For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,172)

'आम चुनाव और नेता'

आल्हा छंद (16, 15 अंत में गुरु लघु)

लोकतंत्र के महापर्व में, हुए सभी नेता तैयार

शब्द बाण से वार करें वे, छोड़ छाड़ के शिष्टाचार।।

युध्द भूमि सा लगता भारत, जहाँ मचा है हाहाकार

येन केन पाने को सत्ता, अपशब्दों की हो बौछार।।

खून करें वे लोकतंत्र का, जुमले हैं इनके हथियार

हित जनता का भूल गए वे, ऐसा इनका है आचार

हे जन मन तुम जाग उठो अब, व्यर्थ न जाये यह त्योहार

ऐसा कुछ इस बार करो तुम, राजनीति बदले आकार ।।

रंग बराबर बदलें ऐसे,…

Continue

Added by Vivek Pandey Dwij on April 13, 2019 at 8:27am — 6 Comments

महाभुजंगप्रयात सवैया-रामबली गुप्ता

सूत्र-आठ यगण प्रति पद; 122x8

चुनो मार्ग सच्चा करो कर्म अच्छे जहां में तुम्हारा सदा नाम होगा।

करो यत्न श्रद्धा व निष्ठा भरे तो न पूरा भला कौन सा काम होगा।।

न निर्बाध है लक्ष्य की साधना जूझना मुश्किलों से सरे-आम होगा।

इन्हें जीतना पीढ़ियों के लिए भी तुम्हारा नया एक पैगाम होगा।।1।।

करे सामना धैर्य से मुश्किलों का न कर्तव्य से पैर पीछे हटाए।

नहीं हार से हार माने जहां में कभी कोशिशों से न जो जी चुराए।।

अँधेरा घना या निशा हो घनेरी…

Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 13, 2019 at 7:32am — 4 Comments

मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है (४२ )

(१२१२२ १२१२२ १२१२२ १२१२२ )

.

मेरे वतन की सियासतों के क़मर को राहू निगल रहा है 

उक़ूल पर ज्यों पड़े हैं ताले अदब का ख़ुर्शीद ढल रहा है 

**

किसी की माँ का नहीं है रिश्ता किसी भी दल से मगर यहाँ पर

ये पाक रिश्ता भरी सभा में बिना सबब ही उछल रहा है

**

किसी ने की याद सात पुश्तें किसी को कह डाले चोर कोई

जुबान बस में नहीं किसी की जुबाँ का लहज़ा बदल रहा है …

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 13, 2019 at 1:00am — 3 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 12

मुहब्बत की ख़ातिर ज़िगर कीजिये ।

अभी से न यूँ चश्मे तर कीजिये ।।

गुजारा तभी है चमन में हुजूऱ ।

हर इक ज़ुल्म को अपने सर कीजिये ।।

करेगी हक़ीक़त बयां जिंदगी ।

मेरे साथ कुछ दिन सफ़र कीजिये ।।

पहुँच जाऊं मैं रूह तक आपकी ।

ज़रा थोड़ी आसां डगर कीजिये ।।

वो पढ़ते हैं जब खत के हर हर्फ़ को ।

तो मज़मून क्यूँ मुख़्तसर कीजिए ।।

लगे मुन्तज़िर गर…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 12, 2019 at 10:34pm — 2 Comments

कुण्डलिया छंद-

ढलती जाती उम्र में, डगमग होती नाव।

कभी-कभी नैराश्य के, आ जाते हैं भाव।।

आ जाते हैं भाव, और दुख होता भारी।

लगने लगती व्यर्थ, तभी यह दुनियादारी।।

जीर्णशीर्ण यह नाव,चले हिचकोले खाती।

घिरता है अवसाद, उम्र जब ढलती जाती।।

2-

माला फेरी उम्रभर, तीरथ किए हजार।

काम क्रोध मद मोह से, पाया कभी न पार।।

पाया कभी न पार, जिन्दगी व्यर्थ गँवाई।

बीत गई अब उम्र, विदा की बेला आई।।

मन में रखकर द्वेष, बैर अपनों से पाला।

धुला न मन का मैल,जपी निसदिन ही…

Continue

Added by Hariom Shrivastava on April 12, 2019 at 9:22pm — 6 Comments

उम्र....

उम्र ...



गर्भ से चलती है

धरती पर पलती है

आँखों को मलती है

संग साँसों के चलती है

उम्र

जिस्म की दासी है

युग युग से प्यासी है

ख़ुशी और उदासी है

छलती ही जाती है

उम्र

मस्तानी जवानी है

अधूरी सी कहानी है

लहरों की रवानी है

रेत सी फिसल जाती है

उम्र

काल की दुपहरी है

चिताओं पर ठहरी है

ज़माने से बहरी है

धधक जाती है चुपके से

उम्र

कल तक जो चलती थी

आशाओं…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 12, 2019 at 5:16pm — 4 Comments

देशभक्ति का चोला

देशभक्ति का चोला पहन

देश का युवा घूम रहा

मतवाला होके डोल रहा

ऐसा देशभक्ति में डूब रहा||

 

घूम घूम कर,

झूम झूम कर

वीरो की गाथा खोज रहा

ऐसा देशभक्ति में डूब रहा||

 

बलिदान को अपने वीरो के

हर पल हर क्षण को

रम रमा कर यादों में अपनी

खोया-खोया फिर रहा||

ऐसा देशभक्ति में डूब रहा||

 

"मौलिक और अप्रकाशित"

 

Added by PHOOL SINGH on April 12, 2019 at 3:30pm — No Comments

कर्म ओर किस्मत

उम्र संग ये बढती है

कर्म से अपने चलती है

परीक्षा धैर्य की लेकर

मार्ग प्रशस्त ये करती है||

 

कर्म के पथ पर चढ़कर

ये, अगले कदम को रखती है

हार-जीत के थपेड़े दे देकर

निखार हुनर में करती है||

 

त्रुटी को सुधार के तेरी

आत्मविश्वास से बढ़ती है

उतार चढ़ाव के मार्ग बना

हर परस्थितियो लड़ने को  

तैयार हमें ये करती है||

 

तरक्की की सीढी चढ़े सदा

लक्ष्य निर्धारित करती है

उठा-गिरा…

Continue

Added by PHOOL SINGH on April 12, 2019 at 3:05pm — 2 Comments

कुछ क्षणिकाएं :

कुछ क्षणिकाएं :

उल्फ़त की निशानी

आँख में

थिरकता

बूँद भर पानी

...........................

समाज

अंधेरों के घेरों में

सभ्यता

न साँझ में

न सवेरों में

..........................

माँ की लाश

बिलखता विश्वास

टूटा आकाश

बेटी के पास

.............................

जीवन रंग

हुए बदरंग

रिश्तों के संग

...............................

दृष्टि में विकार

बढ़ता व्यभिचार

नारी…

Added by Sushil Sarna on April 11, 2019 at 7:51pm — 2 Comments

जीना हमकों सिखा दिया

वक्त की उठक बैटक ने

जीना हमकों सिखा दिया

जिन्दगी की पेचीदा परिस्थितयों से

लड़ना हमकों सिखा दिया

जीना हमकों सिखा दिया||

 

मुखौटों में छुपे चहरों से

रूबरू हमकों करा दिया

क्या कहेगी ये दुनियाँ

इस उलझन से जो छुड़ा दिया   

जीना हमकों सिखा दिया ||

 

लोग कहे तो हंसे हम

और कहे तो रोये

लोगों के हाथो चलती, जिंदगी को

खुल के जीना सिखा दिया

जीना हमकों सीखा दिया ||

 

साथ ना छोड़ेगे के…

Continue

Added by PHOOL SINGH on April 11, 2019 at 5:21pm — 3 Comments

पांच दोहे :

पांच दोहे :

माँ की पूजा जो करे, तज कर सारे काम।

उसके जीवन में सदा ,पूरन होते काम।।

जयकारों से गूँजता, है माँ का दरबार।

दरस मात्र से जीव का, होता बेड़ा पार।।



माँ के पावन नाम की, महिमा अपरम्पार।

बाल न बाँका भक्त का, कर पाता संसार।।



माँ की पूजा-अर्चना, करता जो निष्काम।

मिल जाता उस भक्त को , माँ का पावन धाम।।

चलकर नंगे पाँव जो, आता तेरे धाम।

पूरन होते जीव के, मुश्किल सारे काम।।

सुशील सरना…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 10, 2019 at 5:44pm — 8 Comments

नवरात्र पर दोहे

घर- घर हो घट स्थापना, लगे नए पंडाल

हर मन उल्लासित दिखे, ले पूजा की थाल।।

चैत्र मास नवरात्र में, हो माँ का गुण गान

दुर्गुण सारा जल उठे, हो इसका भी ध्यान।।

यह सारा संसार ही, माँ का है दरबार

माँ ही बस इक सत्य है, बाकी सब बेकार।।

बालक बृंद अबोध मैं, माँ ममता की खान

जैसा भी हूँ मैं अभी, रखना माँ तू ध्यान।।

माँ के ही सब लाल हम, माँ ही खेवनहार

दया दृष्टि जब माँ करे, हों भवसागर पार।।

(मौलिक व…

Continue

Added by Vivek Pandey Dwij on April 9, 2019 at 7:00pm — 6 Comments

संस्कार- लघुकथा

"हम तो आज भी पल्लू सरक जाए तो तुरंत ठीक कर लेते हैं. लेकिन ये आजकल की बहुरिया, मजाल है कि पल्लू सर पर टिके", रुक्मणि को नई बहू का कपड़ा पहनना बिलकुल नहीं भा रहा था और वह रवि के सामने भी कहने से नहीं चूकीं.

रवि ने पलटकर उनकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिए. वह भी नई बहू को पिछले दो दिन से बमुश्किल साड़ी सँभालते देख रहे थे.

"अब हर आदमी तुम्हारी तरह तो नहीं बन सकता ना राजेश की अम्मा, तुमको पता तो है कि बहू शहर में नौकरी करती है और इसके नीचे कई लोग काम भी करते हैं", रवि ने बात सँभालने की कोशिश…

Continue

Added by विनय कुमार on April 9, 2019 at 6:18pm — 12 Comments

'आह क्या सीन है!' (लघुकथा) :

कई दिनों देश-विदेश यात्राएं कर भिन्न-भिन्न परिस्थितियों और परिदृश्यों की साक्षी होने के बाद एक मशहूर पुस्तकालय का मुआयना करते हुए उन दोनों ने अपनी लम्बी चुप्पी यूं तोड़ ही दी :



"यह भी सभ्य लोगों का ही एक अड्डा है!"



"बाहर से इंसान कुछ भी दिखे, अंदर से तो प्राय: उसका चरित्र भद्दा है!" सभ्यता की बात पर असभ्यता ने कहा।



"संक्रमण-काल है! वैश्वीकरण में मिलावट का दौर है! स्वार्थी तकनीकी तरक़्क़ी का मुद्दा है!" एक आह भरते हुए सभ्यता ने कहा और पुस्तकालय में सलीके से…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2019 at 9:23pm — 7 Comments

हद से गुज़र गई हैं ख़ताएँ  -सलीम रज़ा रीवा

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

.

हद से गुज़र गई हैं ख़ताएँ तो क्या करें 

ऐसे में उनसे दूर ना जाएँ तो क्या करें 

oo

उसकी अना ने सारे तअल्लुक़ मिटा दिए 

उस बे-वफ़ा को भूल  जाएँ तो क्या करें   

oo

मीना भी तू है मय भी तू साक़ी भी जाम भी

आँखों में तेरी डूब न जाएँ तो क्या करें

oo

कश्ती को डूबने से बचाया बहुत मगर 

हो जाएं गर…

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on April 8, 2019 at 4:30pm — 10 Comments

"फ़ेम्अलि वाली सेल्फ़ी" (कविता) :

सेल्फ़ी-स्टिक से ले डाली रे, कुल्फ़ी वाली सेल्फ़ी।
हेल्द़ी-स्टिक दो खा डालीं रे, हम सब दिखते हेल्द़ी।।

मम्मी-पापा को भी लाओ, सेल्फ़ी लेंगी मम्मी।
कुल्फ़ी सब जी भर के खाओ, मम्मी वाली कुल्फ़ी।।

सर्दी-ज़ुकाम से क्या डरना, गर्मी वाली सर्दी।
ज़ल्दी से अब और खिलादो, ठंडी कुल्फ़ी ज़ल्दी।।

सेल्फ़ी-स्टिक से ले डाली रे, मस्ती वाली सेल्फ़ी।
ले ली दादा-दादी वाली, सेल्फ़ी सुंदर ले ली।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल,

और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकल

है लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,

आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकल

इस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सब

झूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकल

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर

काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

जाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन

नित नया जालिम जलाने आ रहा है…

Continue

Added by Dayaram Methani on April 8, 2019 at 2:01pm — 7 Comments

लो आ गईं छुट्टियां! (संस्मरण) :

लो फिर से गर्मियों की छुट्टियां आ गईं। दो महीने पहले से परिवारजन और बच्चे इन छुट्टियों के सही व नये इस्तेमाल के बारे में अपनी-अपनी राय दे रहे थे। बच्चों की योजनाओं पर बड़ों की व्यस्तताओं और योजनाओं के कारण बच्चों के मन के फैसले नहीं हो पा रहे थे। आम चुनावों का भी माहौल चल रहा था। किसी के मम्मी-पापा किसी ज़िम्मेदारी में फंसे थे, तो किसी के किसी और काम में। बहरहाल इन छुट्टियों के एक-एक दिन का सही इस्तेमाल होना बहुत ज़रूरी था।

मुझे फुरसत देख घर के और पड़ोस के बच्चों ने मुझे यह…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 7, 2019 at 10:34am — 3 Comments

नवगीत-वेदना तुझको बुलाऊँ-बृजेश कुमार 'ब्रज'

छा रहा नभ में अँधेरा

जुगनुओं  ने सूर्य घेरा

नेह भावों से  निचोड़ूँ  दीप  मैं घर घर  जलाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ

रो दिए वीरान पनघट

टूट के बिखरे हुए घट

हैं बहुत मुश्किल समय के ये थपेड़े सह न पाऊँ 

वेदना तुझको बुलाऊँ

अश्रुओं से सिक्त वीणा

न कहूँ अंतस की पीड़ा 

रिक्त भावों से पड़े तो किस तरह ये गीत गाऊँ

वेदना तुझको बुलाऊँ…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 7, 2019 at 10:30am — 8 Comments

पद प्रक्षालन - लघुकथा -

"माई,  अपने घर में एक मोटी  पुस्तक  थी।  रामायण । उसमें से  तूने एक प्रसंग सुनाया था  कि एक केवट था जो राम चंद्र जी को नाव में इसलिये नहीं बिठा रहा था कि उनके पैरों की धूल से उसकी नाव कहीं सुंदर स्त्री ना बन जाय अतः वह उनके पैर पखारने के बाद ही नाव में बैठाने की शर्त रखा था।"

"हाँ बेटा, रामायण में लिखा तो यही है। क्योंकि भगवान राम की चरण रज़ से एक पत्थर की शिला स्त्री बन गयी थी।"

"क्या सचमुच ऐसा संभव हुआ था?"

"हुआ तो ऐसा ही था मगर वह तो एक श्राप के कारण हुआ…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on April 6, 2019 at 11:30am — 14 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम् "
4 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"आदरणीय विजय निकोर जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
15 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Wednesday
amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
Tuesday
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
Tuesday
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Apr 11
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Apr 11
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service