बृहस्पति और राहू के टकराव से सभी बहुत व्यथित थेI जब भी बृहस्पति के शुभ कार्य प्रारंभ होते तो राहू शरारत करने से कोई अवसर न चूकताI और जब कभी बृहस्पति पाप कर्म पर अंकुश लगाने की कोशिश करते तो राहू कुपित हो जाताI न तो राहू अपनी क्रूरता व अहंकार त्यागने को तैयार था न ही बृहस्पति अपनी नेकी व सौम्यताI बृहस्पति के साधु स्वाभाव तथा राहू की क्रूरता व दंभ के मध्य प्रतिदिन होने वाले टकराव से पृथ्वी त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही थीI धर्म-कर्म के ह्रास से और बढते हुए पाप से त्रस्त देवगण ब्रह्मदेव के समक्ष…
ContinueAdded by योगराज प्रभाकर on January 29, 2016 at 3:30pm — 14 Comments
सागर की उठती गिरती लहरें, पथ पर चलना सिखा रही ।
ढूंढती पल पल किनारा, मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं ।
सारी व्यथा अपने मन की आपस में एक दूसरे से कहती ।
सागर की गहरी शांति के विरुद्ध रौद्र रूप भरकर बहती ।
ख़तरों से आगाह कराती मंज़िल से पहले कभी रुके नहीं ।
हर काल परिस्थिति में हमको जीवन लक्ष्य बता देती ।
घायल, व्यथित खतरों से खेल, किनारों से दांस्ता कहती ।
संदेशा मानव को देकर कुछ खट्टे मीठे अनुभव कहती ।
आदि से लेकर अंत तक का लेखा…
ContinueAdded by Ram Ashery on January 29, 2016 at 3:00pm — 6 Comments
2122 1122 1122 22
खूब परहेज भी करता है दिखाने के लिए
है जरूरत भी मगर प्यार जमाने के लिए /1
सोच मत सिर्फ बहाना है बहाने के लिए
वक्त है पास कहाँ तुझको मनाने के लिए /2
शौक पाला जो सितम हमने उठाने के लिए
आ गई धूप भी राहों में सताने के लिए /3
देख हालात को खुद ही तू जगा ले अब तो
कौन आएगा तुझे और जगाने के लिए /4
पढ़ सके तू जो अगर रोज किताबों सा पढ़
है नहीं बात कोई मुझ में छुपाने के लिए /5
कैसी किस्मत थी…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2016 at 10:55am — 12 Comments
Added by जयनित कुमार मेहता on January 28, 2016 at 8:58pm — 15 Comments
गोपाल की बीवी राधा सुबह से रट लगाये थी ,” शाम को जल्दी दुकान बंद कर के आ जाना!संकट मोचन चलेंगे!आपको जब पीलिया हुआ था तब मैंने मन्नत बोली थी कि आपके स्वस्थ होने पर सात कन्याओं को जिमाऊंगी, पर अभी हाथ थोडा तंग है,बीमारी में ज़्यादा खर्चा हो गया, फ़िर कभी देखेंगे! अभी तो एक सौ एक रुपये का प्रसाद चढाकर काम चला लेते हैं”!
गोपाल के आते ही दौनों स्कूटर पर मंदिर पहुंच गये!
दर्शन कर बाहर निकले तो राधा की नयी चप्पल गायब और गोपाल की ज़ेब से पर्स नदारद ! गनीमत थी कि राधा के पर्स में हज़ार दो…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on January 28, 2016 at 6:30pm — 12 Comments
१२२२/१२२२/१२२२/१२२२
.
कभी बदनाम गलियों में भटकती हैं तमन्नाएँ,
कभी खुद की निगाहों में खटकती हैं तमन्नाएँ.
.
हवस की मकड़ियाँ बुनती है दिल में जाल हसरत के,
जहाँ मौका मिला, आकर, अटकती है तमन्नाएँ.
.
तमन्नाओं का अंधड़ रोक पाना है बहुत मुश्किल,
मगर दिल में बसा हो रब, ठिठकती हैं तमन्नाएँ.
.
कोई इंसान जब अपनी ख़ुदी को जीत लेता है,
तो फिर क़दमों में उस के, सर पटकती हैं तमन्नाएँ.
.
सफ़र जब जिस्म से बाहर का करने रूह चलती है,
चिता की…
Added by Nilesh Shevgaonkar on January 28, 2016 at 6:00pm — 16 Comments
मेरे घर के बगल कौन है ?
सन्त महाजन या आतंकी
मंथन आओ कर लें प्यारे
भूख है हम को कितनी धन की ,,,
-------------------------------------
प्रेम क्रोध या घृणा ईर्ष्या
जांचो परखो क्या कुछ देते
मारो-काटो ले लो बदला ??
जीवन क्षण भंगुर कर देते ..
-----------------------------------
मानव योनि है दुष्कर पाए
संस्कार भारत भू आये
अच्छा -अच्छाई आ चुन लें
घर आँगन से नीव ये रख लें…
ContinueAdded by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on January 28, 2016 at 1:30pm — 5 Comments
प्रिये,
सच तो ये है
जब तक मै रहूंगा ‘आदम’
और तुम ‘ईव’
तब तक हम खाते रहेंगे ‘सेब’
भोगते रहेंगे 'नर्क'
इससे तो बेहतर है
'मै' बन जाउं 'जंगल'
घना ओर बियाबान
तुम बहो उसमे
'नदी' सा हौले - हौले
या फिर मै
टंग जाउं आसमान मे
चॉद सा
और तुम बनो
मीठे पानी की झील
सांझ होते ही मै
उतर आउं जिसमे
चुपके से,
हिलूं। तैरूँ। इतराऊँ
सुबह होते ही फिर
टंग जाऊँ आसमान मे
या तो,
ऐसा करते हैं
मै बन जाता हूं…
Added by MUKESH SRIVASTAVA on January 28, 2016 at 11:48am — 7 Comments
रोपे जो थे फूल सब, लगते पेड़ बबूल !
काँटों बदले बीज सब, जो मन राखा शूल !!
जो मन राखा शूल, ध्यान में धारण कीजे !
मिलता वही प्रतिफल, ध्यान में जो धर लीजे !!
कहे हेम कविराय, बुरा क्यों मन में सोचे !
रोपे भले बबूल, मन से फूल ही रोपे !!
.
मौसम के यह ढंग भी, लगते बड़े विचित्र !
शरद ऋतु मेँ दिखते हैं, गर्मी के परिदृश्य !!
गर्मी के परिदृश्य, कि मौसम बहुत चिढ़ाता !
कभी वर्षा ऋतु में, सुखार है अति सताता !!
कहे हेम कविराय, घटाओ अभी…
Added by Hem Chandra Jha on January 28, 2016 at 11:00am — 3 Comments
Added by VIRENDER VEER MEHTA on January 27, 2016 at 11:03pm — 9 Comments
Added by Ashwani Kumar on January 27, 2016 at 2:30pm — 5 Comments
Added by Dr T R Sukul on January 27, 2016 at 10:19am — 12 Comments
शाखें गुल ख्वाब में खिली है अभी
इश्क में चोट ये नई है अभी
दिल है नादान कोई समझाये
आबरू -ए-वफ़ा बची है अभी
इस लुटे घर में कैसी आबादी
गैरों के सदके में बसी है अभी
बंध गए हैं हवा के पर सारे
क्यों दुआ बे असर हुई है अभी
राज नजरों नें आज जान लिया
गिरह ये कौन सी कसी है…
ContinueAdded by kanta roy on January 27, 2016 at 12:00am — 6 Comments
1222 1222 1222 1222
**********************************
भला तू देखता क्यों है महज इस आदमी का रंग
दिखाई क्यों न देता है धवल जो दोस्ती का रंग /1
सुना है खूब भाता है तुझे तो रंग भड़कीला
मगर जादा बिखेरे है छटा सुन सादगी का रंग/2
किसी को जाम भाता है किसी को शबनमी बँूदें
किसे मालूम है कैसा भला इस तिश्नगी का रंग/3
महज इक आदमी है तू न ही हिंदू न ही मुस्लिम
करे बदरंग क्यों बतला तू बँटकर जिंदगी का रंग/4
अगर बँटना ही है तुझको…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 26, 2016 at 10:41am — 16 Comments
बेहद दुःखद ख़बर थी, रहमान नहीं रहा, फोन रखने के बाद भी वो बहुत देर तक सकते में रहा। अभी दो घंटे पहले ही तो लौटा था वो हॉस्पिटल से, ऐसी कोई बात लग तो नहीं रही थी, लेकिन अचानक एक अटैक आया और सब कुछ ख़त्म। मौत भी कितनी ख़ामोशी से दबे पाँव आती है, जिन्दगी को खबर ही नहीं होती और उसे शरीर से दूर कर देती है। तुरन्त कपड़े बदल कर कुछ रुपये, ए टी एम और बाइक की चाभी लेकर घर से निकल पड़ा। रास्ते भर पिछले कई साल उसके दिमाग में सड़क की तरह चलते रहे। चार साल पहले ही उसने ज्वाइन किया था इस ऑफिस में और धीरे धीरे…
ContinueAdded by विनय कुमार on January 26, 2016 at 2:13am — 8 Comments
‘धुंध’ : हरि प्रकाश दुबे
“अरे आइये – आइये अवस्थी जी, आज इतनी सर्द शाम को आप मेरे घर, वाह! अरे रुकिए पहले पीने के लिए कुछ लेकर आता हूँ, ये लीजिये ब्रांडी है, ठीक रहेगी । पर यह क्या, इतना पसीना क्यों आ रहा है आपको?”
“अरे कुछ ख़ास नहीं, बस थोडा सा घबरा गया था।“
ओह !..“ अवस्थी जी अब पहेलियाँ मत बुझाइये, ठीक –ठीक बताइये की हुआ क्या ?”
“क्या बताऊं चौधरी साहब ! आज अभी कुछ देर पहले, कुछ बाइक सवार लोगों ने मुझे रास्ते में घेर लिया, जबरन गाड़ी का शीशा खुलवाया और…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on January 26, 2016 at 12:15am — 10 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 25, 2016 at 9:31pm — 9 Comments
मैं राजपथ हूँ
भारी बूटों की ठक ठक
बच्चों की टोली की लक दक
अपने सीने पर महसूसने को
हूँ फिर से आतुरI
सर्द सुबह को जब
जोश का सैलाब
उमड़ता है मेरे आस पास
सुर ताल में चलती टोलियाँ
रोंद्ती हैं मेरे सीने को
कितना आराम पाता हूँ
सच कहूं ,तभी आती है साँस में साँस
इतराता हूँ अपने आप पर I
पर आज कुछ डरा हुआ हूँ
भविष्य को लेकर चिंतित भी
शायद बूढा हो रहा हूँ…
ContinueAdded by pratibha pande on January 25, 2016 at 4:52pm — 8 Comments
सड़क किनारे पसरी घोर निराशा और उस निराशा में डूबी हुयी जिंदगियां, चिथड़ों में लिपटे हुए बच्चे, टूटी फूटी झोपड़ियों में सुलगते चूल्हे और उसी सड़क पर सरकार के नुमाइंदों की सरपट दौड़ती चमकती कारों में चर्चा गरम हो रही होती है डिजिटल इंडिया की, पर उन नेताओं को सड़क की जिंदगी बसर करती इस कौम की बदहाल तस्वीर नज़र नहीं आती. जो कि इनके छदम दावों को धूल धूसरित करती है माना कि जीवन अनवरत संघर्ष का नाम है, जिसका कर्म है सदैव चलते रहना, आगे बढ़ते रहना. किन्तु…
ContinueAdded by DR. HIRDESH CHAUDHARY on January 25, 2016 at 12:30pm — 6 Comments
22 22 22 22 22 2
हाथों को पत्थर , आँखों को लाली दो
मुँह खोलो, चीखो चिल्लाओ , गाली दो
ऊँचे सुर में आल्हा गाओ , सरहद पर
वीरों को मंचों से मत कव्वाली दो
जिस बस्ती मे रहा हमेशा अँधियारा
उस बस्ती को दिन में भी दीवाली दो
तुम पगड़ी पहनो ले जाओ केसरिया
लाओ सर पर मेरे टोपी जालीदो
छद्म वेश में राहू केतू आये फिर
अमृत नहीं उन्हे ज़हर की प्याली दो
कहीं मूर्खता की सीमा तो…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on January 25, 2016 at 9:40am — 14 Comments
2026
2025
2024
2023
2022
2021
2020
2019
2018
2017
2016
2015
2014
2013
2012
2011
2010
1999
1970
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |