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ग़ज़ल

ये न सोचों कि खुशियों में बसर होती है,

कई महलों में भी फांके की सहर होती है !

उसकी आँखों को छलकते हुए आँसूं ही मिले,

वो तो औरत है, कहाँ उसकी कदर होती है

कहीं मासूम को खाने को निवाला न मिला,

कहीं पकवानों से कुत्तों की गुजर होती है,

वो तो मजलूम था, तारीख पे तारीख मिली,

जहाँ दौलत हो…

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Added by Anita Maurya on April 27, 2014 at 8:37pm — 11 Comments

गुप अॅधेंरा, चॉंदनी भी दरबदर

गजल-गुप अॅधेंरा, चॉंदनी भी दरबदर

बह्र....2122 2122 212

नींद जब आती नहीं गुल सेज पर,

सो रहे रिक्शे पे घोड़ा बेच कर।

स्वर्ण है या वोट किसको क्या पता,

शोर संसद में वतन की लूट पर।

चापलूसी नीति निशदिन छल रही,

गर्म है बाजार माया धर्म धर।

शोख कमसिन सी कली नित सुर्ख है,

तल्ख हैं अखबार पढ़ कर मित्रवर।

क्या किया है आपने इस देश में,

लुट रही है अस्मिता हर राह पर।

ताख पर जलता दिया जब…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 27, 2014 at 1:57pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हाल जो भी हो सँभल जाने दो- ग़ज़ल

2122 1122 22

ज़ोर तूफ़ान का चल जाने दो

मुझको लहरों पे निकल जाने दो

 

है मुख़ालिफ़ कि हवाओं का रूख

ठहरो कुछ देर सँभल जाने दो

 

फिर न दिल में कोई रह जाये मलाल

इक दफा दिल को मचल जाने दो

 

मोजज़ा हो न हो उम्मीदें हों                          मोजज़ा =चमत्कार

जी किसी तरह बहल जाने दो

 

आग आखिर ये बुझेगी तो ज़रूर

डर इसी आग में जल जाने दो

 

बूंद जायेगी कहाँ तक देखूँ

गिर के…

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Added by शिज्जु "शकूर" on April 27, 2014 at 10:00am — 21 Comments

जाने कैसे कैसे मंजर देखे है - गजल

बहर  : २ २ २ २ / २ २ २ २/ २ २ २ 
चोरी से अश'आर उठाकर देखे है 
रोज बनाते कविता सागर देखे है 
अक्सर लोग उठाते कंकर देखे है 
हमने विष पीते प्रलयंकर देखे है  
जिनको लिख के पढ़ के छोड़ दिया था 
आवाज लगाते वो अक्षर देखे है 
अभिमान भरे मस्तक भी ऊँचे तो क्या  
हमने घुटने टेके अकबर देखे है 
जो सब खुद को सच्चा साफ़ बताते हैं  
वो रिश्वत मांग रहे अफसर देखे है 
तुमको वो बेईमान समझते…
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Added by Ashish Srivastava on April 26, 2014 at 10:00pm — 9 Comments

दीवार

दीवार

आसमां  में कोई सरहद नहीं

फिर धरती को क्यों बाँटा है

ये तो हम और तुम हैं ,जिन्होंने

दिलों को भी दीवार से पाटा है

कहीं नफ़्रत की तो कहीं अहं की

आओ इस दीवार को गिरा कर देखें

कि दिल कितना बड़ा होता है..

****************

महेश्वरी कनेरी

मौलिक /अप्रकाशित

Added by Maheshwari Kaneri on April 26, 2014 at 4:45pm — 8 Comments

काफी हाऊस.......

जमघट था हर ओर वहां

हर ओर अजब सा शोर था

छल्ले धुऐं के थे कहीं

और कहीं वाद विवाद का जोर था

एक अजनबी से बने

एक मूक दर्शक की तरह

हम कुर्सी की तलाश में

भीड़ से हट कर

एक कोनें में खडे

बार बार अपना

चश्मा साफ़ कर

इधर उधर

बार बार झाँक कर

पलकों के भीतर

आँखों की पुतलियों को

डिस्को करवा रहे थे

तभी एक कुर्सी खाली हुई

ओर हमने तुरत फुरत में

एक लाटरी की तरह

उसे झपट लिया

और एक गहरी सांस के साथ बैठ गये…

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Added by Sushil Sarna on April 26, 2014 at 4:00pm — 14 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
सूरज घिरा सवालों में (नवगीत) // --सौरभ

सिर चढ़ आया

फिर से दिन का

भीतर धमक मलालों में..

ऐसे हैं 

संदर्भ परस्पर..

थोथी चीख..  उबालों में !



जहाँ साँझ के

गहराते ही…

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Added by Saurabh Pandey on April 25, 2014 at 5:00pm — 28 Comments

लगती छबि मीत !

मनोरम छंद

(संक्षिप्त विधान : मनोरम छंद चार पक्तियों या पदों का वर्णिक छंद है. जिसके प्रत्येक पद में चार सगण और अंत में दो लघु वर्ण / अक्षर का विधान  हैं।)

लगती छबि मीत !

लगती छबि मीत मुझे मन भावन।

मन चंद चकोर समान लुभावन।।

मन प्रीत रिसे सुख पाय सुहावन।…

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Added by Satyanarayan Singh on April 24, 2014 at 10:30pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आँखों देखी - 17 ‘और नहीं बेटा, बहुत हो गया’

आँखों देखी - 17 ‘और नहीं बेटा, बहुत हो गया’

 

 

     मैं ग्रुबर कैम्प के उस अद्भुत अनुभव की यादों में खो गया था. हमारा हेलिकॉप्टर कब आईस शेल्फ़ के 100 कि.मी. चौड़े सन्नाटे को पार करने के बाद शिर्माकर ओएसिस को भी पीछे छोड़ चुका था, मुझे पता ही नहीं चला. अचानक जब धुँधली खिड़की से वॉल्थट पर्वतमाला की दूर तक विस्तृत श्रृंखला नज़र के सामने उभर आयी मैं वर्तमान में वापस आ गया. ग्रुबर आज हमारी बाँयी ओर पूर्व दिशा में था. हमारा लक्ष्य था पीटरमैन रेंज के उत्तरी सिरे…

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Added by sharadindu mukerji on April 24, 2014 at 8:28pm — 5 Comments

न फिर तुम पूंछना क्यूँ भाई की सूनी कलाई है

१२२२    १२२२    १२२२   १२२२ 

बड़ी उम्मीद से मालिक ने ये दुनिया बनायी है

दरिंदों ने मगर ये आग नफरत की लगाई है

 

कमर दुहरी हुई थी उसकी इक झोपड़ के ही खातिर

मगर हैवान ने वो भी नहीं छोडी जलाई है

 

नपुंसक हो गए हैं आज ताजो तख़्त दुनिया के

यही कहती है सबसे चीख बेबा की रुलाई है

 

कुलांचे भर रहा था जो लहू में है पड़ा भीगा

हिरन शावक पे किसने आज ये गोली चलायी है

 

अगर अब भी रही जारी यूं कन्या भ्रूण…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 24, 2014 at 3:42pm — 9 Comments

मत कहो तुम है खिलाफत - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    2122

**



दर्द  दिल  का  जो  बढ़ा  दे, बोलिए  मरहम  कहाँ है

रौशनी  के दौर में  अब तम  के  जैसा  तम  कहाँ है

**

कर  रहे  तुम  रोज  दावे   चीज  अद्भुत   है  बनाई

नफरतें  पर  जो  मिटा दे  लैब में  वो  बम  कहाँ है

**

जै जवानों, जै किसानों,  की सदा  में थी कशिश जो

अब  सियासत  की  कहन  में यार वैसा दम कहाँ है

**

मत कहो तुम है खिलाफत धार के विपरीत चलना

चाहते  बस  जानना  हम  धार  का  उद्गम कहाँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 24, 2014 at 1:00pm — 24 Comments

कविता : पूँजीवादी मशीनरी का पुर्ज़ा

मैं पूँजीवादी मशीनरी का चमचमाता हुआ पुर्ज़ा हूँ

मेरे देश की शिक्षा पद्धति ने

मेरे भीतर मौजूद लोहे को वर्षों पहले पहचान लिया था

इसलिए फ़ौरन सुनहरे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 24, 2014 at 11:30am — 16 Comments

एक नया नवगीत -जगदीश पंकज

एक नया नवगीत -जगदीश पंकज

नोंच कर पंख, फिर 

नभ में उछाला

जोर से जिसको

परिंदा तैर पायेगा

हवा में

किस तरह से अब

बिछाकर जाल

फैलाकर कहीं पर

लोभ के दाने

शिकारी हैं खड़े

हर ओर अपनी

दृष्टियाँ ताने

पकड़कर कैद

पिंजरे में किया

फिर भी कहा गाओ

क्रूर अहसास ही

छलता रहा है

हर सतह से अब

कांपते पैर जब

अपने, करें विश्वास

फिर किस पर

छलावों से घिरे

हैं हम ,छिपा है

आहटों में…

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Added by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on April 24, 2014 at 8:57am — 7 Comments

दूर करे अभाव (कामरूप छंद) - लक्ष्मण लडीवाला

दूर करे अभाव (काम रूप छंद 9-7-10 पर यति)

निर्भय रहे सब, वोट देकर,  करे सही चुनाव |

सही चुनाव से,  देश में हो, दूर करे अभाव ||

अच्छे को चुने, करे न लोभ, हो तभी कुछ काम 

ऐसा क्यों चुने, चुनकर वही, वसूले सब दाम ||

 …

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 23, 2014 at 7:53pm — 13 Comments

******(लोक-गीत)*******

एक प्रयास मित्रों !!! 

******(लोक-गीत)*******



गीतु लिखे वियोग मअ..अगन के |

जलत रातु -दिनु..बिनु सजन के ||



आए अबके न सावनु झूम के |

बौराए अबके न डारि अम्बुआ के |

भीज गयी असुअन.. हिचकारी रे |

जलत रातु -दिनु ..बिनु सजन के |

गीतु लिखे वियोग मअ.. अगन के ||



आगु लगे ..संगिनी -साथिन के |

बैठे राहें तन्हा..अँधेरिया अटारी पे…

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Added by Alka Gupta on April 23, 2014 at 6:30pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल -- ' व्यक्तिगत सत्यों की सबको बाध्यता है '( गिरिराज भंडारी )

2122     2122     2122  

लंग सा जो भंग पैरों पर खड़ा है

हाँ, सहारा दो तो वो भी दौड़ता है

 

व्यक्तिगत सत्यों की सबको बाध्यता है  

कौन कैसा क्यों है, ये किसको पता है

 

दानवों सा इस जगह जो लग रहा है

सच कहूँ ! कुछ के लिये वो देवता है

 

सत्य सा निश्चल नही अब कोई आदम

मौका आने पर स्वयम को मोड़ता है

 

आप अपनी राह में चलते ही रहिये

बोलने वाला तो यूँ भी बोलता है

 

उनकी क़समों का भरोसा…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 23, 2014 at 5:34pm — 36 Comments

चुनावी चौसर ! (चौपई छंद)

छिड़ी हुई शब्दों की जंग | दिखा रहे नेता जी रंग ||

वैचारिकता नंगधडंग | सुनकर हैरत जन-जन दंग ||

जाति धर्म के पुते सियार | इनपर कहना है बेकार ||

बात-बात पर दिल पर वार | जन मानस पर अत्याचार ||

 

पांच वर्ष में एक चुनाव | छोड़े मन पर कई प्रभाव ||

महँगाई भी देती घाव | डुबो रही है सबकी नाव ||

नारी दोहन अत्याचार | मिला नहीं अबतक उपचार ||

सरकारें करती उपकार | निर्धन फिरभी हैं बीमार ||

 

तीर तराजू औ तलवार | किसे कहें अब जिम्मेदार…

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Added by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2014 at 2:00pm — 27 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुंडलिया छंद : अरुण कुमार निगम

(1)

मत अपना कर्तव्य है , मत अपना अधिकार

एक - एक मत से बनें , मनचाही सरकार

मनचाही सरकार , चुनें प्रत्याशी मन का

मन जिसका निष्पाप, चहेता हो जन-जन का

क्षणिक लाभ का लोभ, मिटा देता हर सपना

हो कर हम निर्भीक , हमेशा दें मत अपना ||

(2)

झूठे निर्लज लालची , भ्रष्ट और मक्कार

क्या दे सकते हैं कभी, एक भली सरकार

एक भली सरकार, चाहिए - उत्तम चुनिए

हो कितना भी शोर,बात मन की ही सुनिए

मन के निर्णय अरुण , हमेशा रहें अनूठे …

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Added by अरुण कुमार निगम on April 23, 2014 at 9:00am — 15 Comments

पंछी उदास हैं/नवगीत/कल्पना रामानी

गाँवों के पंछी उदास हैं

देख-देख सन्नाटा भारी।

 

जब से नई हवा ने अपना,

रुख मोड़ा शहरों की ओर।

बंद किवाड़ों से टकराकर,

वापस जाती है हर भोर।

 

नहीं बुलाते चुग्गा लेकर,

अब उनको मुंडेर, अटारी।

 

हर आँगन के हरे पेड़ पर,

पतझड़ बैठा डेरा डाल।

भीत हो रहा तुलसी चौरा,

देख सन्निकट अपना काल।

 

बदल रहा है अब तो हर घर,

वृद्धाश्रम में बारी-बारी।

 

बतियाते दिन मूक खड़े…

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Added by कल्पना रामानी on April 23, 2014 at 9:00am — 27 Comments

हम फिर से गुलाम हो जायेंगे

हमारे जीवन मूल्य

सरेआम नीलाम हो जायेंगें

हम फिर से गुलाम हो जायेंगें ..

स्वतंत्रता का काल स्वर्णिम

तेजी से है बीत रहा

हासिल हुआ जो मुश्किल से

तेजी से है रीत रहा.

धरी रह जाएगी नैतिकता,

आदर्श सभी बेकाम हो जाएँगे .

हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..

कहों ना ! जो सत्य है.

सत्य कहने से घबराते हो

सत्य अकाट्य है , अक्षत

छूपता नहीं छद्मावरण से

जो प्राचीन है , धुंधला,

गर्व उसी पर करके बार बार दुहराते हो.

टूटे…

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Added by Neeraj Neer on April 23, 2014 at 8:30am — 10 Comments

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