ख़बर तो कागज़ों की कश्तियाँ दे जाएँगी मुझको
ये लहरें ही तुम्हारी चिठ्ठियाँ दे जाएँगी मुझको
लिखे थे जो दरख्तों पर अभी तक नाम हैं कायम
ख़बर ये भी कभी पुरवाईयाँ दे जाएँगी मुझको
कभी तो बात मेरी मान जाया कर दिले-नादां
तेरी नादानियाँ दुश्वारियाँ दे जाएँगी मुझको
बिछुड़ जाने का डर मुझको नहीं डर है तो ये डर है
न जाने क्या न क्या रुस्वाईयां दे जाएँगी मुझको
तुम्हीं को भूल जाऊं मैं अजी ये हो नहीं सकता
तुम्हारी यादें आकर हिचकियाँ दे जाएँगी…
ContinueAdded by Saarthi Baidyanath on March 8, 2018 at 11:51am — 12 Comments
माता भगिनी संगिनी, सुता रूप में नार
विपदा दुख पीड़ा सहे, बाँटे लेकिन प्यार।१।
रही जन्म से नार तो, सदा शक्ति का रूप
समझे कैसे खुद रहा, मर्द हवस का कूप।२।
जो नारी का नित करें, पगपग पर सम्मान
संतो सा उनका रहा, सचमुच चरित महान।३।
नारी को जो कह गये, यहाँ नरक का द्वार
सब जन उनको जानिए, इस भू पर थे भार।४।
मुझ मूरख का है नहीं, गीता का यह ज्ञान
देवों से बढ़ नार का, कर मानव सम्मान।५।
बन जायेगा सच कहूँ,…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2018 at 11:30am — 15 Comments
महामूर्ख - लघुकथा –
"दुर्योधन, तुम इस विश्व के सबसे बड़े मूर्ख हो, महामूर्ख"।
"माते, आप यह कैसी भाषा बोल रही हैं? मैं तो सदैव ही आपका सबसे प्रिय पुत्र रहा हूँ"।
"मगर आज तुमने अपने आप को महामूर्ख प्रमाणित कर दिया"।
"माँ, आप इस साम्राज्य की महारानी हैं।मैं आपका अपमान नहीं करना चाहता , लेकिन आपकी यह कटु वाणी मेरी सहनशीलता को धैर्यहीन बना रही है"।
"दुर्योधन, तुमने अपनी माँ के आदेश की अवज्ञा करके अपनी मृत्यु को स्वंय दावत दी है"।
"मैंने जो कुछ भी किया…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on March 7, 2018 at 9:29pm — 16 Comments
दो मित्र आपस में बातें कर रहे थे;एक मानवतावादी था और दूसरा समाजवादी।पहले ने कहा-
अरे भई!वो भी आदमी हैं,परिस्थिति के मारे हुए।बेचारों को शरण देना पुण्य-परमार्थ का काम है।
दूसरा:हाँ तभी तक,जबतक यहाँ के लोगों को शरणार्थी बनने की नौबत न आ जाये।
"मौलिक व अप्रकाशित"
Added by Manan Kumar singh on March 7, 2018 at 8:25pm — 8 Comments
आदमी और नदी
पहाड़ों से निकलतीं थीं झूम-झूम कर
खो जाती थीं एक-दुसरे में घूम-घूम कर
विशद् धारा बन जाती थी
एक नदी कहलाती थी
समुंदर में जाकर प्रेम करती सुरूप
हो जाती एकरूप |
आदमी भी कुछ ऐसा था
स्वीकारता दुसरे को
चाहे दूसरा जैसा था
आदमी होना प्रथम था
बाद में ज़मीन-पैसा था |
आदमी का मेल-मिलाप /सभ्यता रचता था
इसी तरह एक राज्य/एक देश बसता था |
बाद में नदी को जरूरत के…
ContinueAdded by somesh kumar on March 7, 2018 at 8:00pm — 3 Comments
एक बहुत बड़े जमींदार थे। उनका कुनबा भी बहुत बड़ा था। उनकी जमीन से होकर एक सोता बहता था। सोते के दूसरी तरफ भी कुनबे के कुछ लोग रहते थे। जिनसे यदा कदा ही मिलना हो पाता था।
सरकार ने जब जमींदारी जब्त करनी शुरू की तो जमींदार साहब को अपने धन का अपने लोगों के लिए सदुपयोग करने का उपाय सूझा। उन्होंने सरकार के तय मापदंड के अलावा बचे धन से उस सोते पर एक पुल बनवा दिया। ताकि कुनबे के लोग आपस में मिलते जुलते रहें। जम्हूरियत में संख्या बल का अपना ही महत्व है ये बात वह खूब समझते थे।
पुल…
Added by Kumar Gourav on March 6, 2018 at 10:00pm — 7 Comments
22/ 22/ 22/ 22
ज़ालिम तुझ से डरे नहीं हैं,
हारे हैं .....पर मरे नहीं हैं.
.
और कुछ इक दिन ज़ुल्म चलेगा,
अभी पाप-घट भरे नहीं हैं.
.
खोट है उस की नीयत में कुछ
पूरे हम भी खरे नहीं हैं.
.
कौन सी जन्नत कैसी क़यामात
ये सब मौत से परे नहीं हैं.
.
कहते हैं वो अपने मन की
पर मन की भी करे नहीं हैं.
.
गर्दभ होते ...घास तो चरते
साहिब.. घास भी चरे नहीं हैं.
.
बोल रहे हैं अपने कलम से
“नूर जी” चुप्पी धरे…
Added by Nilesh Shevgaonkar on March 6, 2018 at 9:33pm — 11 Comments
अरकान- 212 212 12 22
बात कहनी थी जो ज़ुबानी में|
लिख रहें हैं ग़ज़ल कहानी में|
फूल-ख़त संग लाख दर्दोगम
उसने हमको दिये निशानी में|
देवता बन के आये हैं मेहमां
कुछ कसर हो न मेज़बानी में |
प्यार रुसवा मेरा भी हो जाता
जिक्र करता अगर कहानी में |
सर्द मौसम में गर गिरा पल्लू
आग फिर तो लगेगी पानी में |
मौलिक व अप्रकाशित
Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on March 6, 2018 at 8:30pm — 5 Comments
महाविद्यालयीन कक्षा में छात्रों के अनुरोध पर हिन्दी के शिक्षक उन्हें "भूल, ग़लती, और भूलना" शब्दों में अंतर समझाते हुए बोले - "भूतकाल में अज्ञानता वश किया गया कोई भी कार्य या क्रिया जिसके कारण वर्तमान या भविष्य में हानि उठानी पड़े 'भूल' कहलाती है! 'भूल' का हिन्दी में अर्थ होता है “गलती या दोष”; इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर “चूक” शब्द के साथ किया जाता है!" कुछ उदाहरणों सहित समझाने के बाद शिक्षक ने छात्रों से कुछ और उदाहरण प्रस्तुत करने को कहा। 'भूल' पर कुछ जवाब यूं भी रहे :
"जैसे अमर…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 6, 2018 at 8:30pm — 8 Comments
2122 2122 2122 212
इस नए हालात पर तुहमत लगाते जाइये ।
आप मेरी बेबसी पर मुस्कुराते जाइये ।।
आंख पर पर्दा अना का खो गयी शर्मो हया ।।
रंग गिरगिट की तरह यूँ ही दिखाते जाइये ।।
तिश्नालब हैं रिन्द सारे मैकदा है आपका ।
जाम रब ने है दिया पीते पिलाते जाइये ।।
इस चिलम में आग है गम को जलाने के लिए ।
फिक्र अपनी भी धुएँ में कुछ…
Added by Naveen Mani Tripathi on March 6, 2018 at 8:00pm — 3 Comments
मौन-संबंध
असीम अँधेरी रात
भस्मीली परछाईं भी जहाँ दीखती नहीं
और न ही कहीं से वहाँ
कोई प्रतिध्वनि लौट कर आती है ...
इस अपार्थ रात में
छज्जे पर बैठी दूर तक तकती…
ContinueAdded by vijay nikore on March 6, 2018 at 1:24pm — 15 Comments
शिक्षा - लघुकथा –
"माँ, मैं भी होली खेलने जाऊं क्या? बस्ती के सब बच्चे होली खेल रहे हैं"।
"नहीं रेशमा,नहीं मेरी बच्ची, तेरे पास फ़टे पुराने कपड़े तो हैं नहीं। मुश्किल से एक जोड़ी तो कपड़े हैं, उन्हें भी होली में खराब कर लेगी तो कल से स्कूल कैसे जायेगी"?
"माँ, यह कैसा मज़ाक़ है, दिवाली पर कहती हो कि तुम्हारे पास नये कपड़े नहीं हैं इसलिये घर से मत निकलो। और होली पर कहती हो तुम्हारे पास पुराने कपड़े नहीं हैं, सो होली मत खेलो"?
"क्या करें मेरी बच्ची, ऊपरवाले ने हम गरीबों के…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on March 6, 2018 at 11:24am — 10 Comments
2122 1212 22
जब भी मेरे क़रीब आओगे
अपनी हस्ती को भूल जाओगे
.
है वफ़ा क्या यह जान जाओगे
दिल अगर हम से तुम लगाओगे
.
मुस्कुराता लगेगा जग सारा
आप जब दिल से मुस्कुराओगे
.
सोच लो खूब इश्क़ से पहले
ज़िन्दगी दांव पर लगाओगे
.
ज़िन्दगी की किताब मत खोलो
उसमें असरार कुछ न पाओगे
_____________________
मौलिक व अप्रकाशित
Added by ASRAR DHARVI on March 6, 2018 at 10:17am — 5 Comments
बड़े बेटे ने माँ के फटे पुराने कपड़े इकट्ठे किए । दूसरा बेटा चश्मा और छड़ी ढूँढकर लाया । तीसरे ने दवाई की शीशी और पुड़ियाँ अलमारी से निकाली । छोटी बहू कड़वा ताना देती हुई बोली-" जाने कब मरेगी । लगता है कोई अमर बूटी खाकर आई है ।" चारों मिलकर माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आए । अब चारों ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला -चिल्लाकर सभी को बता रहे हैं कि माँ अपनी राजी-मर्जी से हमेशा के लिए अपनी बेटी के घर चली गईं ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।
Added by Mohammed Arif on March 6, 2018 at 8:00am — 16 Comments
आज भी मुहल्ले में मदारी के डमरू की धुन पर बंदर और रस्सी पर संतुलन बनाती बच्ची के खेल देख कर दर्शक तालियां बजाते रहे। फिर परंपरा के अनुसार कुछ पैसे फेंके गये। फिर भीड़ छंटने लगी। कुछ लोग चर्चा करने लगे :
"कितनी दया आ रही थी उस भूखे बंदर और भूखी कमज़ोर सी बच्ची को देख कर!" एक आदमी ने अपने साथी से कहा।
"हां, कितना ख़ुदग़र्ज़ और दुष्ट मदारी था वह!" साथी बोला।
"पहले तो खेल का मज़ा ले लिया और अब उन पर हमदर्दी जता रहे हो!" तीसरे आदमी ने बीच में आकर उन दोनों के कंधों पर हाथ…
Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 6, 2018 at 1:31am — 7 Comments
Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on March 5, 2018 at 10:16pm — 2 Comments
2122 1212 22
मुझ से मेरा ही फ़लसफ़ा पूछा ।
क्या बता दूँ कि उसने क्या पूछा ।।
डूब जाने की आरजू लेकर ।
उसने दरिया का रास्ता पूछा ।
देर होनी थी हो गयी है अब ।
वक्त ने मुझसे वास्ता पूछा ।।
था भरोसा नहीं मगर मुझसे ।
मुद्दतों बाद वह गिला पूछा ।।
हिज्र के बाद जी रहे कैसे ।
चाँद ने मेरा हौसला…
Added by Naveen Mani Tripathi on March 5, 2018 at 7:00pm — 2 Comments
लेके गुलाल हाथ में इक बार देखिये.
मुठ्ठी में होगी आपके बहार देखिये.
चम्मचों से मात वो चक्की भी खा गई.
आटा भी पाता रहा संसार देखिये.
अच्छे को अच्छा दिखता, दिखता बुरा बुरे को.
आईने सा है मेरा किरदार देखिये.
आज़ादी की कीमत आज़ाद ने चुकाई.
लाखों हैं आज इसके हक़दार देखिये.
पीतल भी आज देखो स्वर्ण हो गया.
खोटा-खरा बताती झनकार देखिये.
आसूदगी को मेरी कुछ और न समझ.
गर्के-उल्फत है…
ContinueAdded by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on March 5, 2018 at 5:35pm — 3 Comments
लघुकथा – अनकही -
सुनिधि की ससुराल में इस बार पहली होली थी। वह पिछले तीन दिन से अपने देवर को याद दिला रही थी कि होली में तीन दिन बचे हैं।तैयार हो जाओ।
"भाभीजी, मैं होली नहीं खेलता"।
"पर हम तो खेलते हैं।
"आप खेलो ना, आपको किसने रोका है"।
होली के दिन सुनिधि ने देवर के कमरे में झाँक कर देखा, देवर अपने कंप्यूटर में व्यस्त था, वह चुपके से दोनों हाथों में गुलाल लिये गयी और पीछे से देवर के गालों पर मल दिया।देवर एकदम चीख पड़ा,
"माँ, कहाँ हो, जल्दी आओ, भाभी ने…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on March 5, 2018 at 3:00pm — 12 Comments
1222 1222 1222 1222
अगर माँगू तो थोड़ी सी नफ़ासत लेके आ जाना,
मुहब्बत है तो दिल में तुम शराफ़त लेके आ जाना ।
रिवाज़-ओ-रस्म-ए-उल्फ़त को सनम तुम भूल जाना मत,
सफ़र ये आशिक़ी का है नज़ाक़त लेके आ जाना ।
जो दिल तेरा किसी भी ग़ैर के दिल में धड़कता हो,
मगर तुम मेरी ख़ातिर वो अमानत लेके आ जाना ।
वफ़ा के क़त्ल की साज़िश तुम्हारी भूल जाऊँ मैं,
अगर आओ तो अहसास-ए-नदामत लेके आ जाना ।
जो भेजे थे कभी अश्कों से लिखकर…
ContinueAdded by Harash Mahajan on March 5, 2018 at 2:30pm — 10 Comments
2026
2025
2024
2023
2022
2021
2020
2019
2018
2017
2016
2015
2014
2013
2012
2011
2010
1999
1970
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |