंगो से फिर ये हालात है क्या।

चीखें फिर से सुनाई दे कोई,
बहनों के लूटे अस्मात है क्या।

लोग कितने मजे से यहाँ हैं,
शह्र के ये हवालात हैं क्या।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Hemant kumar on February 26, 2017 at 8:00pm — 6 Comments

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