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निर्मोही रिश्ते ...

निर्मोही रिश्ते ...

भावों की ज़मीन को

करते हैं बंजर

बंजारे से

ये

आजकल के

निर्मोही रिश्ते

जीवन को

मृत्यु का

कफ़न पहनाते

ये

आजकल के

निर्मोही रिश्ते

अपनी ही कोख़ से

अनजान बनते

ये

आजकल के

निर्मोही रिश्ते

कितना अजीब लगता है

जब

मृत रिश्तों को

कांधा देते

ले जाते हैं

दुनियावी सड़क से

मरघट तक

ये मृत केंचुली में

स्वांग रचाते

ज़िंदा…

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Added by Sushil Sarna on March 28, 2018 at 8:57pm — 10 Comments

ग़ज़ल "एक दिन मिल जायेगा सब ख़ाक में"

*२१२२ २१२२ २१२*

हर जगह रहता है अपनी धाक में।

ख़ासियत देखी ये उस चालाक में।।

चीज कोई मुफ़्त में कैसे मिले।

लोग रहते आजकल इस ताक में।।

आदमी करता गुमाँ किस बात का।

एक दिन मिल जायेगा सब ख़ाक में।।

ख़ुद-ब-ख़ुद सम्मान मिलता आजकल।

आप हो जब कीमती पोशाक में।।

जब न मोबाइल किसी के पास था।

लोग लिखते हाल अपना डाक में।।

डर हमेशा उस ख़ुदा से ही लगे।

मैं नहीं रहता किसी की धाक…

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Added by surender insan on March 28, 2018 at 3:00pm — 14 Comments

गज़ल

1222 1222 1222 1222



छुपी हो लाख पर्दों में मुहब्बत देख लेते हैं ।

किसी चहरे पे हम ठहरी नज़ाकत देख लेते हैं ।। 1

.

तेरी आवारगी की हर तरफ चर्चा ही चर्चा है ।

यहां तो लोग तेरी हर हिमाक़त देख लेते हैं ।। 2

.

चले आना कभी दर पे अभी तो मौत बाकी है ।

तेरे जुल्मो सितम से हम कयामत देख लेते हैं ।।3

.

बड़ी मदहोश नजरों से इशारा हो गया उनका ।

दिखा वो तिश्नगी अपनी लियाकत देख लेते हैं ।। 4

.

खबर तुझको नहीं शायद तेरी उल्फत…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 28, 2018 at 2:30pm — 8 Comments

आदर्शवाद - लघुकथा

"मैं मानती हूँ डॉक्टर, कि ये उन पत्थरबाजों के परिवार का ही हिस्सा हैं जिनका शिकार हमारे फ़ौजी आये दिन होते हैं लेकिन सिर्फ इसी वज़ह से इन्हें अपने 'पढ़ाई-कढ़ाई सेंटर' में न रखना, क्या इनके साथ ज्यादती नहीं होगी?" हजारों मील दूर से घाटी में आकर अशिक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर औरतों के लिये 'हेल्प सेंटर' चलाने वाली समायरा, 'आर्मी डॉक्टर' की बात पर अपनी असहमति जता रही थी।

"ये फ़ालतू का आदर्शवाद हैं समायरा, और कुछ नहीं।" डॉक्टर मुस्कराने लगा। "तुमने शायद देखा नहीं हैं पत्थरबाजों की चोट से…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on March 27, 2018 at 9:04pm — 21 Comments

समाधान: लघुकथा :हरि प्रकाश दुबे

राहुल ने जैसे ही रात को घर में कदम रखा वैसे ही उसका सामना अपनी धर्मपत्नी ‘कविता’ से हो गया । उसे देखते ही वह बोली “देख रही हूं आजकल, तुम बहुत बदल गए हो, मुझसे आजकल ठीक से बात भी नहीं करते हो ।”

 

नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, बस जरा काम का बोझ कुछ ज्यादा ही लग रहा है ।”

 

ये बहाना तो तुम कई दिनों से बना रहे हो, हाय राम ! कहीं तुम मुझसे कुछ छुपा तो नहीं रहे हो, “कौन है वो करमजली?”

 

यह सुनते ही राहुल का पारा चढ़ गया उसने झुंझुलाते हुए कहा “कविता,…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 27, 2018 at 8:23pm — 18 Comments

सूर्यास्त

  

     बिहार दिवस का उल्लास चहुँ ओर बिखरा पड़ा नजर आ रहा... मैं किसी कार्य से गाँधी मैदान से गुजरते हुए कहीं जा रही थी कि मेरी दृष्टि तरुण वर्मा पर पड़ी जो एक राजनीतिक दल की सभा में भाषण सा दे रहा था। पार्टी का पट्टा भी गले में डाल रखा... तरुण वर्मा को देखकर मैं चौंक उठी... और सोचने लगी यह तो उच्चकोटी का साहित्यकार बनने का सपने सजाता... लेखनी से समाज का दिशा दशा बदल देने का डंका पीटने वाला आज और लगभग हाल के दिनों में ज्यादा राजनीतिक दल की सभा…

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Added by vibha rani shrivastava on March 27, 2018 at 7:20pm — 6 Comments

एक अतुकांत रचना

एक नवीनतम अतुकांत रचना

मैं तो सदा उसकी ही रहूंगी,

मुझे उसी की रहना है बस

इससे क्या

कि

मेरे जिस्म की मासूमी पर,

उसने दर्द के दाग लिखे हैं ।

मेरी सुर्ख आंखों का काजल ,

उसके जुर्म बह निकला है

और चेहरे की रंगत है

उसके दिए हुए निशान

अंतिम लफ्ज़ से उसके नाम के,

बस मेरी पहचान बची है

मैंने उसकी खातिर अपना,

चेहरा सब से छुपा लिया है

मैं फिर भी उसकी ही हूं

जबकि

वो जब चाहे मुझको अपनी,

जीस्त से रुखसत कर सकता है

वो जब…

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Added by मनोज अहसास on March 27, 2018 at 4:21pm — 6 Comments

शर्तों की शतरंज (लघुकथा)

"पापा! मुझे मोबाइल चाहिए, और अभी की अभी चाहिए|" सोनू ने जिद्द पकड़ ली थी।



"पागल हो गए हो क्या सोनू? यह क्या मोबाइल की जिद्द लिए बैठे हो, कोई मोबाइल-शोबईल नहीं मिलेगा,चुप-चाप खाना खाओ|" डाँटते हुए सोनू के पापा ने कहा|



लेकिन सोनू नहीं माना और हाथ-पैर पटकते हुए रोने लगा|



"रोता रह! पर तुम्हारी हर जिद्द नहीं मानूंगा | अभी पिछले महीने ही तुम्हें साइकिल दिलवाई है।" पापा का भी पारा चढ़ गया।



सोनू के दादा जी जो अब तक चुप थे,मुस्कुराकर बोले," आखिर बेटा तुम्हारा ही… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 27, 2018 at 3:00pm — 4 Comments

'ग़ालिब' की ज़मीन में ग़ज़ल नम्बर 2'

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फेलुन

लोग हैरान थे,रिश्ता सर-ए-महफ़िल बाँधा

उसने जब अपनी रग-ए-जाँ से मेरा दिल बाँधा

हर क़दम राह मलाइक ने दिखाई मुझ को

मैंने जब अज़्म-ए-सफ़र जानिब-ए-मंज़िल बाँधा

जितने हमदर्द थे रोने लगे सुनकर देखो

अपने अशआर में जब मैंने ग़म-ए-दिल बाँधा

जल गये जितने सितारे थे फ़लक पर यारो

अपनी ज़ुल्फ़ों में जब उसने मह-ए-कामिल बाँधा

शुक्र तेरा करें किस मुंह से…

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Added by Samar kabeer on March 27, 2018 at 12:31pm — 35 Comments

आना सावन में

सागर जैसी लहर उठी है,

दिल की धड़कन में.

छलकी है पिय याद तुम्हारी,

मेरे नयनन में

 

तोड़े आम साथ में जाकर,

भायी मन अमराई.

पानी पर कागज की कश्ती,…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on March 27, 2018 at 9:22am — 8 Comments

उसकी लाठी आवाज नहीं करती (लघुकथा)

"अरे रमेश ये कैसे हुआ? और बेटे की हालत कैसी है? मुझे तो जैसे ही खबर लगी,भागा-भागा चला आ रहा हूँ"  आई सी यू के बाहर खड़े रमेश से रतन ने पूछा।

रतन को देखते ही रमेश रो पड़ा। फिर अपने को संभालते हुए बोला-"क्या बताऊँ तुम्हें, मेरे घर के पास जो हाई वोल्टेज तार का खम्बा लगा हुआ था, वही कल अचानक गिर गया। और फिर ये…."

बोलते-बोलते वह फफक पड़ा।

रतन ढाँढस देते हुए बोला- "मित्र हिम्मत न हारो। सब कुछ ठीक हो जाएगा। .....डॉक्टर्स क्या कह रहे…

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Added by नाथ सोनांचली on March 27, 2018 at 7:44am — 16 Comments

चलती है रोज फ़िक्र यहां ज़िन्दगी के साथ ।।

221 2121 1221 212

जब से गये हैं आप किसी अजनबी के साथ ।

यूँ ही तमाम उम्र कटी बेखुदी के साथ ।।

कुछ वक्त आप भी तो गुजारो मेरे करीब ।

मत जाइए जनाब अभी बेरुखी के साथ ।।

कहने लगे है लोग उसे माहताब अब ।

मिलता नहीं जो मुझको यहाँ रोशनी के साथ ।।

है मुतमइन ही कौन यहां ख्वाहिशों के बीच ।

लाचारियाँ दिखीं है बहुत आदमी के साथ ।



तन्हाइयों का वक्त तो मिलना मुहाल है ।

चलती है रोज फ़िक्र…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 27, 2018 at 12:00am — 7 Comments

ग़ज़ल नूर की- दूर से इक शख्स जलती बस्तियाँ गिनता रहा

२१२२/ २१२२/ २१२२/ २१२ 

.

दूर से इक शख्स जलती बस्तियाँ गिनता रहा

रह गई थीं कुछ जो बाकी तीलियाँ गिनता रहा.

.

यादों के बिल से निकलती चींटियाँ गिनता रहा

था कोई दीवाना टूटी चूड़ियाँ गिनता रहा.

.

मुझ से मिलता-जुलता लड़का आईने से झाँक-कर

मेरे चेहरे पर उभरती झुर्रियाँ गिनता रहा.

.

होश मेरे गुम थे मैंने जब किया इज़हार-ए-इश्क़   

और वो नादान कच्ची इमलियाँ गिनता रहा.     

.

एक दिन पूछा किसी ने कौन है तेरा यहाँ  

दिल हुआ रुसवा…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 26, 2018 at 4:46pm — 40 Comments

बूढ़ी माँ ...

बूढ़ी माँ ...



अपनी आँखों से

गिरते खारे जल को

अपनी फटी पुरानी साड़ी के

पल्लू से

बार बार पौंछती

फिर पढ़ती

गोद में रखी

रामायण को

बूढ़ी माँ

व्यथित नहीं थी वो

राम के बनवास जाने से

व्यथित थी वो

अपने बिछुड़े बेटे के ग़म से

जिसका ख़त आये

ज़माना बीत गया

चूल्हा रोज जलता

उसके नाम की

रोटी भी रोज बनती

रोज उसे खिलाने की प्रतीक्षा में

रोटी हाथ में लिए लिए

सो जाती

बूढ़ी…

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Added by Sushil Sarna on March 26, 2018 at 4:10pm — 12 Comments

ग़ज़ल - सब में आग थी, लोहा भी था, नेक बहुत थे सारे हम - अजय तिवारी

फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ा

 22      22      22       22     22      22      22      2

सब में आग थी, लोहा भी था, नेक बहुत थे सारे हम

लेकिन  तन्हा-तन्हा लड़ कर,  तन्हा-तन्हा  हारे हम

 

ज़र्रा-ज़र्रा  बिखरे  है  हम,  चारो ओर खलाओं में

लेकिन जिस दिन होंगे इकठ्ठा, बन जायेंगे सितारे हम

 

कितने दिन वो मूँग दलेंगे, कमजोरों की छाती पर

कितने दिन और चुप  बैठेंगे, बनके यूं बेचारे हम 

 

कबतक और ये…

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Added by Ajay Tiwari on March 26, 2018 at 11:49am — 22 Comments

ग़ज़ल...कभी तो दिल को करार आये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

121 22 121 22 121 22 121 22

कभी जरा सा मैं मुस्कुरा लूँ कभी तो दिल को करार आये

कभी तो भूले से इस चमन में उतर के फ़स्ल-ए-बहार आये

कि इससे पहले ये साँस टूटे सफ़ीना डूबे ये ज़िन्दगी का

चले भी आओ सनम कहीं से कहाँ कहाँ हम पुकार आये

बड़ी अदा से नजर झुकाये वो पूछते हैं कहाँ थे अब तक

सुनाये कैसे वो आपबीती वो ज़िन्दगी जो गुजार आये

हजार लम्हे हजार बातें जिन्हें तड़पता ही छोड़ आया

वो शाम वो गेसुओं के साये वो याद फिर बेशुमार…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 26, 2018 at 10:00am — 24 Comments

समझ

मंदिर के भीतर भीड़ उमड़ रही थी। तिल धरने की जगह नहीं बची थी। सभी को अपनी धुन लगी थी। सभी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे और चाहते थे कि उनका जल मूर्ति पर चढ़ जाय जिससे उन्हें बाहर निकलने का मौका मिले। औरतों का रास्ता दूसरी तरफ से था। औरते उसी तरफ से आ कर मूर्ति का दर्शन पूजन कर रही थीं। मरछही भी उन्हीं महिलाओं में शामिल थी। आगे बढ़ रही थी पीछे से धक्का लग रहा था। वह जब मूर्ति के सामने आई और उसने अपना जल गिराया। उसके बाद सिर नवाकर आशीष मांगा। मरछही ने जब सिर उठाकर मूर्ति के अलावा पहली बार देखा तो… Continue

Added by indravidyavachaspatitiwari on March 26, 2018 at 6:14am — 2 Comments

गौरैया (ताटंक छन्द)

गौरैया की चीं चीं बोली, सबको बड़ी सुहाती है

प्रातः काल मधुर बेला में, गीत मनोहर गाती है

फुदक फुदक कर दाने चुगती, मन को बड़ी लुभाती है

खिड़की और झरोखों से नित, हर पल आती जाती है ll

खेत बाग वन घर आँगन को, गौरैया चहकाती है

घरों और चौबारों में नित, अपना नीड़ बनाती है

घर की शोभा उजड़ गयी है, गौरैया के जाने से

नव युग का मानव वंचित है, गौरैया के गानें से ll

विकास की अंधी दुनिया मे, पंछी गुम हो जाते हैं

बढ़ा…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on March 25, 2018 at 4:48pm — 5 Comments

इश्क ने हाल पूछा

रात भर महकती रही यादें

लुत्फ़ आया बहुत जुदाई का

विरह से उठा रोग दबा हुआ

पता लेता हूँ अब दवाई का |

 

सिक्के जेब को काटने लगे

खर्च ने हाल पूछा कमाई का

नमक-मिर्च से मुँह जलाकर

पूछा भाव फिर से मिठाई का |

 

हर रात सिराहन से शिकायतें

ढिंढोरा कब तलक ढिठाई का

हथेलियाँ-हथेलियों के लिए तड़पी

इश्क ने हाल पूछा रुसवाई का  |

 

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अमुद्रित )

 

 

Added by somesh kumar on March 25, 2018 at 2:30pm — No Comments

राम सरीखे बन पाये क्या-गीत

कब निकले बाहर महलों से,

वन में गीत कभी गाये क्या

पूजा करते रहे राम की,

राम सरीखे बन पाये क्या

 

भाई को कब भाई समझा,

हर विपदा में किया किनारा

दीवारों पर दीवारें…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 11:03am — 13 Comments

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