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बात जब भी शहर में -- ..डा० विजय शंकर

बात जब भी शहर में

अंधेरा मिटाने की होती है ,

तेरे घर की रौशनी कुछ

और बढ़ा दी जाती है |

बात जब भी मजबूर

सताये लोगो को

न्याय दिलाने की होती है

तुझे एक नयी जमानत

और दिला दी जाती है |्

तेरे हर जुल्म हर गुनाह के साथ ,

तेरी शोहरत बढ़ाई जाती है ,

तेरे सताये गुमनाम अंधेरों में ,

सिमट जाते हैं , और

चकाचौंध रौशनी कर तेरे

चेहरे की रौनक बढ़ाई जाती है |

तेरी मौज , तेरी तफरीह में जो

मिट गये , उन्हें कफन भी नहीं मिला ,

तेरे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 10, 2014 at 10:57am — 11 Comments

नीयत.....(लघु-कथा)

“माँ !  मैं तुम्हारे और दोनों भाइयों के हाथ जोडती हूँ, मुझे कुछ पैसे दे दो या दिलवा दो.. भगवान् के लिए मदद करो.. चार दिनों बाद बेटी की शादी है..”



“देखो दीदी..! .. हमने हर समय तुम्हारा बहुत साथ दिया है.. यहाँ तक कि तुम्हारी दोनों बेटियों की शादी का पूरा खर्च वहन करने की सोचे थे. बेटे को भी काम-धंधे पर लगवा देंगे..  लेकिन तुमने निकम्मे जीजाजी.. और लोगो के कहने पर हम पर ही मुकदमा दायर कर दिया.. ? क्या तो हिस्सा पाने की खातिर ?!! ”



“माँ, तुम तो कुछ बोलो, तुम्ही समझाओ न.. इन…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on June 10, 2014 at 1:00am — 14 Comments

तुम

तुम नीलाभ
नीरव गगन में
ध्रुवतारे की तरह
अविचल
कैसे रह लेते हो?
शायद तुममें
मानव-मन की
विचलन
का बोध नहीं .

या स्थितिप्रज्ञ हो गए हो.

विजयप्रकाश
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 10, 2014 at 12:00am — 11 Comments

ट्रैफिक नियम [दोहावली]

दायें बायें देख के, खुद को कर तैयार

राह सुरक्षित हो तभी, करना उसको पार ||

सड़क सुरक्षा के लिए, नियमों का कर ध्यान

राह बनेगी सरल तब और मिलेगा मान ||



ट्रैफिक सिग्नल के नियम, रखते हैं जो ध्यान

मंजिल मिलती है उन्हें, पथ होता आसान ||

तीन रंग का खेल है ,समझ न इसको खेल

पीला नीचे लाल के संग हरे का मेल ||

दिखे लाल बत्ती अगर, झट से रुकना यार

खतरे का हो सामना, किया अगर जो पार ||

पीली बत्ती देख के, हो जाना…

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Added by Sarita Bhatia on June 9, 2014 at 8:20pm — 12 Comments

आदमी हूँ सनम कोई तोता नहीं

सोचते ही रहे खेत जोता नहीं

प्‍यार के फूल क्‍यों कोई बोता नहीं



लुट गई देख अबला कि अस्‍मत यहाँ

शर्म से कोई आँखे भिगोता नहीं



तोड़ कर कोई जाता न दिल प्‍यार में

साथ अपनो का अब कोई खोता नहीं



सोच हैरान क्‍यों रोज इज्‍जत लुटे

चैन की नी़ंद क्‍यो़ं कोई सोता नहीं



क्‍या भरोसा करें हम किसी का सनम

आदमी आदमी का ही होता नहीं



बात में बात सबकी मिलाता रहूँ

आदमी हूँ सनम कोई तोता नहीं

मौलिक एवं…

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Added by Akhand Gahmari on June 7, 2014 at 6:30pm — 3 Comments

गजल-पीठ पर वो बार करने का हुनर

आँसुओं से हम गजल लिखते रहे

कागजों में दर्द बन बिकते रहे

वो पराये हो चुके थे अब तलक

और हम अपना समझ झुकते रहे

पीठ पर वो बार करने का हुनर

उम्र भर हम याद ही करते रहे

हद से ज्यादा हम हुये जब गमजदा 

बारबा वो खत तेरा पढ़ते रहे 

तू गया कितने जलाकर आशना

आशना वो आज तक जलते रहे

हम समझ कर आदमी को आदमी

साथ हम शैतान के चलते रहे

उमेश कटारा

मौलिक व अप्रकाशित…

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Added by umesh katara on June 7, 2014 at 3:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सोच बदलेगी न जब तक.........अरुण कुमार निगम

संस्कारों की कमी से , मनचले होते रहेंगे

कुछ न बदलेगा जहां में , हादसे होते रहेंगे.



दोष इसका दोष उसका मूल बातें गौण सारी

तालियाँ जब तक बजेंगी , चोंचले होते रहेंगे .



मौन धरने उग्र रैली , जल बुझेगी मोमबत्ती

आड़ में कुछ बाड़ में कुछ सामने होते रहेंगे .



आबकारी लाभकारी लाडला सुत है कमाऊ

और  भी  तो  रास्ते  हैं , फायदे  होते रहेंगे .



ये गवाही वो गवाही, है बहुत ही चाल धीमी

जानता  है  हर  दरिंदा , फैसले  होते …

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Added by अरुण कुमार निगम on June 7, 2014 at 12:00am — 14 Comments

मेरा ब्लड ग्रुप?... याद नहीं है! (लघुकथा)

एक अस्पताल में भर्ती बुजुर्ग की आप बीती---उनके ही मुख से-

"मेरे दो लडके हैं, दोनों एक्सपोर्ट इम्पोर्ट का कारोबार करते हैं.

दो लड़कियां विदेश में हैं, दामाद वहीं सेटल हो गए हैं.

मेरा एक भगीना बड़े अस्पताल में डॉक्टर है ...मुझे उसका टेलीफोन नंबर नहीं मिल रहा ..आप पताकर बताएँगे क्या?

आज मेरे घाव का ओपेरेसन होनेवाला है. मेरा लड़का आयेगा ...ओपेरेसन के कागजात पर हस्ताक्षर करने."

लड़का आया भी और हस्ताक्षर कर चुपचाप चला गया. मैंने महसूस किया दोनों में कोई विशेष बात…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 6, 2014 at 8:00pm — 21 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
किताब : चार क्षणिकाएँ // --सौरभ

1.

शेल्फ़ किताबों के लिए हो सकती है

किताबें शेल्फ़ के लिए नहीं होतीं

शेल्फ़ में किताबों को रख छोड़ना

किताबों की सत्ता का अपमान है.

 

2.

कुछ पृष्ठों के कोने वो मोड़ देता है…

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Added by Saurabh Pandey on June 6, 2014 at 5:30pm — 43 Comments

गिड़गिड़ाने से बची कब लाज तेरी द्रोपदी-ग़ज़ल

2122    2122    2122    212

***

शब्द   अबला  तीर  में  अब  नार  ढलना  चाहिए

हर दुशासन का कफन  खुद तू ने  सिलना चाहिए

***

लूटता  हो  जब  तुम्हारी  लाज  कोई  उस समय

अश्क  आँखों   से  नहीं  शोला  निकलना  चाहिए

***

गिड़गिड़ाने   से   बची   कब   लाज  तेरी  द्रोपदी

वक्त पर उसको सबक कुछ ठोस मिलना चाहिए

**

हर समय तो आ नहीं सकता कन्हैया तुझ तलक

काली बन खुद  रक्त  बीजों  को  कुचलना चाहिए

**

फूल बनकर  दे महक  उपवन को  यूँ तो  रोज तू…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2014 at 12:47pm — 31 Comments

इस अन्धकार में कितनी सदियाँ और बिताना बाकी है ?

"चीख चीख कर पूछ रहा है ,ये उद्वेलित मन मेरा मुझसे ,

इस अन्धकार में कितनी सदियाँ और बिताना बाकी है ?

चूड़ियाँ पहने पड़ी इस सुषुप्त व्यवस्था को धिक्कारने में

अब भी यूँ ही कितनी मोमबत्तियाँ और जलाना बाकी है ?

इस कुण्ठित दानवता के कुकृत्यों से लज्जित ,

आज मानवता कितनी बेबस पानी पानी है ?

मोड़ मोड़ पर खड़े ये दुर्योधन और दु:शासन ,

दुर्गा पूजती सभ्यता की क्या यही निशानी है ?

कोरे कागज़ी कानूनों के फूल चढ़ाये ,यूँ अर्थियाँ उठाते,

कितने…

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Added by Kedia Chhirag on June 6, 2014 at 9:30am — 4 Comments

"नूर" की ग़ज़ल -देख तेरा जो हाल है प्यारे

२१२२ १२१२ २२/११ २  

.

देख तेरा जो हाल है प्यारे

ज़िन्दगी का सवाल है प्यारे.

.

लोग मुर्दा पड़े हैं बस्ती में,

बस तुझी में उबाल है प्यारे.

.

आम कहता है ख़ुद को जो इंसाँ,

उसकी रंगत तो लाल है प्यारे.

.

उसकी थाली में मुझ से ज़्यादा घी,

बस यही इक मलाल है प्यारे. 

.

हम ने अपना लहू भी वार दिया,

सबको लगता गुलाल है प्यारे.   

.

ख़ाक ही ख़ाक बस उड़ेगी अब,

ये हवाओं की चाल है प्यारे. 

.

अब तो…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 5, 2014 at 9:30pm — 21 Comments

मेंह बाबा मै तुम्हे रिझाऊं

विरह तुम्हारा सह न पाऊं, कैसे मै मन को समझाऊ

तुमसे ही मै जीवन पाऊं, तुमबिन न स्वागत कर पाऊं

बिछे ह्रदय में पलक-पाँवड़े,मेंह बाबा मै तुम्हे रिझाऊं 

ताल तलैया जग के सूखे,स्वर्ग लोक से…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2014 at 6:00pm — 16 Comments

अपने मौसम को ………

अपने मौसम को ………

तुम ही तो थे

मेरे नेत्रों के वातायन से

असमय विरह पीर को

बरसाने वाले

मुझे अपने बाहुपाश में

प्रेम के अलौकिक सुख का

परिचय कराने वाले

मेरी झोली में विरह पलों को डालने वाले

क्या आलिंगन के वो मधुपल भ्रम थे

पर्दे के पीछे मेरी विरह वेदना को

सिसकियों में पिघलते

मूक बन कर देखते रहे

क्यों एक बार भी हाथ बढ़ा कर

मेरे व्यथित हृदय को

ढाढस…

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Added by Sushil Sarna on June 5, 2014 at 4:56pm — 16 Comments

ऐसा घर बनातें हैं

इन कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना

जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनातें हैं

ना ही रोशनी आये ना खुशबु ही बिखर पाये

हालात देखकर घर की पक्षी भी लजातें हैं

दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों

पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है

टी बी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं

ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों

भूले से भी मेहमाँ को ना नहीं घर में टिकाते हैं

अब…

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Added by Madan Mohan saxena on June 5, 2014 at 3:09pm — 9 Comments

बेटी

छप्पय छंद
बेटी होना पाप, त्रास में जीवन सारा ।
जन्म पूर्व ही घात, उसे कितनों ने मारा ।।
कंपित होती सांस, वायु है दूषित सारी ।
छेड़ छाड़ हर पाद, नगर गांव बलात्कारी ।।
गली गली में भेडि़या, नोचें बेटी मांस को ।
जीवित होकर लाश हैं, बेटी सह  इस त्रास को ।।
.................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on June 5, 2014 at 3:00pm — 14 Comments

जिया जरे दिन रात हे पीऊ

जिया जरे दिन रात हे पीऊ

तड़प के रात बिताऊं

----------------------------------

भोर उठूँ जब बिस्तर खाली

गहरी सांस ले मन समझाऊँ

दुल्हन जब कमरे से झाँकू

पल-पल नैन मिलाती

अब हर आहट बाहर धाती

'शून्य' ताक बस नैन भिगोती

फफक -फफक मै रो पड़ती पिय !

फिर जी को समझाती

जी की शक्ति आधी होती

दुर्बल काया कैसे दिवस बिताऊं ?

जिया जरे दिन रात हे पीऊ

तड़प के रात…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 5, 2014 at 1:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं कभी तुझसे बिछड़ने का न मंजर देखूँ

2122   2122  2122  22

मैं कभी तुझसे बिछुड़ने का न मंजर देखूँ

मछलियों से ना कभी ख़ाली समंदर देखूँ

 

कब जमीं आकाश दोनों इस जहाँ में मिलते

मैं ये  संगम तो सदा दिल के ही अन्दर देखूँ

 

हर सितारा  तेरी किस्मत का बुलंदी पर हो

 मैं  न कोई हार से टूटा सिकंदर देखूँ

 

झेल लूँ मैं वार  खुद तेरी परेशानी के  

जीस्त में गड़ता हुआ ग़म का न खंजर देखूँ

 

जिंदगी में काश कोई दिन न आये…

Continue

Added by rajesh kumari on June 5, 2014 at 10:58am — 29 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल

जिन्होंने रास्तों पर खुद कभी चलकर नहीं देखा

वही कहते हैं हमने मील का पत्थर नहीं देखा

.

मिलाकर हाँथ अक्सर मुस्कुराते हैं सियासतदाँ

छिपा क्या मुस्कराहट के कभी भीतर नहीं देखा

.

उन्हें गर्मी का अब होने लगवा अहसास शायद कुछ

कई दिन हो गए उनको लिए मफलर नहीं देखा

.

सड़क पर आ गई थी पूरी दिल्ली एक दिन लेकिन

बदायूं को तो अब तक मैंने सड़कों पर नहीं देखा

.

फ़क़त सुनकर तआर्रुफ़ हो गया कितना परेशां वो

अभी तो उसने मेरा कोई भी तेवर नहीं…

Continue

Added by Rana Pratap Singh on June 5, 2014 at 10:26am — 19 Comments

प्रदूषित जीवन

{विश्व पर्यावरण दिवस पर सादर प्रस्तुत ]



एक कहावत है जो हिंदी आधारित लगभग सभी आंचलिक भाषाओँ में प्रचलित है , “ जेई डाढ बैसी ,ओकरे काटी |” , जब विद्योत्तमा से परास्त विद्वानों ने एक महामूर्ख ढूंढने की चेष्टा कियी तो उन्हें सबसे मूर्ख वही लगा था जो उसी डाल को काट रहा था जिसपर बैठा था |कभी सोचा है कि हम सभी प्रदुषण की दृष्टि से कुछ इसी श्रेणी के बनते जा रहे हैं |

यह तो परिपाक है कि हमारा शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से निर्मित है – आकाश , हवा, आग, पानी और धरती , जो हमारे पांच… Continue

Added by विजय मिश्र on June 5, 2014 at 9:51am — 25 Comments

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